बॉल पॉइंट पेन के आविष्कार की दिलचस्प कहानी

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बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार विज्ञान जगत में किसी क्रांति से कम नहीं हैं, लिखने के लिए आज बॉल पॉइंट पेन का इस्तेमाल पूरी दुनिया में होता है। लेकिन क्या आप इसके इतिहास के बारे में जानते हैं? आखिर किसने बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार किया और किस तरह से ये प्रयोग में आने लगा ? शायद बहुत कम लोगों को ही इसके बारे में जानकारी होगी। तो आइये आज हम आपको बॉल पॉइंट पेन के आविष्कार के बारे में पूरी जानकारी देते हैं।

दरअसल बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार आज से करीब 8 दशक पुराना है, इसका आविष्कार सन 1931 में हुआ था और इसका आविष्कार करने वाले शख्स का नाम है लेडिस्लाओ जोस बिरो हालाँकि इन्होने बाद में खुद का नाम बदलकर “लाजियो जोसेफ बिरो” रख लिया था और आगे चलकर ये इसी नाम से विख्यात हुए। इनके नाम पर ही इस पेन का नाम रखा गया था “बिरो पेन”। दरअसल जोस बिरो मूल रूप से हंगरी के बुडापेस्ट शहर के हैं और यहीं 1899 में इनका जन्म हुआ था। लेडिस्लाओ जोस बिरो पेशे से पत्रकार, चित्रकार और आविष्कारक थे।

दरअसल उस दौर में फाउंटेन पेन काफी चलन में था लेकिन लिखते समय इसकी स्याही से होने वाले धब्बों से जोस बिरो काफी परेशान हो जाते थे। ऐसे में इनके मन में ख्याल आया की क्यों ना ऐसा पेन बनाया जाए जिसकी स्याही जल्दी से सूख जाये जिससे लिखते समय धब्बे ना पड़ें। जोस बिरो उस दौरान हंगरी में पत्रकारिता करते थे और उन्होंने गौर किया की अख़बारों की छपाई में जो स्याही काम में आती है वो थोड़ी जल्दी सूख जाती है और इससे कागज़ पर धब्बे पड़ने की दिक्कत नहीं होती। फिर इन्होने एक प्रयोग किया और एक फाउंटेन पेन में अखबार की छपाई में काम ली जाने वाली स्याही डाली। लेकिन इस प्रयोग से कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली क्योंकि ये स्याही फाउंटेन पेन के लिए बहुत मोटी थी जिस कारण ये फाउंटेन पेन की निब तक पहुँचने में काफी समय लगाती थी।

इसके बाद से इन्होने बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार करने की ओर कदम बढ़ाया और फिर इन्होने एक ऐसी निब बनाई जिस पर इन्होने स्याही की एक पतली सी परत लगाई और इस निब में एक छोटी सी बॉल लगाई। जब भी इस निब से कागज़ पर लिखावट की जाती थी तो निब की बॉल घूमती थी और कार्टेज से स्याही प्राप्त करती थी। इस प्रयोग से जोस बिरो बॉल पॉइंट पेन बनाने में सफल हुए लेकिन अब इन्होने ऐसी स्याही बनाने की सोची जो इस पेन के लिए सही हो और जिसकी चिपचिपाहट भी लिखावट और इस पेन की निब के लिए एकदम अनुकूल हो। जोस बिरो के भाई की मेडिकल शॉप थी और उसी की मदद से जोस बिरो ऐसी स्याही बनाने में भी कामयाब रहे। इस सफल आविष्कार के बाद इन दोनों भाइयों ने 15 जुलाई 1938 को इस पेन को “बिरो” नाम से पेटेंट करवाया।

1940 में हंगरी पर नाजियों ने कब्ज़ा कर लिया था और ऐसे में कई नागरिकों समेत जोस बिरो को भी देश छोड़ना पड़ा था और यहाँ से जोस बिरो अर्जेंटीना चले गए। अर्जेंटीना में भी जोस बिरो ने अपने इस बॉल पॉइंट पेन का खूब प्रचार किया और इसके फायदे लोगों को बताये। इसके परिणाम स्वरुप इन्हें ब्रिटेन के रॉयल एयर फोर्स के रूप में अपने पेन का सबसे पहला खरीददार मिला। इस संगठन को ये पेन काफी पसंद आया क्योंकि फाउंटेन पेन के मुकाबले ये पेन काफी अच्छी लिखावट देता था और ऊंचाई पर भी बड़ी आसानी से काम करता था। इसी के चलते इस संगठन ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जोस बिरो को 30,000 पेन का आर्डर दिया।

यूँ तो इस पेन को आज के समय में बॉल पॉइंट पेन के नाम से जाना जाता है लेकिन ब्रिटेन, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और इटली जैसे देशों में आज भी इस पेन को “बिरो” पेन के नाम से ही जाना जाता है। आज के समय में बॉल पॉइंट पेन में कई बदलाव हो चुके हैं आज इस तरह के पेन की निब सामान्यतः पीतल, स्टील या टंगस्टन कार्बाइड जैसे धातुओं से बनाई जाती है।

आज की बात करें तो बॉल पॉइंट पेन दुनियाभर में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला पेन बन चुका है। आपको जानकर आश्चर्य होगा की अमेरिका में चाहे कितनी भी महंगाई हो गई हो लेकिन बिरो पेन की कीमत 1959 से अब तक नहीं बदली है, आज भी ये पेन वहां 19 सेंट में उपलब्ध है।

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