बच्चों को झूठ बोलने की आदत से बचाए

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आज हमने बहुत ही नाजुक टॉपिक लिया है जिसमे बच्चों की सबसे बड़ी समस्या का जिक्र होगा. वो है झूठ बोलने की समस्या. जाने अनजाने तो कभी जानबूझकर नादानी में बच्चे कई बार झूठ का सहारा लेते है. क्या आपने कभी सोचा है बच्चे ऐसा क्यों करते है. बच्चों पर ऐसा क्या दबाव है की वे झूठ बोलना जरूरी समझते है. जबकि बच्चे तो कच्ची मिट्टी के समान नाजुक होते है उन्हें जिस सांचे में ढाला जाए ढल जाते है. बच्चों के व्यक्तित्व को सही आकार देने में अभिभावक अपना सब कुछ दाव पर रख देते है. अधिकांश बच्चे छोटी उम्र से ही झूठ बोलने लग जाते है. रिसर्च के अनुसार चार साल का बच्चा दो घंटे में एक बार और छः साल का बच्चा एक घंटे में एक बार झूठ बोलता है. रिसर्च से यह भी सामने आया की झूठ बोलना बच्चों के मानसिक विकास में शामिल है.

सदियों पहले संत कबीर दास जी ने क्या खूब कहा था -”सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप.” इसलिए बच्चों के छोटे से छोटे झूठ को भी अनदेखा ना कीजिए. आपको अंदाजा भी नहीं होगा आगे जाकर आपकी यह लापरवाही कितने बड़े सबक का कारण बनेगी. बड़े होते-होते बच्चों में यह आदत कब लत का रूप ले लेती है पता भी नहीं चलता. बच्चों के पास आपसे या औरों से झूठ बोलने के कई कारण होते है. जैसे-जैसे वे बड़े होने लगते है उनके कारण भी बड़े होते जाते है. इसलिए यह पता लगाना अभिभावक के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता है की बच्चा कब झूठ बोल रहा है और कब सच.

आपने भी कई बार अपने बड़ों से सुना होगा ”बच्चे मन के सच्चे.” अगर यह कहावत सच है तो जरूर बच्चे के आस-पास का माहौल या परवरिश में जरूर कोई कमी या अनदेखी हो रही है. अभिभावक स्वयं को दोष ना दे. बल्कि यह जानने की कोशिश करे की क्या आपका बच्चा भी झूठ बोलना सीख गया है. अगर जवाब हाँ है तो यह सोचे की अब इसका समाधान कैसे हो. बच्चे और समाज के प्रति यह आपकी नैतिक जिम्मेदारी भी है. क्योंकि एक कुशल समाज तभी संभव है जब हमारे बच्चे सच्चे और जिम्मेदार होंगे. आइये जाने बच्चे झूठ किन कारणों से बोलते है और इनका समाधान क्या हैं.

क्यों बोलते है बच्चे झूठ –

* बच्चे झूठ बोलने से पहले उस झूठ के सच का पता लगाते है और एक खास स्किल्स की सहायता से दूसरों से यह जानने की कोशिश में झूठ बोलते है की उन्हें इस बारे में जानकारी है या नहीं. सही जवाब ना मिलने पर खुद पर गर्व करते है और धीरे-धीरे यह खेल झूठ बोलने की गंभीर समस्या बन जाती है.

* आजकल बच्चे तीन साल की उम्र से ही स्कूल जाने लग जाते है और परिवार के सुरक्षित दायरे से बाहर हो जाते है. जहाँ पर बच्चा अलग-अलग प्रकार के बच्चों के संपर्क में आता है. जिससे उनके आचरण में भी बदलाव आता है जो एक स्वभाविक प्रक्रिया है. क्योंकि अधिकांश समय बच्चा इस माहौल में ही अपने दोस्तों के साथ रहता है. इसी संगति में बच्चा कई चीज अच्छी सीखता है तो कई चीज बुरी भी सीखता है. झूठ भी इसी बुरी चीज में से एक हैं.

* कई बार बच्चे अधिक सख्ती या अधिक लाड़-प्यार के कारण भी झूठ बोलने लग जाते है. सख्ती में वे डर के मारे झूठ बोलते है की मार पड़ेगी या सजा होगी और प्यार में वे मनगढ़ंत बातों को बड़े नाटकीय अंदाज में कहते है जिससे उनकी मांग पूरी हो जाती है. चलिए इस पॉइंट को एक तर्क से समझते है – मान लीजिए आपके 5 साल के बच्चे के हाथ से दूध का गिलास टूट गया. आप जैसे ही कारण पूछेंगी तो वो बड़ी मासूमियत से कहेगा ”मम्मा’ छोटू बेबी ने मुझे हिला दिया या बहुत तेज हवा आई और मेरे हाथ से गिलास गिर गया. ऐसे लड़खड़ाते बहाने पर आप फिदा हो जाती है और अपने बच्चे को इस हिदायत के साथ गले लगा लेती है की अगली बार ऐसा ना करियो या ज्यादा से ज्यादा यह बोल देती है बच्चा झूठ नहीं बोलते सच बोलो. लेकिन लाड़-प्यार में यह समझाना भूल जाती है की सच कैसे और क्यों बोलना चाहिए. जिस कारण मासूम सा बच्चा झूठ और सच में फर्क नहीं कर पाता. दूध नहीं पीना तो बहाने, स्कूल नहीं जाना तो बीमारी का बहाना, होमवर्क नहीं करना तो नींद का बहाना. लाड़-प्यार बच्चे का मौलिक अधिकार है लेकिन बच्चा आप ही का है बहाने और सच को समझना भी आप ही की जिम्मेदारी है. क्योकि जब आप बच्चे के झूठ के झाँसे में आते है तो बच्चे को साहस मिलता है बाहर झूठ बोलने का.

* प्री-स्कूल का बच्चा और टीनएजर बच्चों में झूठ बोलने का ढंग अलग-अलग होता है. प्री-स्कूल के बच्चे अपनी काल्पनिक दुनिया की वजह से झूठ बोलते हैं. यह उम्र भी सपनें जैसी होती है. जैसे रेनबो से बातें करना, सुपर हीरोज़ से दोस्ती आदि. ऐसे में बच्चा अपनी हर गलती का जिम्मेदार अपने सॉफ्ट टॉय की ओर इशारा करके करता है. ऐसे में गुस्सा होने के बजाए उनके सुपर हीरोज की अच्छी बातें बताए और प्यार से समझाए की स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे कभी झूठ नहीं बोलते. जब टीनएजर बच्चों की बात माता-पिता नहीं समझते और अधिक पाबंदी लगाते है तो वे झूठ को अपना हथियार बनाते है.

* बच्चों के प्रथम आदर्श और रोल मॉडल उनके माता-पिता होते है. लेकिन आज का परिवेश कुछ अलग है. पेरेंट्स को देखकर बच्चे भी झूठ बोलने लग जाते है. मान लीजिए आपके घर की घंटी बजी और आप अपने बच्चे से कहते है कह देना घर पर कोई नहीं है जबकि आप घर पर ही है. लेकिन बच्चे को आपकी बात माननी होती है और वह दरवाजा खोलकर कह देता है जैसा आप कहने को बोलती है. आप को इस तरह झूठ बोलते देख बच्चे को यही लगता है यह झूठ नहीं सही है. आगे जाकर बच्चा भी यही करता हैं.

ऐसे करे बच्चों में सच बोलने का विकास –

* जैसा की हमने पहले भी कहा है माता-पिता बच्चों के आदर्श होते है उनका पहला स्कूल घर होता है. इस लिहाज से आप अपने बच्चों के प्रथम शिक्षक हुए. इसलिए अपने बच्चों को ऐसे संस्कार, सिख और ऐसी परवरिश दे की वे झूठ ही ना बोल पाए. दूसरा शिक्षक उनका गुरु होता है जो अपने छात्रों को जीवन में नैतिकता के साथ आगे बढ़ने का पाठ पढ़ाता है. शिक्षक को भी अपना कर्तव्य बखूबी निभाना चाहिए.

* अक्सर छोटे बच्चे रोकर या झूठ बोलकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते है. बच्चों की मानने लायक इच्छाओं को पूरा करे और जो नहीं की जा सकती उसके लिए उनमें समझ पैदा करे. उन्हें आपके मना करने का उचित कारण बताएं कि आपने ऐसा क्यों किया. बच्चे को कनविंस करें जिससे आगे से वह आपकी बात मानने लगेगा. यह आपकी ही जिम्मेदारी बनती है की आप वास्तविकता के साथ उनका परिचय करवाए.

* सांच को आंच नहीं, इस बात की जानकारी बच्चों को देते रहे. उन्हें समझाए सच बोलने पर आपको एक बार साहस का सामना करना पड़ेगा लेकिन झूठ बोलने की आदत से आपको बार-बार डर का सामना करना पड़ेगा की कही आपका झूठ सामने ना आ जाए. बच्चों को ऑप्षन दे जिससे वे सही गलत को समझ सके.

* बच्चों को बचपन से ही अपने मन की बात कहने का मौका दे. बच्चा कहकर उनके मन को चोटिल ना करे. कई बार बच्चे जिद्द में कुछ गलत कर जाते है या खुद को सजा के डर से बचाने के लिए झूठ का सहारा लेते है. ऐसे में बच्चों के साथ शुरू से ही पारदर्शिता का रिश्ता कायम करे. उन्हें विश्वास में ले की उनकी समस्या आपकी समस्या है. उन्हें विश्वास दिलाए आप उनपर सबसे ज्यादा विश्वास करते है. ऐसी बॉनडिंग कायम करने पर बच्चा कभी गलत नहीं करेगा और अगर कभी कुछ गलत हो भी गया तो वे आपके साथ शेयर करेंगे. क्योंकि अब वे आपसे डरते नहीं बल्कि आप पर विश्वास करते है की आप सब ठीक कर देंगे. इतना ही नहीं वे आगे से सब कुछ पूछकर करेंगे और सच का साथ देंगे. आज के समय में टीनएजर बच्चों के साथ ऐसी बॉनडिंग बहुत ही जरूरी है. इस उम्र के बच्चों के साथ दोस्ती का माहौल बनाइए, डर का नहीं. इस उम्र में इच्छाए परवान चढ़ती है सही-गलत की समझ और प्यार ही आपके बच्चों को झूठ और डर से बचा के रख सकता है.

* यह हमेशा याद रखिए आप उनके रोल मॉडल है. अगर आप खुद ही हर वक्त झूठ का सहारा लेते है तो बच्चों से सच की उम्मीद कैसे कर सकते है. यह कभी ना भूलिए आपकी नजर चाहे आपके बच्चों पर हो या ना हो लेकिन आपके बच्चे आपको ही फॉलो करते है. इसलिए खुद ऐसा कोई काम ना करे जो आप अपने बच्चों में नहीं देखना चाहते. ये सही है कई बार सामाजिक या पारिवारिक सिचुएशन आ जाती है तब झूठ के सिवा कोई ऑप्षन नहीं होता, तब अपने बच्चे को बारीकी से बताएं कि आपने ऐसा क्यों और किस परिस्थति में किया. इससे बच्चा एक निश्चित व्यवहार करना सीखता है और आपको भी समझता है. बड़े होते बच्चे के साथ परेशानी को साझा कीजिए. लेकिन किसी गलत कारण से झूठ का सहारा ना ले नहीं तो बच्चे पर विपरीत असर पड़ सकता है.

* कभी दिखावा ना करे. बड़ों की इस आदत से बच्चे बहुत जल्द प्रभावित होते है. अगर बड़े किसी भी तरह का शोऑफ करते है तो बच्चे भी अपनी शान दिखाने में ऐसा करने से पीछे नही रहते और झूठ को बढ़ाचढ़ा के कहते है. वे अपनी वास्तविकता को स्वीकार करने में गिल्ट फील करते है और झूठ पर झूठ बोलते रहते है जो आगे उनकी लाइफ में बहुत बड़ी मुश्किल पैदा करती हैं.

* समय-समय पर बच्चो की सच्चाई और ईमानदारी के लिए उन्हें शाबासी दे और प्रोत्साहन के रूप में कभी-कभी उनकी जरूरत की चीज बच्चों को गिफ्ट करे. इससे आपके बच्चे आपके प्यार से बँधे रहेंगे.

* घर में एक सुरक्षित माहौल को बनाए. छोटे बच्चे के झूठ भी बहुत छोटे-छोटे होते है जैसे मैंने टिफिन किसी को नही खिलाया या मेरा होमवर्क मैंने ही किया है या आज मैंने किसी को नहीं मारा. ऐसे बोलने के तरीके से आपको पता चल जाता है बच्चा खुद को बचा रहा है. बच्चों को समय दे उनके साथ खेले और बातें करे. रात को सुलाते वक्त सत्य पर आधारित कहानियों को सुनाए. बच्चा धीरे-धीरे सच और झूठ का अंतर समझ जाएगा. यह याद रखिए आप जैसी नींव डालेंगी इमारत वैसी ही बनेगी.

* ‘आप तो झूठे हो’ का लेबल कभी ना लगाए बच्चों पर. बच्चा झूठ क्यों बोल रहा है यह समझने की कोशिश करे. अधिक नसीहत और लेक्चर से आपका बच्चा आपकी अनसुनी करेगा. बच्चों की संगति पर नजर रखे. बच्चों का चाहे कितना भी बड़ा झूठ सामने आए उस वक्त शांति और निष्पक्षता के साथ बच्चों को चेतावनी दे और अपनी गलती मानने के लिए प्रेरित करे. बच्चे के सफेद झूठ और गंभीर झूठ के फर्क को पहले खुद समझे. अगर बच्चा निरंतर झूठ बोल रहा है तो जल्द प्रोफेशनल काउंसलर या वेलनेस कंसल्टेंट से संपर्क करे और उनकी इस बुरी आदत की वजह जानने की कोशिश करे.

बच्चा चाहे प्री स्कूल की उम्र का हो या टीनएजर, दोनों को आपका समय चाहिए. आज का जीवन बहुत व्यस्त है लेकिन बच्चे आपकी पहली प्राथमिकता है यह माहौल घर पर बनाए. सख्ती और डर आपसे आपके बच्चो को दूर कर देगी. अपने पैरेंटिंग के तरीकों को समयनुसार बदले. यह कोई पुराना समय नहीं है जहा बच्चे आँख दिखाते ही समझ जाए. आज के आधुनिक बच्चों को गुमराह करने के बहुत से साधन है. डाँट और पिटाई से बच्चे का ना सिर्फ आत्मसम्मान कमज़ोर होगा, बल्कि वो और झूठ बोलने लगेगा. प्यार से उन्हें सब सिखाया जा सकता है बस आपके पास उनके लिए पर्याप्त समय होना चाहिए.

एक्सपर्ट्स के अनुसार कई पैरेंट्स दबाव के साथ अपने बच्चे को बहुत बड़ा या मुश्किल लक्ष्य दे देते हैं. ऐसी स्थिति में जब बच्चा अपने पेरेंट्स की उम्मीद पर खरा नहीं उतरता, तो वो झूठ बोलने लगता है या चुप रहने लगता है या अकेला रहना पसंद करता है या गलत संग में रंग जाता है. बच्चे की ऐसी स्थिति ना आपके लिए अच्छी है ना आपके बच्चे के लिए. विशेषज्ञों की माने तो बच्चे जब नाजुक उम्र के दौर से गुजर रहे है तो माँ-बाप उनका हर कदम पर साथ दे, उनका विश्वास जीतकर एक मजबूत रिश्ता कायम करे, उन्हें यकीन दिलाए की आप उनके दोस्त पहले हो पेरेंट्स बाद में, तभी बच्चे आपसे सबकुछ शेयर करेंगे. उन्हें हर चीज को आजमाने का मौका दे, मना ना करे. लेकिन उस काम के फायदे-नुकसान से उन्हें आगाह कर दे. आपके रहते अगर वे अपने काम में फैल हो भी जाए तो कोई बात नहीं, आपकी यह नसीहत भविष्य में आपके बच्चे के जरूर काम आएगी की कोई भी काम करने से पहले विवेक का इस्तेमाल जरूरी है.

बच्चे को समझाए सच खुद अपना वकील होता है और झूठ बेवजह दलील देता है यानी सच बोलने के बाद आपको भविष्य में कुछ भी याद रखने की आवश्यकता नहीं है लेकिन झूठ बोलने पर आपको हर बार यह याद रखना पड़ेगा की कब कौन सा झूठ बोला था. इतना ही नहीं एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ेंगे. जो अनुचित ही नहीं बल्कि महापाप है. झूठ समस्या का समाधान नहीं करता बल्कि जटिलता पैदा करता है. बच्चे को यकीन दिलाए सच आज नहीं तो कल उजागर तो होगा ही, उस स्थिति में आप सब की नजरों में बुरे बन जाओगे. सच चाहे कितना भी मुश्किल हो कहने से शरमाओ मत बल्कि झूठ बोलने से शरमाओ. बच्चों को अपने कठिन जीवन की व्यथा बताओं और कहो की हमने कभी किसी गलत कारण से झूठ का सहारा नहीं लिया. फिर भी हम आज खुश है. क्योंकि सच पर विश्वास करने का मतलब है ईश्वर पर विश्वास करना. सच की राह कठिन जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं. सच की आदत तुम्हें बहुत सारी विपत्ति से बचा के रखेगी.

ऐसा नहीं है की सभी बच्चे झूठ बोलते है जो बच्चे सच बोलना चाहते हैं वे सच बोलेंगे. अगर वे किसी कारण से सच नहीं बोल पा रहे तो ये आपकी पहली जिम्मेदारी है कि आप उन्हें सच बोलने के लिए प्रोत्साहित करें. बच्चों पर दबाव का सहारा ना ले नहीं तो बच्चे जल्दी झूठ बोलने लगते हैं. सभी पेरेंट्स अपने बच्चे की बेहतर परवरिश करते है की उनका बच्चा उनसे भी बेहतर करे. इसलिए समय-समय पर बच्चों की रियलिटी चैक करते रहे.

इस लेख के माध्यम से हमने आपकी मदद करने की एक छोटी सी कोशिश की है. अगर इस लेख से आपको किसी भी तरह का मार्गदर्शन मिलता है तो इस लेख का लिखना हमारे लिए सार्थक हो गया. आपको हमारा लेख कैसा लगा? हमने सत्य और सदाचार व्यक्तियों के जीवन और अपने अनुभव के आधार पर आपसे ज्ञानवर्धक जानकारी साझा की है. किसी भी निष्कर्ष या अपने बच्चों के प्रति कोई धारणा बनाने से पहले अपनी सूझ-बुझ का इस्तेमाल हमेशा करे. सदैव खुश रहे और स्वस्थ रहे.

सत्यमेव जयते!

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