इंदिरा गाँधी – भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री

19 नवम्बर 1917 में इलाहबाद के आनंद भवन में एक ऐसी महान विदुषी का जन्म हुआ, जिसने न केवल अपने देश मे ही अपितु पूरे विश्व मानचित्र पर अपनी ख्याति बनाई और विश्व पटल पर एक युग बनकर सामने आई। यह थी, नेहरू की प्रियदर्शनी, अपने दादा की इंदिरा और मोरार जी देसाई की गूंगी गुड़िया! इंदिरा गाँधी। इंदिरा गाँधी के पिता ज़वाहरलाल नेहरू तथा दादा मोतीलाल नेहरू थे। इनका जन्म आर्थिक और बोद्दिक दोनो ही दृष्टि से सम्पन्न परिवार में हुआ. इनकी माता जी कमला नेहरू थी।

इंदिरा गाँधी बचपन से ही दृढ़ – निश्चय और आज़ादी के प्रति काफ़ी सजग थी। यह इस बात से पता चलता है कि जब वो मात्र 13 वर्ष की थी तब ही उन्होने लड़के – लड़कियो की एक वानर सेना का गठन किया, जिन्होने विरोध प्रदर्शन और झण्डा जुलूस के साथ साथ कॉंग्रेस नेताओ की स्वतंत्रता संग्राम में काफ़ी मदद की।

सन 1936 में जब आप मात्र 18 वर्ष की थी तब आपकी माँ कमला नेहरू जी का तपेदिक के कारण निधन हो गया जो काफ़ी कष्टदायक तथा दुखद था। कमला जी के निधन के बाद इन्दिरा को आगे की पढ़ाई के लिए यूरोप भेज दिया गया और इन्होने कॉलेज की पढ़ाई समरविला कॉलेज से की। बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम में उनकी गहरी रूचि थी। अत: 21 वर्ष की आयु में ही इंदिरा जी भारतीय कॉंग्रेस में शामिल हो गयी।

इनका विवाह फ़िरोज़ गाँधी के साथ हुआ जो एक सांसद, एक प्रमुख अँग्रेज़ी पत्र के संपादक तथा एक कर्मठ युवा नेता के रूप में काफ़ी चर्चा में रहे। 1956 में इंदिरा गाँधी सर्व सम्मति से कॉंग्रेस दल की अध्यक्ष चुन ली गयी। उन्होने इस पद पर रहकर अपने पिता के साथ बहुत ही महत्व पूर्ण कार्यो को अंजाम दिया।

अचानक इनके जीवन में एक दर्दनाक घटना घटी। इनके पति फ़िरोज़ गाँधी का 1960 में स्वर्ग-वास हो गया। लेकिन इन्होने हिम्मत से काम लिया ओर अपने दोनो बेटे राजीव और संजय गाँधी को उनके उज्जवल भविष्य और उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेज दिया।

1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात लालबहादुर शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाया गया, लेकिन उनके कार्यकाल के अंतराल मे मात्र डेढ़ वर्ष की अल्प अवधि में ही वो चल बसे। इनके जाने के बाद 24 जनवरी 1966 में तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने उन्हे शपथ दिलवाई और इंदिरा गाँधी को भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। इनमे देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी हुई थी। उनका कहना था की – “यदि मैं इस देश की सेवा करते हुए मर भी ज़ाऊ मुझे इसका गर्व होगा, मेरे खून की हर एक बूँद इस देश की तरक्की में ओर इसे मजबूत ओर गतिशील बनाने में योगदान देगी “।

उनके लिए गये बहुत से ऐसे फैसले जो साहसिक होने के साथ साथ ऐतिहासिक भी है। उनमे एक यह फ़ैसला भी मुख्य था – उन्होने 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर चीन की सेन्य शक्ति को चुनोती दी तथा इसके लिए उन्होने अमेरिका जैसे बड़े देश की नाराज़गी की भी परवाह नही की। उन्होने इसी बीच देश के कई राज्यो में आपातकाल की घोषणा भी की जिससे उनके राजनीतिक जीवन पर ख़ासा प्रभाव पड़ा और 1977 के चुनाव में उन्हे करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके पश्चात सरकार और अन्य राजनीतिक पार्टियो के झगड़े के कारण 1980 में पुन: चुनाव करवाए गये जिसमे कॉंग्रेस को ऐतिहासिक जीत मिली, और फिर से इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनी।

सन 1984 में पंजाब के कुछ सिक्खो ने स्वायत राज्य की माँग की तथा हिंसा का रास्ता अपनाया। उनके जबाब में इंदिरा जी ने आपरेशन ब्लू स्टार की मंज़ूरी दी। इस आपरेशन में सिख मारे गये।

31 अक्टूबर 1984 को उन्ही के एक अंगरक्षक बेअत सिंह ने अचानक इंदिरा गाँधी पर गोलिया दागी। कुछ समझ आता उससे पहले ही दूसरी तरफ से सतवंत सिंह ने अंधाधुंध गोलिया दागी ओर देखते ही देखते उनका शरीर गोलियो से छलनी कर दिया गया। उन्हे दिल्ली एम्स मे ले जाया गया लेकिन काफ़ी कोशिश के बावजूद भी उनको नही बचा पाए।

यह दिन पूरे देश के लिए निराशा ओर अशांति का दिन था क्यूंकी इस दिन सबसे मजबूत इच्छा शक्ति वाली दृढ़ संकल्प महिला को हमेशा हमेशा के लिए हमने खो दिया।

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