FIR के बारे में वह सब जो आप नहीं जानते

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भारत जैसे विशाल देश में कानून व्यवस्था स्थापित करने के लिए विभिन्न प्रकार के नियम और कायदे बनाए गए हैं उसी में से एक है हमारी पुलिस व्यवस्था। पुलिस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य भारत में आंतरिक रुप से शांति बनाए रखना है लेकिन हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो पुलिस स्टेशन जाना चाहता हो इसका कारण यह है कि आमतौर पर लोग पुलिस के द्वारा की जाने वाली कार्यवाही से डरते हैं क्योंकि उनको पूर्ण रुप से इसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छानबीन एवं गुनहगार तक पहुंचने तक की प्रक्रिया की शुरुआत कहां से होती है? शायद आप यह बात नहीं जानते होंगे इसीलिए आज हम आपको पुलिस छानबीन की शुरुआती प्रक्रिया FIR के बारे में यानी की प्राथमिक सूचना रिपोर्ट से जुड़ी हर जानकारी देंगे।

जब भी कोई अपराध होता है तो पुलिस कार्यवाही के लिए सबसे पहले प्राथमिकी या प्राथमिक की सूचना रिपोर्ट दर्ज करती है इसे FIR कहा जाता है यह एक प्रकार का लिखित प्रपत्र होता है जिसमें पुलिस के द्वारा इस बात को निर्धारित किया जाता है कि उन्हें अपराध की सूचना प्राप्त हो चुकी है और अब इसके लिए क्या कार्रवाई की जाएगी।

यह सूचना पुलिस के पास किसी व्यक्ति के द्वारा आती है जिसे शिकायत दर्ज करानी होती है यह व्यक्ति लिखित या मौखिक रूप से शिकायत दर्ज करा सकता है। लेकिन कई बार पुलिस FIR से पहले प्राथमिकी दर्ज करती है ऐसे में अगर आपको FIR ही दर्ज करानी है तो आपको न्यायालय का सहारा लेना पड़ेगा। भारतीय दंड संहिता 1973 की धारा 154 के तहत कोर्ट यह ऑर्डर देगा की FIR दर्ज कराई जाए FIR एक बहुत महत्वपूर्ण सूचनात्मक दस्तावेज होता है जिसके आधार पर पुलिस कानूनी कार्रवाई को सुचारु रुप से आगे बढ़ाती है।

कब दर्ज होती है FIR ?

कई बार कुछ ऐसे अपराध होते हैं जिसमें FIR दर्ज नहीं की जाती। FIR उस केस में दर्ज की जाती है जिसमें पुलिस को किसी वारंट की जरूरत नहीं होती इसके तहत पुलिस को अधिकार होता है कि वह आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार करें और उसकी जांच पड़ताल करें अगर व्यक्ति पर कोई संज्ञेय नहीं है तो उस व्यक्ति पर FIR दर्ज नहीं कराई जाएगी ऐसी स्थिति में बिना कोर्ट की इजाजत के कार्यवाही कर पाना संभव नहीं है।

FIR दर्ज कराने का तरीका

अगर आपको FIR दर्ज करानी है तो आप सीधा थाने जाकर लिखित या मौखिक तौर पर बयान दे सकते हैं जिसके आधार पर FIR दर्ज होती है।

दूसरे तरीके में आप PCR पर कॉल कर सकते हैं जिसके आधार पर जाँच कर FIR दर्ज की जाती है।

तीसरा तरीका वारदात की खबर मिलने पर थाना अधिकारी या ड्यूटी ऑफिसर वहां पर जाकर चश्मदीदों के बयान लेकर एक आधार तैयार करता है जिसके अनुसार ही FIR दर्ज की जाती है लेकिन यह तरीका सिर्फ जगन अपराधों में ही अपनाया जाता है।

FIR दर्ज कराने में क्यों लगता है समय ?

यह बात हमने अक्सर सुनी है कि FIR दर्ज कराने में पुलिस बहुत आनाकानी करती है क्योंकि वारदात की प्रामाणिकता जानने बगैर FIR दर्ज कराने में समस्या होती है। वारदात की प्रामाणिकता जानने बगैर FIR दर्ज नहीं की जा सकती बाइक कार अन्य कोई सामान चोरी होने पर पुलिस तुरंत FIR दर्ज कर सकती है लेकिन किसी और वारदात के चलते पुलिस को पूरी छानबीन करनी पड़ती है। दरअसल कोई भी ASI ये नहीं चाहता कि उसके थाने में FIR की संख्या में इजाफा हो। इसके अलावा सभी पुलिस स्टेशनों में स्टाफ की भारी किल्लत है जिसकी वजह से पुलिसकर्मी FIR दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। हर FIR की कॉपी थाने से एसीपी एडिशनल, डीसीपी एडिशनल, डीसीपी, डायरेक्ट डीसीपी एवं मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को भेजी जाती है एवं जघन्य FIR की कॉपी क्षेत्र के ज्वाइंट कमिश्नर को भी भेजी जाती है।

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