बच्चों को कैसे बनाएँ हरफनमौला?

इस भागमभाग की जिंदगी में आजकल बच्चों का जीवन भी बहुत संघर्षमय हो गया है। बच्चें अपना बचपन भूलते जा रहे हैं। छोटी सी उम्र में ही बच्चों के पास टेंशन ज्यादा और समय कम। जिस कारण बच्चें अपनी दिनचर्या को ठीक से संतुलित नहीं कर पाते। दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है की आजकल के माता-पिता के पास भी अपने बच्चों के लिए पर्याप्त समय नहीं हैं। जिस कारण बच्चें अपने माता-पिता से खुलकर बात नहीं कर पाते। ऐसे में पेरेंट्स की यह जिम्मेदारी बनती है की वे अपने बच्चों को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनाए और उन्हें हर परिस्थिति से निपटने में सक्षम बनाए। बड़ों की तरह बच्चों को भी घर बाहर दोनों जगह संघर्ष करना पड़ता है। जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही, यह विचारधारा बच्चों के मन में बचपन से ही धीरे-धीरे समय अनुसार विकसित करें। क्योंकि संघर्ष ही बच्चों को आत्मनिर्भर, अधिकार, उत्तरदायित्व आदि भावनाओं के विकास में मदद करता है।

जिस तरह हम बच्चों को बचपन से ही अनुशासन, सही-गलत, फिज़ूलखर्ची, शिक्षा का महत्व, समय और पैसे की बचत की शिक्षा देते हैं। ठीक उसी तरह हमें अपने बच्चों से छोटे-छोटे घर के काम भी करवाने चाहिए। बच्चों में बचपन से ही काम करने की आदत होनी चाहिए। इससे बच्चों में शिष्टाचार, जिम्मेदारी, सक्रियता का पूर्णरूप से विकास होता है। जो आने वाले समय की माँग भी है। लेकिन आज की विडंबना यह है कि माता-पिता अपने बच्चों को काम देने से थोड़ा कतराते हैं। आजकल संयुक्त परिवार का माहौल नहीं है इसलिए वे अपने एक या दो बच्चों की परवरिश ऐसे करते है जैसे उनके सामने कभी कोई परेशानी आएगी ही नहीं……..जबकि बच्चों के एक्सपर्ट यह कहते है की अगर बच्चें घर के कामों में बचपन से ही रूचि लेते है तो वे अपनी जिम्मेदारी के प्रति सक्रिय हो जाते है जो उनके भविष्य के लिए हितकर होगा।

1. बच्चे समझदार बनते हैं – काम चाहे जो भी हो हर काम में दिमाग का इस्तेमाल जरूर होगा। इसलिए जो बच्चे बचपन से ही घर के काम में मदद करते हैं, वे बच्चे पढ़ाई या किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा में भी आगे रहते है। घर के छोटे-छोटे काम करने से बच्चों में आत्मविश्वास उम्र के साथ बढ़ता ही जाता है, जिससे वे हर काम अच्छे से करना सीखते हैं। यह गुण बच्चों के भावी जीवन को खुशहाल बनाता हैं।

2. बच्चे दूसरों की सहायता स्वयं करना सीखते है – जो बच्चे घर में हाथ बँटाते हैं, वे अपनों से बड़ों का, दोस्तों का और समाज के कार्य में जरूरत पड़ने पर हर कार्य में रूचि लेते है। ऐसे बच्चे किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं समझते। घर के काम करने से वे सीखते हैं कि उन्हें जरूरतों का ख्याल करना चाहिए। बच्चों से घर के काम ना करवाए जाएं, तो उन्हें लगता है कि उनके काम दूसरों को करने चाहिए। क्योंकि बचपन से ऐसे बच्चे यही देखकर बड़े होते है की उनके काम दूसरे ही करेंगे। जो धीरे-धीरे उनकी आदत बन जाती है और वे आलस्य के शिकार हो जाते है।

3. परिवार में बढ़ती है एकता – घर के काम करने से बच्चे समझते हैं कि वे भी परिवार का एक अहम हिस्सा हैं और परिवार के प्रति वे भी जिम्मेदार हैं। लेकिन घर के कार्यो के बजाय स्कूल के बाद कोई हुनर या खेल सीखने पर ज्यादा जोर दें, तो बच्चे सिर्फ वहीं बातें सीख पाएंगे। बच्चों को हर परिवेश के लायक बचपन से ही तैयार करें। जिससे वे भविष्य में आने वाली किसी भी परिस्थिति में हीन भावना से ग्रस्त नहीं होंगे की हमसे हमारे पेरेंट्स ने कभी ये काम करने को ही नहीं कहा तो अब हम कैसे करें। जैसा की हम जानते है मिलजुल कर काम करना हर समस्या का हल है। इस तरह बच्चे अपने परिवार की एकता को बढ़ाते हैं।

4. आत्मनिर्भर बनेंगे बच्चे – शुरू से ही बच्चों में घर के कामों को करने की आदत होने से बच्चे आत्मनिर्भर बनते हैं। उन्हें जब भी घर से बाहर पढ़ने या नौकरी करने के लिए जाना पड़ता है उस वक्त उन्हें काम करने की आदत की वजह से परेशानी का सामना नहीं करना पढ़ता और ना ही किसी पर निर्भर होना पढ़ता है।

बच्चों को पढ़ाई का महत्व जरूर सिखाए लेकिन साथ ही साथ अपनी दिनचर्या और घर के कामों के प्रति सतर्क और संघर्षशील भी बनाए। जिससे बच्चे शुरू से ही मेहनती बनते हैं और एक ही समय में कई कामों को निपूर्णता के साथ कैसे करते है यह हुनर बच्चों को विकासशील बनाता है। किसी काम को करते समय अगर बच्चों के समक्ष कोई समस्या आ जाएं तो उनकी मदद करें उन्हें समझाए की किसी भी काम को करने का सही तरीका क्या है और गलत क्या है। बच्चे कच्ची मिट्टी के घड़े के समान होते है आप उन्हें जिस सांचे में ढालेंगे वो वही सीखेंगे।

बच्चों को हम अपने सुरक्षा रूपी कवच में सदा कैद करके नहीं रख सकते। इसलिए उनकी ढाल नहीं उनके पंख बनिये। संघर्ष का सामना जब हमने अपने जीवन में किया है तो क्या हमारे बच्चे इससे वंचित रहेंगे। संघर्ष तो जीवन का हिस्सा हैं। जब हम उनके साथ नहीं होंगे तो हमें यह सोचकर याद करे की हमारे माँ-बाप ने हमें इतना सक्षम बनाया है की अब हम किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकते है। हम आत्मनिर्भर है!

बच्चों को काम के प्रति ऐसा रुझान लाएँ की उन्हें काम में भी मनोरंजन दिखे। पढ़ाई बच्चों को मानसिक और कार्यकौशल शारारिक बल देता है। इसलिए दोनों में बच्चों का सही संतुलन बनाए। बच्चों को समार्ट बनाने में अपनी भूमिका निभाए। बच्चों के लिए समय निकाले। सिर्फ एक अच्छी स्कूल बच्चों को बहुत कुछ सीखा सकती है लेकिन सब कुछ नहीं, जो उनके माँ-बाप सीखा सकते है।

हमने अपनी तरफ़ से एक विचार सांझा किया है। अगर आपको इसमें कोई त्रुटि दिखे, तो जरूर अपनी राय दे। सभी पेरेंट्स जानते है उन्हें अपने बच्चों की परवरिश कैसे करनी है इसलिए हमने अपने लेख के द्वारा सिर्फ एक विचार सांझा किया है। आपको हमारा लेख कैसा लगा जरूर बताएँ।

“अपने बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाएं इन आसान तरीकों से”

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