आलोचना में है आपकी ज़िन्दगी बदलने की ताकत

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अक्सर आपको बहुत से लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता होगा। कभी ऑफिस में, कभी दोस्तों के बीच और कभी कभी परिवार में भी। अपनी आलोचना को सुनना किसी को भी पसंद नहीं होता और ऐसी स्थिति आने पर आप या तो उस आलोचक को ही बुरा भला कहने लगते है या फ़िर इस स्थिति से बचने के लिए आप कोई काम हाथ में ही नहीं लेते। लेकिन अगर आप ने गौर किया हो तो आपके आसपास कुछ ऐसे लोग भी मौजूद है जो अपनी निंदा से बिलकुल बेचैन नहीं होते बल्कि उसे भी अपने लिए प्रशंसा की तरह लेकर आगे बढ़ते है। आप सोच रहे होंगे कि आलोचना को कैसे अपनाया जा सकता है और क्यों?

आपने कबीर दास जी का ये दोहा जरूर पढ़ा और सुना होगा .. निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इसी दोहे में छिपा है आपके सवालों का जवाब। तो चलिए,आज आपको बताते है कि आपकी आलोचना कैसे आपकी ज़िन्दगी को बेहतर बना सकती है –

ग़लतियों को देखने और सुधारने का मौका देती है आलोचना –
अगर आप बिना ये जाने लगातार काम करते रहे कि इसमें क्या गलतियां हो रही है तो आप अपने काम को बेहतर तरीके से नहीं कर पाएंगे और आपके काम में रहने वाली कमियों का पता आपको आलोचना से ही लग सकता है। ऐसे में अपनी आलोचना से निराश होने की बजाए इसे अपनी गलतियां सुधारने के औजार के रूप में इस्तेमाल कीजिये और कुछ ही वक़्त में आप पाएंगे कि आपका किया काम पहले से काफी बेहतर हो चुका है।

परफेक्शन की तरफ बढ़ाती है आलोचना –
कभी कभी ये ग़लतफ़हमी हो जाती है कि आपका किया काम परफेक्ट है और इस विचार को यकीन में बदलने के लिए चापलूस लोगों की वाह वाही ही काफी होती है। आलोचना के बिना स्वयं पर अभिमान होने लगता है जो आपके व्यक्तित्व के लिए बेहद नुकसानदायक साबित होता है। ऐसे में आपके काम की आलोचना ही है जिससे आप काम की वो बारीकियां सीखेंगे जो आपको परफेक्शन की तरफ बढ़ाएंगी और आप ये भी जान जायेंगे कि कोई भी परफेक्ट नहीं होता और ये सोच आपको लगातार बेहतर करने के लिए प्रेरित करती रहेगी।

अच्छे श्रोता के गुण होते है विकसित –
सभी को मीठे बोल सुनना ही भाता है और खुद के लिए कड़वे बोल सुन कर हर कोई उग्र होने लगता है और सामने वाले की बात पूरी सुने बिना ही प्रतिक्रिया देने लगता है लेकिन आलोचना को यदि एक अवसर की तरह देखा जाए तो आलोचना को शांत मन से सुनना और उसके अनुसार अपने काम को और बेहतर करने का प्रयास ही तो सफलता की राह खोलता है। सफल होने के लिए मेहनत के साथ ये भी जरुरी है कि आप अच्छे श्रोता हो और अगर आपने आलोचना को आराम से सुन लिया तो समझिये कि आप में अच्छे श्रोता के गुण विकसित हो रहे हैं।

सहनशीलता बढ़ती है –
आजकल सहनशीलता का जैसे अभाव ही हो गया है। अगर कोई हमारी आलोचना करने लगता है तो हम उसे समझने की बजाए उस व्यक्ति को ही बुरा भला कहने लगते है। लेकिन अगर आलोचना को सकारात्मक नज़रिये से देखना शुरू किया जाए तो हमे केवल फायदा ही होगा और आलोचना सुन पाने की जो क्षमता विकसित होगी ,वो आपके व्यक्तित्व में सहनशीलता जैसा गुण विकसित कर देगी जो जीवन के हर पड़ाव में आपके लिए फायदेमंद ही साबित होगा।

स्वभाव बनता है नम्र –
आलोचना का विचार ही मन को उग्र कर देने के लिए काफी होता है लेकिन अगर ये सोचा जाए कि आलोचना मुझे आगे बढ़ने में मदद करती है और अच्छे बुरे की पहचान में भी सहायक होती है तो आलोचना के प्रति रवैया बदलने लगता है और उग्र स्वभाव में नम्रता आना शुरू हो जाता है।

प्रयास करते रहने का गुण होता है विकसित –
आजतक जितने भी महान लोग हुए है, वो एक ही प्रयास में सफल नहीं हुए थे, लगातार प्रयासों ने ही उन्हें महान बनाया और उनके इन प्रयासों के पीछे भी आलोचना ही थी जिसने उन्हें लगातार कोशिश करने, पहले से बेहतर करने और हार न मानने के लिए प्रेरित किया और आख़िरकार अपनी आलोचनाओं को अपनी शक्ति बना कर वो सभी लोग महान बन गए।

नया नज़रिया मिलता है –
आप पर उठने वाली हर एक उंगली आप पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाती है बल्कि आपको ये सोचने का अवसर देती है कि जो काम आपने किया है, उसे और किस तरीके से किया जा सकता था जिससे वो काम और भी बेहतर हो पाता। ऐसी सोच आपका मन उन आलोचकों की बातों से हटा देगी और आप चीज़ों और परिस्थितियों को नए नज़रिये से देखने लगेंगे जो आपको लगातार आगे बढ़ते जाने में सहायक सिद्ध होगा।

आलोचनाओं से विचलित हो जाना स्वाभाविक जरूर है लेकिन अब आपने जान लिया है कि आलोचना हमारी शत्रु नहीं बल्कि मित्र भी बन सकती है। जरुरत है तो सिर्फ अपने नज़रिये को बदलने की और हर काम को बेहतर तरीके से करने की चाहत की। तो बस ! देर किस बात की, आज ही से आलोचना के इन सकारात्मक पहलूओं पर गौर कीजिये और अपनी ज़िन्दगी को खुशनुमा तरीके से आगे बढ़ाते जाइये।

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