चाचा नेहरू

पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम आते ही बच्चो के मुँह से निकलता है – चाचा नेहरू! यह बच्चो के प्रति उनका प्यार दर्शाता है। सभी बच्चे इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते है, क्यूंकी बाल दिवस पर बच्चो के लिए स्कूल ओर घर दोनो जगह पे होता है कुछ ख़ास! उन्हे उपहार स्वरूप कुछ ना कुछ मिलता भी है, यही उनकी खुशी ओर उत्साह का कारण होता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन बाल्यकाल से ही कुछ खास तरीके से मनाया जाता था। उनके जन्मदिन पर उनको तराजू से तौला जाता था। उन्हे एक तरफ बिठा देते थे और दूसरी तरफ कपड़े, अनाज और मिठाइया रखी जाती थी वो भी उनके वजन के बराबर और वो सब ग़रीब बच्चो में बाँट दिया जाता था। इस बात से वो बेहद खुश होते थे और इससे प्रभावित होकर उन्होने अपने पिताजी से पूछा की जन्म दिन साल में एक से ज़्यादा बार भी तो माना सकते है, जिससे की अधिक से अधिक लोगो की सहायता हो जाए। ये उनकी उदारता को दर्शाता है।

चाचा नेहरू का मानना था की “बच्चे बगीचे की कलियो की तरह होते है, उनका लालन पालन बड़े ही ध्यान से ओर प्यार से करना चाहिए वे राष्ट्र के भविष्य है और कल के नागरिक”।

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद के आनंद भवन में हुआ। उनके पिताजी मोतीलाल नेहरू एक जाने माने वकील थे। उनकी माँ स्वरूप रानी स्वभाव से सहज ओर धार्मिक महिला थी। उनके पिताजी मोतीलाल नेहरू बेहद ही अनुशासन प्रिय थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही एक अँग्रेज़ी शिक्षक के माध्यम से हुई। उनके पिताजी को पाश्चात्य रंग-ढंग बहुत प्रिय था। अत: उन्होने 13 मई 1905 को हेरौ (Harrow) शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेज दिया। हेरौ की एक प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल जहाँ अंग्रेज़ो के बच्चो को शिक्षा दी जाती थी। उस स्कूल का नाम “हेरौ स्कूल” था। जवाहरलाल नेहरू बचपन से ही मेघावी थे। उन्होने कॉलेज की डिग्री लंदन से तथा लॉ की डिग्री “केम्ब्रिज विश्वविद्यालय” से पूरी की।

उनकी सबसे बड़ी इच्छा बचपन से ही भारत को स्वतंत्रता दिलाना था, यह उनकी इस भावना से जाहिर होता है – उनके पिताजी मोतीलाल नेहरू ने एक तोता पाल रखा था, जो उन्हे बहुत प्रिय था, उसकी देख-रेख के लिए उन्होने एक नोकर भी रख रखा था। एक दिन नेहरू जी ने पिंजरे में क़ैद तोते को आज़ाद कर दिया. यह बात मोतीलाल नेहरू को पता चली तो वो काफ़ी नाराज़ हुए और तुरंत जवाहर को बुलाया ओर उनसे इसका कारण पूछा, तो उन्होने बड़े ही भोलेपन से बताया “की हम और आप सभी स्वतंत्रता चाहते है, तो इस तोते को क़ैद क्यूँ किया जाए”।

सन 1912 में वो शिक्षा प्राप्त कर भारत आए और अपने पिताजी के साथ वकालत करने लगे। सन 1915 में ‘रोल एक्ट’ के विरुध होने वाली सुनवाई में कॉंग्रेस की तरफ से भाग लिया, यहीं से उनका राजनीतिक जीवन प्रारंभ हुआ।

सन 1916 में श्रीमती कमला जी के साथ इनका विवाह हुआ और 19 नवंबर 1917 को इनके यहाँ पुत्री का जन्म हुआ। जिन्हे जवाहरलाल नेहरू प्यार से प्रियदर्शनी कहकर बुलाते थे क्यूंकी वो दिखने में बहुत सुन्दर थी।

कुछ दिन पश्चात वो कॉंग्रेस के सदस्य बन गये। वो गाँधी जी से काफ़ी प्रभावित थे। गाँधी जी से मिलने के बाद उन्होने पश्चिमी कपड़े और महँगी वस्तुओ का त्याग कर दिया तथा ‘सादा जीवन उच्च विचार’ को अपनाया। वो खादी कुर्ता ओर गाँधी टोपी पहनने लगे।

पंडित नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष बने और उन्होने इस पद पर शहर के मुख्य कार्यकारी के रूप में दो वर्ष तक अपनी सेवाए दी। 1929 में वो कॉंग्रेस दल के अध्यक्ष चुने गये, इसी सत्र में एक प्रस्ताव पारित हुआ और उसमे “पूर्ण स्वराज्य” की माँग की गयी। 26 जनवरी 1930 को लाहौर में नेहरू जी ने भारत का झंडा स्वतंत्र रूप से फहराया। सन 1931 में उनके पिताजी ओर 1936 में उनकी धर्म पत्नी कमला नेहरू का निधन हो गया। जिससे वो काफ़ी हताश हुए और उन्होने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला। सन 1942 से 1946 तक वो अहमद नगर की जेल में थे तो उन्होने ‘भारत एक खोज’ नामक किताब लिखी। जिसमे उन्होने भारत की गौरव गाथा ओर इतिहास का बहुत ही सुन्दर तरीके से वर्णन किया है।

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात वो स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री चुने गये। जो हर किसी के लिए बेहद ही गौरवपूर्ण है। वो बहुत ही दृढ़ निश्चय और मेहनती थे उनका कहना था की “आप तस्वीर के चेहरे दीवार की तरफ मोड़कर इतिहास का रुख़ नही बदल सकते”।

उन्होने संसदीय सरकार की स्थापना की तथा साथ ही साथ विदेशी मामलो में ‘गुट निरपेक्ष’ नीति की शुरूवात की और विश्व मानचित्र पर भारत को एक नयी पहचान दिलाई। इनकी लिखी हुई बहुत सी ऐसे किताबे जिसमे ‘मेरी कहानी, भारत एक खोज, विश्व इतिहास की झलक, पिता का खत पुत्री के नाम आदि विश्व विख्यात है।

27 मई 1964 को सुबह इस महान आत्मा की तबियत अचानक खराब हुई, डाक्टरो के मुताबिक उन्हे दिल का दौरा पड़ा था। दोपहर 2 बजे चाचा नेहरू हम सब को छोड़कर इस दुनिया से विदा लेके हमेशा हमेशा के लिए चल दिए। युग दृष्टा नेहरू भारतीयो में एक नयी सोच और एक उर्जा भरकर पंचतत्व में विलीन हो गये। उन्होने पूरे विश्व में शांति स्थापित करने का प्रयास किया। वो अपना अधिकतर समय देश की समस्याओ को सुलझाने में लगाया करते थे। वो एक महान वक्ता ओर लेखक थे। वो राष्ट्र की एकता ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास रखते थे। उनकी वसीयत के अनुसार उनकी भस्म खेतो ओर गंगा नदी में प्रवाहित की गयी। इस तरह इस महान नेता का नाम भारतीय इतिहास में चीरकाल तक अमर हो गया।

वो अपना कार्य खुद करने में विश्वास रखते थे, उनका मानना था कि “आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है”।

आज बाल दिवस पर हमे भी यह संकल्प करना चाहिए की हम अपना हर कार्य सतर्क और जागरूक होकर करे ताकि गाँधी ओर नेहरू के सपनो के भारत के निर्माण में अपना योगदान दे सके।

नेहरू जी की इस बात को ध्यान में रखते हुए हमे आगे बढ़ना चाहिए कि “असफलता तभी आती है जब हम अपने आदर्श, उदेश्य और सिदान्त भूल जाते है”।

“राजीव गांधी के जीवन से जुड़े रोचक तथ्य”

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