जीडीपीआर क्या है?

अक्टूबर 25, 2018

सोशल मीडिया के इस दौर में पर्सनल डेटा को सुरक्षित रख पाना एक चुनौती बनता जा रहा है और इस चुनौती से निपटने के लिए यूरोपीय संघ ने जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (General Data Protection Regulation) अर्थात जीडीपीआर कानून बनाया है जिसके तहत किसी भी कंपनी को, किसी भी नागरिक की पर्सनल जानकारी लम्बे समय तक अपने पास रखने की अनुमति नहीं है और कंपनी की ये जिम्मेदारी है कि वो अपने कस्टमर्स की जानकारी को सुरक्षित रखे। ये कानून यूरोपीय संघ द्वारा 2016 में बनाया गया था और इसे 25 मई 2018 को लागू कर दिया गया जिसके बाद यूरोपीय संघ में आने वाले सभी 28 देशों पर ये कानून लागू हो गया।

इस कानून की कुछ विशेषताएं ये हैं-

जीडीपीआर कानून के जरिए इन जानकारियों को सुरक्षित रखा जा सकता है-

यूरोपीय संघ में आने वाले हर देश की उन कंपनियों के लिए इस कानून की पालना करना अनिवार्य है जो नागरिकों के पर्सनल डेटा की प्रोसेसिंग से जुड़ी हुयी हैं। जो कंपनियां इस देश में नहीं हैं लेकिन इस संघ में आने वाले देशों के नागरिकों की जानकारी रखती है, उस कंपनी के लिए भी जीडीपीआर का पालन करना जरुरी है। इस कानून की अवहेलना करने वाली कंपनी को यूरोपीय संघ से बाहर कर दिए जाने का प्रावधान है और ऐसी कंपनी को भारी जुर्माना भी चुकाना पड़ेगा।

इस कानून के आने से नागरिकों के डेटा की सुरक्षा होने और सोशल मीडिया पर विश्वास जमने जैसे कई फायदे तो जरूर हुए हैं लेकिन कम्पनियों पर दबाव भी बहुत बढ़ गया है क्योंकि कंपनियों को बहुत अधिक धन खर्च करके स्वयं को इस कानून के अनुकूल बनाना जरुरी है और बहुत सी छोटी कम्पनियाँ ऐसा नहीं कर सकती इसलिए उन्हें बंद भी होना पड़ा है।

भारत में भी ऐसी कई कम्पनियाँ है जो यूरोपीय संघ के देशों में अपना बिजनेस करती हैं। ऐसी भारतीय कंपनियों को भी जीडीपीआर के अनुकूल ढलना जरुरी है वरना ये कम्पनियाँ भी यूरोपीय संघ के देशों में बिजनेस करने से वंचित रह जाएंगी।

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