डेसिबल क्या है?

नवम्बर 29, 2018

दिन पर दिन बढ़ने वाले ध्वनि प्रदूषण ने इंसान के सुनने की क्षमता को काफी कम कर दिया है। इसके अलावा शोर में ज्यादा समय तक रहने के कारण लोगों के स्वभाव में भी कई बदलाव हुए हैं जैसे चिड़चिड़ापन, अनिद्रा और तनाव रहना सामान्य बात हो गयी है। हाइपरटेंशन और हार्ट डिसीज का एक कारण भी शोर ही है। ऐसे में ये जानना बेहतर होगा कि डेसिबल क्या है और ध्वनि की कितनी मात्रा कानों को सहन होती है और कितनी मात्रा असहनीय होकर तकलीफ देती है।

ध्वनि की मात्रा को मापने की यूनिट डेसीबल (dB) होती है। डेसीबल मान एक निश्चित संदर्भ बिंदु के लिए तरंग की तीव्रता का लॉगरिदमिक अनुपात होता है। अच्छी नींद के लिए ये जरुरी है कि उस दौरान आसपास रहने वाला शोर 35 डेसीबल से ज्यादा ना हो और दिन के समय ध्वनि 45 डेसीबल से ज्यादा ना हो लेकिन आजकल ध्वनि का स्तर इससे तीन-चार गुना बढ़ गया है और असहनीय हो चुका है।

ध्वनि की तीव्रता 90 डेसीबल से ज्यादा होने पर लोगों के सुनने की क्षमता प्रभावित होने लगती है और लम्बे समय तक ऐसे माहौल में रहने पर शरीर पर दुष्प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। मसल्स में खिंचाव आने लगता है और न्यूरोटिक मेन्टल डिसऑर्डर होने लगता है।

आइये, अब आपको ध्वनि प्रदूषण के स्तर बताते हैं-

सामान्य फुसफुसाहट – 20 डेसीबल

सामान्य यातायात का ध्वनि स्तर – 50 डेसीबल

सामान्य बातचीत का स्तर – 60 डेसीबल

अस्पताल का ध्वनि स्तर – 74 डेसीबल

रात में बैंड बजने का ध्वनि स्तर – 82 – 94 डेसीबल

मोटर कार, बस, मोटर साइकिल, स्कूटर, ट्रक का ध्वनि स्तर – 90 डेसीबल

व्यावसायिक वायुयान का ध्वनि स्तर – 120 -140 डेसीबल

बिना साइलेंसर की मोटर साइकिल का ध्वनि स्तर – 130 -150 डेसीबल

सायरन का ध्वनि स्तर – 150 डेसीबल

रॉकेट इंजन का ध्वनि स्तर – 180 -195 डेसिबल

ध्वनि के स्तर को सामान्य बनाये रखने के प्रयास किये जाने चाहिए क्योंकि तेज शोर में लगातार रहने पर ना केवल सुनने की क्षमता प्रभावित होती है बल्कि शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव भी पड़ते हैं।

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