चौदह साल से कम उम्र के बच्चे करते हैँ काम

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हमारे देश मेँ भले ही चौदह साल से कम उम्र के बच्चोँ से काम करवाना वर्जित हो लेकिन इसके बावजूद भी आपको बहुत से बच्चे सडको पर भीख मांगते, फैक्ट्रियोँ मेँ पसीना बहाते, होटलोँ मेँ खाना सर्व करते, बर्तन साफ करते या घरोँ मेँ साफ-सफाई करते हुए नजर आ जाएंगे। गरीबी की चादर मेँ लिपटे इन बच्चोँ का सिर्फ एक ही मकसद होता है- दो जन की रोटी जुटाना।

क्या हैँ कारण

बाल श्रमिकोँ का मुद्दा सीधे रूप से गरीबी से जुडा हुआ है। आज भी हमारे देश की बहुत बडी जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे जीवनव्यापन करती है। ऐसे निर्धन परिवार न चाहते हुए अपने बच्चोँ से काम करवाने पर मजबूर होते हैँ, क्योंकि उनके लिए रोटी का प्रश्न बच्चोँ के विकास या खेल-कूद से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इसके अतिरिक्त कामगारोँ की जितने हाथ-उतने काम की परम्परागत मनोवृत्ति ने भी कुछ हद तक बाल श्रम को बढावा दिया है। वहीँ कानून मेँ मौजूद खामियाँ व सरकारोँ का लचर रवैया भी नन्हे मासूमोँ को काम करने पर मजबूर करता है। यह दुखद है कि समस्त विश्व के बाल श्रमिकोँ मेँ से मात्र भारत मेँ ही इसके एक तिहाई बाल श्रमिक हैँ। इतना ही नहीँ, यह बच्चे औसतन 12 घंटे प्रतिदिन काम करते हैँ और इन्हेँ इनकी मेहनत के अनुसार उचित वेतन भी नहीँ मिलता। भारत मेँ बाल श्रमिक शारीरिक व मानसिक रूप से शोषित होने को मजबूर हैँ।

क्या कहता है कानून

वैसे तो बच्चोँ के अधिकारोँ को सुनिश्चित करने व बाल श्रम पर अंकुश लगाने के लिए ढेरोँ कायदे-कानून बनाए गए हैँ। इन कानूनोँ मेँ सर्वप्रथम कारखाना अधिनियम 1881 मेँ बनाया गया था। इसके पश्चात 1933 मेँ बाल श्रम अधिनियम के अंतर्गत भी 14 वर्ष से कम आयु के बच्चोँ को श्रम कार्योँ मेँ लगाने पर रोक लगाई गई। वहीँ भारतीय सँविधान के अनुच्छेद-24 के अनुसार कारखानोँ, खानोँ और खतरनाक नौकरियोँ मेँ 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चोँ के रोजगार पर प्रतिबन्ध है। वैसे संसद ने बाल श्रम अधिनियम 1986 भी अधिनियमित किया है, जिसमेँ बाल श्रमिक को रोजगार देने पर दंड के तथा पूर्व बाल श्रमिकोँ के पुनर्वास के लिए भी प्रावधान दिए गए हैँ। बाल श्रम को रोकने के लिए बनाए गए कानूनोँ की फेहरिस्त यहीँ पर खत्म नहीँ होती। बाल कल्याण के कानूनोँ की लिस्ट मेँ बाल रोजगार अधिनियम 1938, भारतीय कारखाना अधिनियम 1948, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, बागान श्रम अधिनियम 1951, खान अधिनियम 1952 और न जाने कितने ही अधिनियम शामिल हैँ। बच्चोँ के अधिकारोँ को सुनिश्चित करने व उन्हेँ शिक्षित करने के लिए साल 2009 मेँ भी मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून भी बनाया गया। जिसके अनुसार 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे के लिए मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी लगभग 80 लाख बच्चे स्कूलोँ से दूर हैँ। वहीँ मुम्बई महानगर मेँ हुए एक सर्वे के अनुसार अकेले मुम्बई मेँ ही 37 हजार से अधिक बच्चे सडको पर जीवन जीने को मजबूर हैँ, इनमेँ से एक चौथाई बच्चोँ को तो दो वक्त का खाना भी नहीँ मिलता।

मिल रही है विफलता

इतने कडे कानूनोँ के बावजूद भी देश मेँ बाल श्रमिकोँ की संख्या काफी अधिक है। श्रम कानूनोँ के विफल होने का एक मुख्य कारण यह है कि उनका प्रभाव क्षेत्र केवल संगठित क्षेत्रोँ मेँ ही सीमित हैँ। जबकि सत्तर प्रतिशत बाल श्रमिक असंगठित क्षेत्रोँ से सम्बन्ध रखते हैँ। ऐसे मेँ कानून के लिए वहाँ तक पहुंचना काफी मुश्किल हो जाता है। जिसके कारण न जाने कितने ही बच्चोँ का बचपन व उनका भविष्य कारखानोँ, ढाबोँ, सडक पर भीख मांगने या पटाखा फैक्ट्रियोँ मेँ काम करते-करते जलकर खाक हो जाता है।

ऐसे हो उन्मूलन

वैसे तो इस समय भारत मेँ बाल श्रम की जो स्थिति है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि बाल श्रम का पूर्णत: उन्मूलन तो एक कल्पना मात्र है। लेकिन कुछ प्रयासोँ द्वारा इस पर काफी हद तक अंकुश तो लगाया ही जा सकता है। सबसे पहले तो सिर्फ कानून बनाने से कुछ नहीँ होने वाला। उन कानूनोँ को प्रभावी रूप से लागू करने की आवश्यकता है। इसके पश्चात बच्चोँ को अनिवार्य रूप से शिक्षा प्रदान की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि बच्चोँ को शिक्षित करने के लिए सभी कारगर उपाय किए जा रहे हैँ। इन सबके अतिरिक्त देश से गरीबी दूर करने वाले सभी व्यावहारिक उपाय उपयोग मेँ लाए जाएँ।

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