भारत के सबसे सशक्त प्रधानमंत्री लेकिन फिर भी इनके दामन पर लगे दाग

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यूं तो आजादी के बाद से भारत को कई सशक्त प्रधानमंत्री मिले हैं जिनकी छवि एकदम साफ रही है। लेकिन फिर भी कुछ कारणों से इन प्रधानमंत्रियों के दामन पर दाग लगाए गए हैं। आइए जानते हैं आजादी के बाद से भारत के प्रधानमंत्रीयों की छवियों के बारे में और क्यों इन्हें नकारात्मक छवि झेलनी पड़ी।

जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरु भारत के पहले प्रधानमंत्री थे और इन्हें आधुनिक भारत का निर्माता भी माना जाता है। जवाहरलाल नेहरू एक पढे-लिखे और दूर की सोच रखने वाले व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं और ये हरदम लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से नेहरू विरोधी विचारधारा के लोगों ने कई गंभीर आरोप लगाकर जवाहरलाल नेहरू की छवि को नकारात्मक बनाने का प्रयास किया है।

लाल बहादुर शास्त्री

जवाहरलाल नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री ही भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे। लाल बहादुर शास्त्री अपनी साथ सादा जीवन और उच्च विचारों की जीवन शैली के लिए जाने जाते थे और लोग इन्हें इनकी सादगी के कारण ही काफी पसंद किया करते थे। 1965 के पहले भारत पाक युद्ध के दौरान इन्होंने कई ऐसे राजनीतिक निर्णय लिए जो इनकी नेतृत्व क्षमता को बयान करते थे और इसी कारण लोगों में इनकी लोकप्रियता बहुत ज्यादा बढ़ गई। यूँ तो लाल बहादुर शास्त्री की छवि हमेशा से ही साफ रही है लेकिन ताशकंद समझौते के कारण इनकी काफी आलोचना होती रहती है।

इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रही है और ये 2 बार भारत की प्रधानमंत्री बनी। इंदिरा गांधी आयरन लेडी के नाम से भी मशहूर हैं। 1975 में लगे आपातकाल के समय इन्होंने काफी कठोर कदम उठाए और ऐसे निर्णय लिए जो कुछ हद तक सही रहे तो वहीँ इसके चलते इंदिरा गांधी की छवि काफी नकारात्मक भी हो गई।

राजीव गांधी

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने महज 40 वर्ष की उम्र में देश के प्रधानमंत्री की गद्दी संभाली। इनकी साफ और सशक्त छवि ही थी जो इनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 542 में से 411 सीटों पर अपना कब्जा जमा कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और एक मिसाल बन गए। लेकिन इनके सत्ता में रहते हुए बोफोर्स घोटाले, भोपाल गैस कांड जैसी घटनाओं ने राजीव गांधी की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया और उसी का परिणाम यह निकला कि उन्हें अगले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा।

पी. वी. नरसिम्हा राव

दक्षिण भारत के रहने वाले नरसिम्हा राव काफी सशक्त नेता रहे हैं और प्रधानमंत्री के तौर पर इन्हें जनता ने स्वीकार किया। इनकी छवी ही थी जो इन्हें आर्थिक सुधारों का पितामह भी माना जाता है। लेकिन इनके इन्हीं सुधारों की वजह से इनको हर बार आलोचना का सामना भी करना पड़ता रहा है। हिंदू चरमपंथियों द्वारा बाबरी मस्जिद क्षतिग्रस्त करने का मामला भी इन्हीं के कार्यकाल में हुआ था जो एक बड़ा विवाद का विषय रहा है।

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसी शख्सियत रहे हैं जिन्हें इनकी पार्टी ही नहीं बल्कि विपक्षी पार्टी भी मानती है और सराहती है। वाजपेयी एक गंभीर वक्ता और कुशल राजनीतिज्ञ रहे हैं और यह कहना गलत नहीं होगा कि यह भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री में से एक है। यूँ तो पक्ष हो या विपक्ष कोई भी इनकी छवि पर उंगली नहीं उठाता लेकिन कारगिल युद्ध के दौरान कफन घोटाले के चलते इनकी छवि काफी नकारात्मक बन गई जिससे इन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

मनमोहन सिंह

मनमोहन सिंह काफी उच्च शिक्षित अर्थशास्त्रीय हैं और इन्हें यूपीए सरकार के नेतृत्व में भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्त किया गया। इन्होंने लगातार 10 साल तक भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर गद्दी संभाली। यूँ तो मनमोहन सिंह काफी विद्वान माने जाते हैं लेकिन इनकी चुप्पी साधे रहने वाले व्यक्तित्व ने इनकी छवि को काफी नकारात्मक बना दिया। लोग इन्हें सोनिया गांधी के इशारों पर चलने वाली कठपुतली कहने लगे। इनके कार्यकाल में देश के कई बड़े घोटाले भी हुए जिस कारण इन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ता रहा है।

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