इन्वेस्टमेंट का क्या अर्थ है और कैसे चुने अपने लिए सही इन्वेस्टमेंट

जनवरी 13, 2018

अभी तक हम सब लोगों ने पढ़ा है कि फाइनेंशियल प्लानिंग क्या होती है। यह क्यों ज़रूरी होती है। इसके तीन मुख्य आधार स्तम्भ टर्म प्लान, पर्सनल एक्सीडेंट एवं मेडिक्लेम के बारे में भी विस्तार से जाना है। अब आज हम फाइनेंशियल प्लानिंग के चौथे एवं मुख्य स्तम्भ “इंवेस्टमेंट्स” के बारे में जानेंगें। जिसका नम्बर चौथे नम्बर पर (टर्म प्लान, पर्सनल एक्सीडेंट एवं मेडिक्लेम के बाद) आता है। आज भी हम लोग अशिक्षा के कारण सिर्फ इस विषय में चर्चा करके रह जाते हैं और प्रॉपर फाइनेंशियल प्लानिंग नहीं करते।

इंवेस्टमेंट्स का क्या अर्थ है, इंवेस्टमेंट्स का सबसे सरल भाषा में मतलब है कि जो भी पैसा हम बचायें उसे ऐसी जगह लगायें जहाँ पर प्रतिफल (रिटर्न) हमें वर्तमान मंहगाई दर (Inflation) से ज्यादा मिले। उदाहरण अभी इंडिया में रिटेल में मंहगाई दर 7% के आसपास है। (हालांकि सरकारी दर 4-5% के आसपास ही है परन्तु हम एक्चुअल रिटेल दर की बात कर रहे हैं जिससे आम आदमी प्रभावित होता है।) तो इंवेस्टमेंट्स हमें ऐसी जगह करना चाहिये जहाँ पर रिटर्न कम से कम 8% या उससे अधिक हो और वो भी टैक्स फ्री तभी हम एक्चुअल में कुछ अर्जन (कमाई) कर रहे हैं। अगर हम 5-6% से ही अपने इंवेस्टमेंट्स को ग्रो कर रहे हैं तो एक्चुअल में हम अपनी रकम को कम ही कर रहे हैं यानि जिन्दा मक्खी निगल रहे हैं। तो इंवेस्टमेंट्स का सरल भाषा में मतलब आज के भारत में टैक्स फ्री 7-8% से ऊपर कमाई करना है।

अभी इंवेस्टमेंट्स के बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं जैसे एफडीए, एनएससीए, पीपीएफए, इंश्योरेंस पॉलिसी, गोल्ड, प्रॉपर्टी, म्यूच्यूअल फण्ड आदि। हम विस्तार से समझने की कोशिश करेंगें कि कौनसा इंवेस्टमेंट हम सबके लिये फायदेमन्द है।

बैंक एफडीए, पोस्ट ऑफिस आरडी इत्यादि में वर्तमान में अधिकतम ब्याज दर 6.5% – 7% है जो भविष्य में निश्चित रूप से धटती ही जायेगी। एफडीए, आरडी का सारा ब्याज टैक्सेबल होता है मतलब हमें इंटरेस्ट की कमाई पर भी टैक्स देना पडता है। अगर आप 30% इनकम टैक्स स्लैब में है और आपने 6.50% की दर पर एफडी में निवेश कर दिया है तो आप टैक्स फ्री 4.5% के आस पास ही कमा पा रहे हैं जबकि रिटेल में इन्फ्लेशन 7.8% की दर से बढ रहा है। इसका सीधा सा मतलब हुआ है कि बैंक एफडीए, आरडी में निवेश करके हम अपनी रकम को कम कर रहे हैं (ग्रो नहीं)। निश्चित तौर पर बैंक एफडी सेफ इंवेस्टमेंट्स के तौर पर मानी जाती है परन्तु ऐसी सेफ्टी से क्या फायदा जहाँ पर रकम ही धीरे-धीरे कम होती जाये।

बिल्कुल यही हालत है इंश्योरेंस पॉलिसीस की (जिसका दुर्भाग्य से भारत में प्रचलन बहुत ज्यादा है)। पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ पर इंश्योरेंस पॉलिसीस को इन्वेस्टमेंट पॉलिसी के रूप में लिया जाता है। इंश्योरेंस कभी भी इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट नहीं है। इंश्योरेंस का मतलब रिस्क कवरेज से होता है ना कि इन्वेस्टमेंट से। किसी भी कंपनी के ट्रेडिशनल इंश्योरेंस पॉलिसी में 5.5% से ज्यादा रिटर्न नहीं आता है। यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस फिर भी ट्रेडिशनल इंश्योरेंस से बेहतर है परन्तु वहाँ पर भी कई सारे हिडन एक्सपेंसेस होकर उसे निवेश के अयोग्य बना देते हैं। (हालाँकि अब कई कंपनी ने खर्चे काफी कम करने की कोशिश करी है लेकिन अब भी ये एमएफ से मंहगे हैं।) दुर्भाग्य से भारत में इंश्योरेंस पॉलिसी का बहुत प्रचलन है और हम बिना सोचे – बिना किसी लक्ष्य के किसी के भी भावनात्मक दबाव में इंश्योरेंस पॉलिसी ले लेते हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि टर्म प्लान, पर्सनल एक्सीडेंट एवं मेडिक्लेम के अलावा कोई भी इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं होनी चाहिये। (लेखक इंश्योरेंस के Field esa World के टॉप अवार्ड्स लेने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा है।)

बिल्कुल यही निष्कर्ष एनएससीए, पीपीएफ में निवेश से होता है – हालांकि बैंक एफडी व इंश्योरेंस के मुकाबले पीपीएफ में 1-1.5% ज्यादा रिटर्न मिलता है परन्तु पीपीएफ पर इंटरेस्ट की दर भी धीरे धीरे कम होती जा रही है और भविष्य में और कम हो जायेगी। इन्वेस्टमेंट पर हमेश इंटरेस्ट नयी दर पर ही मिलेगा ना कि पुरानी दर पर जिस पर इन्वेस्टमेंट करा था।

गोल्ड कभी भी इन्वेस्टमेंट का टूल नहीं माना गया है परन्तु भारत में स्त्रियों को गोल्ड से बहुत प्यार है। गोल्ड केवल Hedging Against Inflation ही मान सकते हो। आज के हालात में ओरिजिनल गोल्ड होने के बावजूद भी महिलायें उनको पहनने से घबराती हैं, उनको सुरक्षित रखने के लिए बैंक में लाकर्स लेने पडते हैं। पहले ब्लैक मनी को गोल्ड के रूप में इन्वेस्टमेंट कर लेते थे परन्तु अब ये बहुत मुश्किल है। तो गोल्ड में भी निवेश बिल्कुल फायदेमन्द नहीं है। गोल्ड ने हिस्टोरिकल 25-30 वर्षों में केवल 5-6% ही रिटर्न दिया है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि इंवेस्टमेंट्स केवल उसी जगह करना चाहिये जहाँ पर कम से कम टैक्स फ्री रिटर्न इन्फ्लेशन से ज्यादा हो।

भारत में प्रॉपर्टी निवेश को भी बहुत ही सेफ व ग्रोथ के रूप में माना जाता है। इसमें कोई भी दो राय नहीं है कि प्रॉपर्टी में निवेश करने पर लॉन्ग टर्म में अच्छी ग्रोथ मिलती है। लेकिन लॉन्ग टर्म में भी प्रॉपर्टी निवेश की भी अपनी सीमायें हैं एक मुश्त काफी धनराशि चाहिये, उसको बराबर मेन्टेन व देखभाल भी जरूरी है। कानूनी विवादों की भी संभावना रहती है। (भारत में लगभग 20% मुकदमे प्रॉपर्टी से संबंधित ही है)। पहले भारत में काला धन बहुत ज्यादा था जो नोटबन्दी के बाद बैंकों में किसी न किसी रूप से पहुँच गया। पहले काले धन को प्रॉपर्टी में निवेश किया जाता था जिससे प्रॉपर्टी के दामों में भी बहुत तेजी आ गयी। अब काले धन को प्रॉपर्टी में निवेश करना इतना आसान नहीं रहा कारण बाजार में प्रचलित दर व डीएलसी रेट में ज्यादा फर्क नहीं रह गया है। सेलर भी अब रकम को, सरकार में डर की वजह से चैक में ज्यादा से ज्यादा लेना चाहता है। लेखक को फिलहाल 2021-2022 तक प्रॉपर्टी में मंदी बने रहने की संभावना लगती हैं। प्रॉपर्टी में निवेश का सबसे नकारात्मक पहलू ये भी है कि इसमें लिक्विडिटी बहुत ही ज्यादा कम है। ज़रूरत पडने पर सही दाम में प्रॉपर्टी को बेचने में वर्षों लग जाते हैं। ऐसे निवेश से क्या फायदा जहाँ जरूरत पडने पर अपनी बचत की राशि ही नहीं मिल पाये।

अब इंवेस्टमेंट्स का सबसे सरल-सुरक्षित व ग्रोथ देने वाला ऑप्शन केवल म्यूच्यूअल फंड्स ही है जिसके बारे में विस्तार से अगले अंक में चर्चा करेंगें।

sodhani-1 इन्वेस्टमेंट का क्या अर्थ है और कैसे चुने अपने लिए सही इन्वेस्टमेंटये लेख फाइनेंशियल एडवाइजर श्री राजेश कुमार सोढानी, सोढानी इंवेस्टमेंट्स, जयपुर द्वारा प्रस्तुत है। फाइनेंशियल प्लानिंग पर आधारित ये लेख आपको कैसा लगा? अगर इस लेख से आपको कोई भी मदद मिलती है तो हमें बहुत खुशी होगी। अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे। हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है, हमेशा स्वस्थ रहे और खुश रहे।

“स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी क्या है और हमारे लिए क्यों जरूरी है?”

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