आइये जानते हैं ईवीएम मशीन का इतिहास। साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से भारत में मतदान प्रक्रिया के लिए ईवीएम इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया जाने लगा है।

इस मशीन ने चुनाव प्रक्रिया को बहुत ही आसान बना दिया है। ऐसे में इस मशीन के बारे में आपको भी जरूर जानना चाहिए। तो चलिए, आज बात करते हैं ईवीएम मशीन के बारे में।

ईवीएम मशीन का इतिहास

ईवीएम का आविष्कार 1980 में एम बी हनीफा ने किया। उन्होंने सबसे पहले 15 अक्टूबर 1980 को इसे रजिस्टर किया था और इस मशीन को तमिलनाडु के छह शहरों में आयोजित होने वाली सरकारी प्रदर्शनी में जनता ने पहली बार देखा था।

जिसके बाद भारत निर्वाचन आयोग ने इसके इस्तेमाल पर विचार करना शुरू किया और इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की मदद से इस मशीन के बनने की प्रक्रिया शुरू हो गयी।

ईवीएम मशीन को ज्यादा सटीक बनाने में आईआईटी बॉम्बे के औद्योगिक डिजाइन सेंटर ने ख़ास भूमिका निभाई और इस ईवीएम मशीन का भारत में पहली बार उपयोग 1998 में केरल के नार्थ पारावूर विधानसभा क्षेत्र के लिए होने वाले उपचुनाव के कुछ मतदान केंद्रों पर किया गया।

ईवीएम के दो भाग होते हैं, एक भाग कण्ट्रोल की तरह काम करता है जो मतदान अधिकारी के पास रहता है जबकि दूसरा भाग मतदान इकाई के रुप में मतदान कक्ष के अंदर रखा जाता है।

मतदान अधिकारी सबसे पहले मतदान बटन दबाता है, उसके बाद मतदान कक्ष में मौजूद मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार का चुनाव करने के लिये उसके पार्टी चिन्ह के सामने लगा नीला बटन दबा देता है।

ईवीएम मशीन के दोनों भाग एक लम्बे इलेक्ट्रॉनिक तार से जुड़े रहते हैं। इस मशीन को एक बार बनाने के बाद इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है और चुनाव के दौरान इस मशीन का बटन भी एक बार ही दबाया जा सकता है। उसके बाद मशीन बंद हो जाती है।

एक ईवीएम में अधिकतम 64 प्रत्याशियों के नाम ही दर्ज किये जा सकते हैं और एक मशीन में अधिकतम 3840 वोट दर्ज किये जा सकते हैं।

उम्मीद है जागरूक पर ईवीएम मशीन का इतिहास कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए फायदेमंद भी साबित होगी।

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