हाइपरलूप परिवहन तकनीक क्या है?

मार्च 13, 2018

आपने किताबों के ज़रिये ये जरूर जाना होगा कि इंसान ने सबसे पहले पहिये का आविष्कार किया जिससे उसके जीवन को थोड़ी गति मिली और फिर देखते ही देखते पहिये से बैल गाड़ी, मोटरगाड़ी और रेल गाड़ी भी बनती चली गयी। इस तरह इंसान की रफ़्तार बढ़ती चली गयी और कम समय में दूरियां तय करना आसान होता चला गया। हवाई जहाज और बुलेट ट्रेन के इस दौर में परिवहन की नयी तकनीक ने भी दस्तक दे दी है जिसका नाम है हाइपरलूप परिवहन तकनीक। ऐसे में आप भी जानना चाहते होंगे कि आखिर ये तकनीक क्या है और किस तरह हमारी राहों को और भी आसान बना सकती है। तो चलिए, आज आपको बताते हैं इस हाइपरलूप तकनीक के बारे में-

परिवहन के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले हाइपरलूप का कॉन्सेप्ट ‘एलोन मस्क’ ने दिया और इसे ‘परिवहन का पाँचवां मोड़’ भी बताया। इस तकनीक को हाइपरलूप इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें परिवहन एक लूप के माध्यम से होगा जिसकी स्पीड बहुत ज़्यादा होगी। माना जा रहा है कि इसकी गति हवाई जहाज की गति से भी तेज़ होगी यानी 600-700 मील प्रति घंटा।

ये तकनीक कैसे काम करेगी – इस तकनीक में विशेष प्रकार से डिजाइन किये गए कैप्सूल या पॉड्स का प्रयोग किया जाएगा। इन कैप्सूल्स और पॉड्स को एक पारदर्शी ट्यूब पाइप के भीतर उच्च वेग से संचालित किया जाएगा। परिवहन की इस तकनीक में बड़े-बड़े पाइपों के अंदर वैक्यूम जैसा माहौल तैयार किया जाएगा और वायु की अनुपस्थिति में पोड जैसे वाहन में बैठकर 1000-1300 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से यात्रा की जा सकेगी।

इस परिवहन तकनीक में पॉड्स को ज़मीन के ऊपर बड़े-बड़े पाइपों में इलेक्ट्रिकल चुम्बक पर चलाया जायेगा और चुम्बकीय प्रभाव से ये पॉड्स ट्रैक से कुछ ऊपर उठ जाएंगे जिससे गति ज़्यादा हो जाएगी और घर्षण कम। इसमें प्रतिरोध और घर्षण पैदा करने वाली चीज़ों का अभाव होगा जिससे इसकी गति तेज़ होने में मदद मिलेगी।

दुनिया के किन देशों में ये तकनीक प्रस्तावित है – दुनिया के बहुत से विकसित देश इस हाइपरलूप परिवहन प्रणाली को अपनाने के लिए आगे आए हैं जैसे अमेरिका, कनाडा और सऊदी अरब। इन देशों में ‘हाइपरलूप वन’ नामक कंपनी इस परिकल्पना को साकार रूप देने के काम में जुटी हुयी है।

दोस्तों, हाइपरलूप परिवहन तकनीक क्या है और ये किस तरह काम करती है, ये जानकारी अब आपके पास है और अगर भारत के सन्दर्भ में ये तकनीक उपयोगी साबित हुयी तो कुछ समय बाद भारत में भी हम इस तकनीक का आनंद उठा सकेंगे।

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