बच्चों को डे-केयर में भेजने से पहले फायदे और नुकसान को जानें

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आधुनिकता जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है उतनी ही तेजी से लोगों का जीवन जीने का तरीका भी बदल रहा है. आज से कुछ वर्षो पहले तक लोग संयुक्त परिवार को पसंद करते थे. जिसमे बच्चों की परवरिश भी बहुत अच्छी होती थी. लेकिन आज ऐसा नहीं है. वर्तमान में एकल परिवार का चलन ज्यादा है जिसमे बच्चों का सही लालन-पालन एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. इतना ही नहीं छोटे बच्चों को संभालना मुश्किल तो है ही साथ ही थकान भरा भी है. वर्किंग पेरेंट्स के लिए बच्चों की सही और सुरक्षित परवरिश एक बहुत बड़ी समस्या है. घर पर किसी का साथ ना होने की वजह से अधिकांश माता-पिता बच्चों की उचित देखभाल और परवरिश के लिए डे-केयर या घर पर किसी आया की सुविधा लेते है.

कई बच्चों का डे-केयर में विकास बहुत अच्छा होता है तो कई बच्चों पर इसका विपरीत असर भी पड़ता है. मुश्किलें तो आती है लेकिन फिर भी कई मौजूदा परिस्थिति में बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से डे-केयर एक अच्छा विकल्प है. जिन अभिभावकों की आय कम होती है या जिनके पास समय का बहुत ही अभाव होता है वे अपने बच्चों के लिए डे-केयर की मदद से अच्छी देखभाल कर सकते है और अगर आपके पास पैसे की कोई समस्या नहीं है तो आया का विकल्प भी बहुत अच्छा है. आया की व्यवस्था किसी विश्वसनीय संस्था के द्वारा बड़ी आसानी से कर सकते है समस्या आने पर आप संस्था में शिकायत या दूसरी आया की डिमांड भी कर सकते है.

डे-केयर में आप अपने जिगर के टुकड़े को भेज रहे है तो इसके फायदे और नुकसान की जानकारी भी आपको होनी चाहिए. आखिर सवाल आपके बच्चों का है. तो आइये जानें डे-केयर के फायदे व नुकसान के बारे में.

फायदे –

1. नियम व अनुशासन – डे-केयर के सभी नियम हर माता-पिता के लिए बिल्कुल एक जैसे होते है. जैसा की स्कूलों में सभी के लिए एक नियम होता है. बच्चे को डे-केयर में लाने लेजानें जैसे नियम. इसमें कोई लापरवाही नहीं चलती. ऐसे ही कई नियम जिसका पालन सभी को समान रूप से करना पड़ता है. इसके अलावा दूसरे अभिभावकों से मेलजोल बढ़ता है जिससे समय आने पर एक दूसरे की मदद ले सके.

2. बच्चों की सेफ्टी – डे-केयर की शुरुआत बिना लाइसेंस के नहीं की जा सकती. यहाँ काम करने वाले सभी ट्रेनर अनुभवी और प्रशिक्षित होते है. इस लिहाज से आपके बच्चे पूरी तरह से सुरक्षित होते है. आपके बच्चों की सुविधा को देखते हुए यहाँ सभी तरह की आवश्यक चीज़े मौजूद होती है जिससे बच्चों का मन बहल सके और शारीरिक व मानसिक विकास भी पूर्ण रूप से हो.

3. सरल व सस्ता साधन – एकल परिवारों में बच्चों को संभालने के लिए कोई हेल्प की आवश्यकता तो पड़ती है. घर पर आया की व्यवस्था डे-केयर से ज्यादा महँगी पड़ती है. आया को अपने रिस्क पर घर पर रखना पड़ता है. जो थोड़ा मुश्किल फैसला होता है. इसी कारण अधिकांश लोग डे-केयर के विकल्प को बेस्ट समझते हैं.

4. कुशल व्यवहार – आजकल कामकाजी अभिभावकों के एक या दो बच्चे होते है. जिस कारण उनकी जिद्ध भी पूरी होती है. लेकिन डे-केयर में ऐसा नहीं होता. बच्चे मिलजुल कर रहना सीखते है. एक दूसरे के साथ अपने खिलौने शेयर करते है. थोड़े बड़े बच्चों की तो एक दूसरे से बहुत अच्छी बॉनडिंग हो जाती है. धीरे-धीरे बच्चे एक दूसरे को अपना दोस्त समझने लग जाते है. इस तरह से आपके बच्चे कुशल व्यवहार के गुण सीख जाते है.

5. विभिन्न प्रतिभा – डे-केयर में बच्चों को बहुत से ज्ञान से रचा जाता है. जैसे पेंटिंग, डांस, गाने, कहानी, ड्रामा आदि. इससे माता-पिता भी खुश रहते है की उनके बच्चों को तरह-तरह प्रतिभा सिखाई जा रही है. इतना कुछ माता-पिता एक साथ अपने बच्चों के लिए नहीं कर पाते. बच्चों को इस तरह की गतिविधियों को सिखाने के लिए वहाँ प्रशिक्षित लोगों को रखा जाता है. बच्चे व्यस्त रहते है तो उनका दिमाग भी अधिक चलने लगता है.

नुकसान –

1. बच्चों को संक्रमण का खतरा – डे-केयर में विभिन्न तरह के बच्चे होते है जिनका साथ में खाना-पीना, खेलना, सोना आदि होता है. अगर किसी बच्चे को पहले से कोई इंफेक्शन है तो वो इंफेक्शन आपके बच्चे को कब हो जायें कहना मुश्किल है. क्योंकि छोटे बच्चे बहुत ही सेंसेटिव होते है. इनमें जल्द बीमार होने का खतरा ज्यादा होता है. ऐसे में आया का विकल्प ज्यादा सुरक्षित है. डे-केयर में डॉक्टर की सुविधा तो होती है लेकिन इतने बच्चों में संक्रमण से सुरक्षा थोड़ा मुश्किल है.

2. बच्चों से दूरी का डर – डे-केयर की देखभाल से आपके बच्चों के विकास पर विपरीत असर भी पड़ सकता है. जब पेरेंट्स अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते तो बच्चों का लगाव आपके साथ कम हो सकता है. हो सकता है बड़े होने पर आपके साथ आपके बच्चों का तालमेल ना बैठे. सही-गलत की जो शिक्षा अभिभावक अपने बच्चों को दे सकते है वो कमी की पूर्ति डे-केयर कभी नहीं कर सकता. बच्चों में रिश्तों का मोल घटते जाता है और अपनी काल्पनिक दुनिया को ही सही मानने लग जाते है.

3. यह निर्णय आपको प्रभावित कर सकता है – अधिकांश डे-केयर अपने हिसाब से आपके बच्चों की डेली रूटिंग को तय करते है. जैसे बच्चे को कब खाना है, खेलना है, सोना है या फिर कब आपके बच्चे को दूध छोड़ना है. डे-केयर में भेजने के निर्णय से हो सकता है आप इस तरह से प्रभावित हो. कई माता-पिता तो समझोता कर लेते है लेकिन कइयों को समस्या आ भी सकती है. बच्चे तो बच्चे होते है वो दोहरी रूटिंग को नहीं झेल पाते और चिड़चिड़े हो जाते है जिसका कारण माता-पिता नहीं समझ पाते.

आप किन परिस्थिति में अपने लाड़ले को डे-केयर में भेजती है यह आपसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता. लेकिन हम आपको एक सुझाव देना चाहते है अगर संभव हो तो आप आपस में समय का ऐसा तालमेल बैठाए की कोई ना कोई आपमें से एक हर वक्त बच्चे के पास हो. या फिर दादा-दादी, नाना-नानी में से किसी को कुछ-कुछ अंतराल में रहने के लिए कहिए. घर पर सी सी टीवी कैमरा की सहायता से आया का विकल्प भी बुरा नहीं है. आया को अपने घर पर विश्वसनीयता और अनुभव के आधार पर ही रखे. कभी-कभी अचानक से घर आ कर देखे की आया आपके बच्चे को कैसे संभालती है.

आजकल बहुत सी कंपनियाँ बच्चों को रखने के लिए ऑफीस में ही कुछ लागत पर क्रेच की सुविधा देती है महिलाओं को. अगर यह ऑप्षन आपको मिलता है तो यह बेस्ट है आपके बच्चे के लिए. इससे आपका बच्चा हर वक्त आपकी नजरों के सामने होगा और आपके बच्चे को भी माँ का प्यार मिलता रहेगा. अगर किसी ऑफीस में 50 से ज्यादा महिलाएँ काम करती है तो सरकारी नियम के आधार पर क्रेच की सुविधा ऑफीस को देनी पड़ती है आप इसकी डिमांड रख सकती है.

बच्चे आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और सबसे बड़ी धरोहर भी. इनकी अच्छी परवरिश के लिए कुछ समझोता खुद के साथ कर लीजिए. बच्चे के थोड़े बड़े होने के बाद तो डे बोर्डिंग स्कूल का विकल्प आपके पास है ही. 5-6 साल की उम्र तक बच्चों को माता-पिता की अधिक आवश्यकता होती है. बड़े होने के बाद तो बच्चों को प्यार से समझाना आसान हो जाता है बच्चे भी समझने लगते है अपने पेरेंट्स की दुविधा को. जन्म दिया है तो पालने-पोषने की जिम्मेदारी भी अभिभावक की ही होती है. बच्चों के बचपन में अगर आप उनका साथ देंगे तो कल बुढ़ापे में आपके बच्चे आपका साथ देंगे. ऐसी परवरिश तो सिर्फ आप ही दे सकते है अपने बच्चे को.

हमने आपसे एक सुझाव साझा किया है. परिस्थिति के आधार पर आपका फैसला ही आपके बच्चे के लिए सही होगा. हमेशा अपनी सूझ-बुझ का इस्तेमाल करे. सदैव खुश रहे और स्वस्थ रहे.

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