आइये जानते हैं छप्पन भोग क्या है। हिंदू धर्म में छप्पन भोग का विशेष महत्व है। 56 भोग का महत्व भगवान कृष्ण से सबसे अधिक जुड़ा है। भक्त अपने भगवान को प्रसन्न करने हेतु, त्योहारों पर या किसी मनोकामना के पूर्ण होने पर भगवान को छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ाते है।

जिसे छप्पन भोग के नाम से जाना जाता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है की आखिर छप्पन भोग का ही सदियों से क्यों महत्व है? क्या-क्या होता है इस छप्पन भोग में और इसके पीछे क्या धारणाएँ हैं।

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छप्पन भोग क्या है?

छप्पन भोग का गणित – मधुर, तीखा, कटु, कषाय, अम्ल और लवण यह छः प्रकार के स्वाद या रस होते है और इन छः रसों के मेल से अधिक से अधिक 56 प्रकार के खाने योग्य भोजन को तैयार किया जा सकता है।

इसलिए भगवान को 56 प्रकार का भोग लगाया जाता है और इस माध्यम से भक्त भगवान को यह दर्शाते है की हे प्रभु हमारे पास जितनी भी खाने योग्य वस्तु थी हमने सभी व्यंजन को प्रसाद के रूप में आपको अर्पित किया है। यह व्यंजन रसगुल्ला से शुरू होकर पूरी, सब्जी, मिठाई, दही, चावल आदि से होता हुआ इलायची पर जाकर सम्पन्न होता है।

क्या है छप्पन भोग की सूची – हिंदू धर्म से जुड़े लोग जिन छप्पन भोग का प्रसाद अपने ईष्ट को चढ़ाते है उसमें से अधिकतम भोग इस प्रकार आते है।

रसगुल्ला, चन्द्रकला, रबड़ी, शूली, दही, चावल, दाल, चटनी, कढ़ी, साग-कढ़ी, मठरी, बड़ा, कोणिका, पूरी, खजरा, शरबत, बाटी, सिखरिणी, मुरब्बा, मधुर, कषाय, तिक्त, कटु पदार्थ, अम्ल (खट्टा पदार्थ), शक्करपारा, घेवर, चिला, मालपुआ, जलेबी, मेसूब, पापड़, सीरा, मोहनथाल, लौंगपूरी, खुरमा, गेहूं दलिया, पारिखा, सौंफ़लघा, लड़्ड़ू, दुधीरुप, खीर, घी, मक्खन, मलाई, शाक, शहद, मोहनभोग, अचार, सूबत, मोठ, फल, लस्सी, मठ्ठा, पान, सुपारी, इलायची।

हमने मुख्य भोग की सूची प्रस्तुत की है लेकिन जगह, भाषा, प्रांत और आहार के नाम के आधार पर भक्त अपनी रूचि अनुसार इसमें परिवर्तन करे यह संभव है। जैसे चावल से कई व्यंजन तैयार किए जाते है और चावल के सभी व्यंजन को अलग-अलग स्थान पर अलग नाम से जाना जाता है।

कही पुलाव तो कही बिरयानी। ठीक ऐसे ही सभी रस से और भी कई व्यंजन तैयार किए जाते है लेकिन सूची में कोई भी व्यंजन हो संख्या 56 ही रहती है।

छप्पन भोग का कारण और महत्व – 56 भोग के प्रसाद का कारण और महत्व सबसे अधिक भगवान कृष्ण से जुड़ा है। छप्पन भोग के बारे में कई प्रसंग और धारणाएँ जुड़ी हुई है।

लोग अपने-अपने विश्वास और मान्यताओं के आधार पर छप्पन भोग का महत्व समझते है। आइए छप्पन भोग से क्या-क्या मान्यताएँ जुड़ी है और इसका आज भी इतना क्यों महत्व है उसे पढ़े जानें और समझे।

प्रसंग 1 – यह प्रसंग कृष्ण के बाल समय का है। कहा जाता है कन्हैया दिन में आठ बार भोजन ग्रहण करते थे। लेकिन एक बार अहंकार में आए इंद्र के वर्षा प्रकोप के कारण कृष्ण ने ब्रज वासियों की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अँगुली के सहारे लगातार सात दिनों तक उठा के रखा।

शरण में आए ब्रज वासियों की जीवन रक्षा के कारण कृष्ण ने सात दिनों तक अन्न-जल कुछ भी नहीं लिया था। दिन में आठ बार भोजन लेने वाले कृष्ण की यह दशा उनके माता-पिता और भक्तों के लिए बेहद कष्टप्रद थी।

कृष्ण के प्रति असीम श्रद्धा को जताते हुए ब्रज वासियों ने सात दिन और आठ पहर भोजन के हिसाब से छप्पन (7×8=56) प्रकार का भोजन तैयार कर भगवान के प्रति अपने प्रेम को दर्शाया और तभी से लेकर आज तक भक्तजन भगवान कृष्ण को छप्पन भोग का प्रसाद बड़ी श्रद्धा से अर्पित करते हैं।

प्रसंग 2 – मान्यताओं के आधार पर यह भी कहा जाता है छप्पन भोग छप्पन सखियों का रूप है। कहा जाता है गौलोक में प्रभु कृष्ण राधा रानी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजमान होते है जिसकी तीन परतें होती है और तीनों परतों में क्रमश: आठ, सोलह और बत्तीस पंखुड़ीयाँ होती है।

कहते है हर पंखुड़ी पर एक विशेष सखी का स्थान होता है और मध्य में कृष्ण-राधा की जोड़ी होती है। सभी पंखुड़ियों का योग किया जाए तो संख्या 56 आती है तो इस आधार पर सखियाँ भी 56 हुई। शायद छप्पन भोग में छप्पन का यही आधार और अर्थ हो।

प्रसंग 3 – श्रीमद्भागवत के अनुसार एक महीने तक गोपीकायों ने अति भोर यमुना में स्नान किया और कात्यायणी माँ की श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना की और मनोकामना रखी की उनके पति के रूप में वो नंदलाल कृष्ण की पत्नियाँ बने। भगवान श्री कृष्ण ने सभी गोपियों की इच्छा हेतु सहमति दी।

मनोकामना और व्रत के पूर्ण होने पर गोपियों ने उध्यापन के स्वरूप में छप्पन भोग का प्रभु को प्रसाद अर्पित किया। तभी से इस प्रसंग को इस तरह से भी याद किया जाता है की ‘गोपियों ने भेंट किया प्रभु को छप्पन भोग’।

तब से लेकर आजतक छप्पन भोग का महत्व चला आ रहा है। क्योंकि मान्यताएँ और धर्म की पकड़ बेहद मजबूत होती है। इसी धर्म पर विश्वास जताते हुए लोग आज भी अपने ईष्ट को याद करते है और भोग का आयोजन करते है। भगवान को अर्पित 56 भोग के बारे में हिंदू धर्म में अनगिनत रोचक कथाएँ है।

लेकिन सभी कथा का एक ही सार है और वो है भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा व प्रेम। असल मायने में भगवान भक्त से इसी भोग की अपेक्षा करते है। क्योंकि ईश्वर सबसे पहले हमारे प्रेम का भूखा है भोग तो अंतिम श्रेणी में हैं। लेकिन हम किसी की श्रद्धा पर संशय नहीं कर रहे। भक्ति के कई रूप होते है। जिसे जिस रूप में संतुष्टि मिले वही सच्ची भक्ति का मार्ग है।

ब्रज के मंदिरों में 56 भोग, अन्नकुट में एक ही वस्तु को कई विविधता में बनाया जाता है शायद ही ऐसा ओर कही होता होगा!! मथुरा, गौकुल, वृंदावन, द्वारका आदि कई मंदिरों में आज भी भगवान के लिए एक व्यंजन पूरी की ना जानें कई नाना प्रकार की पूरियों का भोग प्रतिदिन लगाया जाता हैं।

द्वारकाधीश को अर्पित भोग में दूध, दही, घी और माखन की प्राथमिकता अधिक रहती है। लेकिन कृष्ण के भोग में बासी भोजन का कोई स्थान नहीं।

उम्मीद है जागरूक पर छप्पन भोग क्या है कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए फायदेमंद भी साबित होगी।

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