आइए कबीर के दोहे को अर्थपूर्ण समझे और चाहे जैसी भी परिस्थिति हो अपनी अच्छाई पर डटे रहे और अपने वास्तविक स्वरूप को निरंतर उजागर करने का प्रयास करते रहे। कबीर के दोहे का संकलन आपके लिए अर्थ सहित लाने का हमारा यह प्रयास आपके लिए जरूर उपयोगी होगा।

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जीवन परिचय-
नाम – कबीर दास
जन्म – सन् 1399 वाराणसी
मृत्यु – सन् 1518 मगहर
प्रसिद्धि – कवि, संत, सूत कातकर कपड़ा बनाना
रचना – अनुराग सागर, कबीर ग्रन्थावली, बीजक. सखी ग्रंथ
धर्म – इस्लाम
नागरिकता – भारतीय

संत कबीर दास जी का जीवन बेहद शिक्षाप्रद और अतुलनीय है। इन्होंने सदियों पहले वह सबकुछ कर दिखाया जिसे हम आज भी करने से कतराते है। कबीर ने अपनी अमृतवाणी से बड़े दिग्गज सूरमाओं और समाज के सभी धार्मिक ठेकेदारों को खुली चुनौती दी। जो आज भी समाज के लिए प्रेरणादायक है। इससे भी बढ़कर यह है कबीर दास जी ने हमें जीवन जीने की जो कला विरासत में दी है वो बेमिसाल है।

कबीर जी ने स्वयं को हमेशा जाति व धर्म से खुद को परे रखा। इन्होंने हिंदू संतों और मुस्लमान फकिरों दोनों के साथ सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों का आत्मसात किया। वे सिर्फ एक ही ईश्वर को मानते थे। इतना ही नहीं धर्म के नाम पर होने वाले कर्मकांड के सख्त विरोधी थे। मान्यता से परे, अवतार, मूर्ति पूजन, रोजा, ईद, मंदिर-मस्जिद आदि को इन्होंने अपने जीवन में स्थान नहीं दिया। कबीर जी पढ़े-लिखे नहीं थे। इनके मुख से जो भी वाणी निकलती थी इनके शिष्य लिख लेते थे। इन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी जिससे जन-जन को इसका पूर्ण लाभ मिल सके। यह कट्टरपंथी सोच और गोभक्षण के सख्‍त विरोधी थे। कबीर जी सत्य, शांति, अहिंसा, सदाचार, सरलता आदि गुणों के प्रिय प्रशंसक थे। अपने इन्हीं गुणों के कारण आज वर्तमान में सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इनकी अलग पहचान है।

119 वर्ष की आयु में कबीर दास जी का देहांत मगहर में हुआ। वे अपने अंतिम दिनों में काशी में ही रहना चाहते थे। लेकिन विरोधियों ने इन्हें काशी छोड़ने पर मजबूर किया। कबीरदास जी का व्यक्तित्व संत कवियों में अद्वितीय है। जिसका उल्लेख चन्द शब्दों में संभव नहीं। अंत में हम इतना ही कहना चाहते है हमारी आज की युवा पीढ़ी को कबीर दास जी कही ज्यादा जरूरत है।

कबीर के दोहे ऐसे है जैसे गागर में सागर। कबीर के दोहे का गूढ़ अर्थ समझ कर अगर अपने जीवन में उतारा जाए तो निश्चित ही मन को शांति के साथ-साथ ईश्वर की भी अनुभूति होती है। समाज के प्रति इनके योगदान को कभी भी नहीं भुलाया जा सकता।

कबीर के दोहे

1 – संत ना छाडै संतई, कोटिक मिले असंत।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटत रहत भुजंग।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं सच्चा और अच्छा इंसान हर परिस्थिति में अपनी सज्जनता का साथ देता है, चाहे करोड़ों की संख्या में बुराई से भरे लोगों का सामना क्यों ना करना पड़े। ठीक उसी तरह जैसे हज़ारों जहरीले सर्प चन्दन के पेड़ से हमेशा लिपटे रहते है लेकिन फिर भी चन्दन कभी भी विषैला नहीं होता और हमेशा अपनी खुशबू और शीतलता से अपनी पहचान बनाए रखता है।

2 – तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय।
सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं बाहरी आडंबर से तो हर कोई संत का चोला पहनकर ईश्वर का भक्त बन सकता है, लेकिन मन से जो ईश्वर की भक्ति करता है उसे किसी दिखावे की जरूरत नहीं पड़ती। सच्ची साधना से हर सिद्धि संभव है और ऐसा इंसान निराला होता है। इसलिए अपने तन को नहीं बल्कि अपने मन को साफ कीजिए। क्योंकि इंसान तन से नहीं मन से ईश्वर को पा सकता है।

3 – माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं वर्षो तक माला फेरने के बाद भी अगर मन का मैल नहीं मिटा तो ऐसी माला फेरने का क्या फायदा। इसलिए हाथों की दिखावटी माला को त्यागकर मन रूपी मोती की माला से साधना करो। जिससे मन की अशांति दूर होगी और मन का भाव अच्छा होगा।

4 – पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का जो पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं अधिक किताबें पढ़-पढ़ कर पूरे संसार का ज्ञान इकट्ठा करने वाला व्यक्ति विद्वान हो यह जरूरी नहीं। इसलिए कबीर कहते हैं यदि कोई व्यक्ति प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर को अच्छे से पढ़कर समझ ले और उसका वास्तविक रूप पहचान ले, तो वह इंसान संसार का सच्चा ज्ञानी होगा। क्योंकि प्यार से पूरी दुनिया को जोड़ा जा सकता है।

5 – ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग।
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जो इंसान कभी किसी अच्छे व्यक्ति के संगत में नहीं आया या कभी कोई अच्छा काम नहीं किया, उसका गुजरा हुआ आज तक का जीवन बेकार हो गया। जिसके मन में दूसरों के प्रति प्रेम नहीं वह पशु जीवन को जी रहा है और जिसके मन में सच्ची भक्ति का भाव नहीं उस व्यक्ति के हृदय में कभी भी अच्छाई या ईश्वर का वास भी संभव नहीं।

6 – माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं मिट्टी कहती है कुम्हार से आज जिस तरह से तू मुझे रौंद रहा है, एक दिन ऐसा भी आयेगा जब तू खुद इस मिट्टी में मिल जायेगा और तब मैं तुम्हें रौंदूंगी। इसलिए अभी समय है सिर्फ स्वयं के बारे में मत सोचो क्योंकि जिस दिन तुम मिट्टी में विलीन हो जाओगे। तब तुम्हारे अच्छे या बुरे कर्म ही याद रखे जाएँगे।

7 – कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जब हम इस दुनिया में आते है तब दुनिया खुशी मनाती है और हम रोते है। इसलिए जीते जी अपने जीवन को इतनी जिंदादिली, सच्चाई और अच्छाई से जिओ की वो ओरो के लिए एक मिसाल बन जाए। कुछ ऐसा काम कर जाओं की मरते वक्त ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी लोग हमें याद करके रोए और हम हँसते हुए इस दुनिया से विदा ले।

8 – कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जिस मनुष्य के हृदय में दूसरों के दुख-दर्द को समझने की क्षमता होती है सही मायने में वही सच्चा इंसान है और जो ऐसा नहीं कर पाता वो इंसान इस संसार में किसी काम का नहीं। क्योंकि समय आने पर ऐसे मनुष्य को भी कोई नहीं समझता, इसलिए जानवरों का जीवन ना जिओ, क्योंकि जानवर स्वार्थी हो सकते है लेकिन मनुष्य को जो जिस अलग रखती है वो है लगाव, जुड़ाव, इंसानियत।

9 – नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं ऐसे स्नान का क्या लाभ जिससे सिर्फ तन साफ हो और मन वैसा का वैसा मलिन रहे। जैसे की मछली हर वक्त जल मग्न रहती है फिर भी उसे कितना भी रगड़ा या साफ किया जाए, उसकी बदबू नहीं जाती, इसलिए निरंतर अपने मन को साफ रखने का प्रयास करो ऊपरी स्वांग से कोई लाभ नहीं।

10 – बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जब मैं इस संसार में बुरे लोगों को खोजने चला तो मुझे कोई भी बुरा नजर नहीं आया। जैसे ही मैंने अपने मन में झाँका तो मुझे मुझसे बुरा कोई नहीं मिला। कहने का तात्पर्य यह है की संसार को हम जिस दृष्टि से देखते है संसार वैसा ही नजर आता है। इसलिए किसी में बुराई खोजने से अच्छा है उसमें कोई अच्छे गुणों को खोजो।

11 – धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं अगर मनुष्य में धीरज का गुण है तो वो समय आने पर सब कुछ हासिल कर सकता है। जैसे माली किसी भी पौधे को भले ही सौ घड़े पानी से क्यों ना सिचे, लेकिन पौधा तो समय के साथ ही बड़ा होगा और मौसम आने पर ही फल देगा।

12 – जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं किसी भी साधु या सज्जन व्यक्ति से उसकी जाती ना पूछो, क्योंकि जाती से किसी के ज्ञान का बोध नहीं होता। पूछना ही है तो उनसे उनका ज्ञान पूछिए। क्योंकि जाती किसी की पहचान नहीं होती। ज्ञान ही एक मात्र ऐसी चीज है जिससे व्यक्ति की बोधिकता का परिचय मिलता है। ठीक उसी तरह जैसे तलवार की कीमत होती है ना की म्यान की।

13 – बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जिन्हें शब्दों का मोल पता होता है वो कभी भी सोचे समझे बिना नहीं बोलते। इसलिए जब भी मुख से कोई शब्द निकालो तो अपने हृदय रूपी तराजू से तौल-मोल कर बोलना चाहिए। वो कहते है ना कमान से निकला तीर और मुख से निकला शब्द कभी लौटकर नहीं आता। जीवन चला जाता है लेकिन शब्दों की चुभन रह जाती है। इसलिए वाणी में संयम और मिठास सदा बनाए रखे।

14 – चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं व्यक्ति अपनी चाह के कारण पहले उस चीज को पाने की चिंता करता है और चाह पूरी होने पर उसे खोने की चिंता करने लगता है। संसार में सच्चा सुखी इंसान वही है जिसे ना तो कोई चाह है और ना ही कुछ खोने का भय। सही मायने में ऐसा व्यक्ति ही संसार में बादशाही जीवन जीता है।

15 – तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घनेरी होय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जीवन में कभी भी किसी को अपने से तुच्छ और कमजोर समझने की भूल ना करे। क्योंकि कब कौन पलटकर आपको चोट दे जाए यह कहना संभव नही। ठीक उसी तरह पैर के नीचे दबा एक छोटा सा तिनका कब हवा के सहारे आपकी आँखों में चला जाए और आपको असहनीय दर्द दे जाए इसका पता भी नहीं चलता।

16 – गुरु गोविंद दौऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जब भी आपके सामने गुरु और ईश्वर दोनों हो और आप असमंजस में है की पहला प्रणाम किसे करू, तो सबसे पहले अपने गुरु का चयन कीजिए। क्योंकि गुरु ही हमें ईश्वर का महत्व, ईश्वर क्या है, ईश्वर कहाँ रहता है यह सब समझाकर हमें इस लायक बनाते है की हम आज ईश्वर के सम्मुख खड़े हो पाते है।

17 – दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं मनुष्य अपने दुख के क्षण में ईश्वर को सदा याद करता है लेकिन जैसे ही सुख के क्षण आते है वो ईश्वर को पलभर के लिए भी याद नहीं करता। अगर मनुष्य अपने अच्छे-बुरे हर क्षण में ईश्वर को याद करता रहे तो कभी दुख की अनुभूति होगी ही नहीं। कहने का तात्पर्य यह है की दिन हो या रात, सुख हो या दुख ईश्वर का साथ कभी मत छोड़ों।

18 – साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं हे नाथ अपनी इतनी कृपा दृष्टि बनाए रखना जिससे मेरे परिवार का गुजारा सुख के साथ हो सके। जहाँ मैं भी कभी भूखा ना सोऊ और ना ही मेरे घर आया कोई सज्जन भूखा रहे। यहाँ कबीर जी परिवार के रूप में संसार रूपी कुटुम्ब की प्रार्थना ईश्वर से कर रहे है।

19 – कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जो मनुष्य गुरु का महत्व नहीं समझता वो अंधे जीवन को जी रहा है। क्योंकि संसार का संपूर्ण ज्ञान हमें गुरु द्वारा ही मिलता है जिससे हम अज्ञानी से ज्ञानी बनते है। अगर ईश्वर नाराज हो जाए तो गुरु रूपी डोर से हम फिर से ईश्वर को पा सकते है। लेकिन गुरु ही रूठ जाए तो कोई डोर नहीं जो सहारा दें सके।

20 – माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं इंसान की चाह, धन सब कुछ नष्ट हो जाता है यहाँ तक की शरीर भी साथ छोड़ने लगता है लेकिन फिर भी इंसान की चाह और भोग-विलास की रूचि नहीं मरती।

21 – बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कद में बड़ा होने से कोई बड़ा नहीं होता। व्यक्ति अपने तन, मन, धन और कर्मो से जब बड़ा होता है तब ही सही मायने में बड़ा कहलाता है क्योंकि बड़प्पन उसके व्यवहार से दिखता है। लेकिन जिसके पास यह गुण नहीं उसके बड़ा होने का कोई फायदा नहीं। जैसे खजूर का पेड़ बहुत बड़ा होता है लेकिन वो किसी मुसाफिर को दो पल की छाँव का सुख भी नही दे सकता और फल इतनी दूरी पर होते है की उससे किसी भूखे की भूख भी शांत नहीं होती।

22 – जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं निरंतर कोशिश करते रहने से व्यक्ति अपनी इच्छा की पूर्ति अवश्य कर लेता हैं। जब कोई गोताखोर गहरे पानी में कूदता है तो कुछ ना कुछ पा ही लेता हैं। लेकिन कई लोग गहरे पानी में डूब जाने के डर से यानी किसी कार्य में असफल होने के डर से कुछ करने का साहस करते ही नहीं और किनारे पर ही बैठे रहते हैं भाग्य के भरोसे।

23 – कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह।
देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जब तक तुम्हारा शरीर है तब तक लोगों को तुमसे आस है। इसलिए जीते जी हमेशा कुछ ना कुछ देते रहो। क्योंकि जब तुम्हारा यही शरीर मिट्टी हो जाएगा तब भला तुमसे कौन आस रखेगा।

24 – या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत।
गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं इस संसार का झमेला तो दो दिन का है। तू इसके मोह-माया में पड़के अपना जीवन व्यर्थ ना कर। अपने गुरु यानी ईश्वर के चरणों में शरण लो जहाँ पूर्ण सुख की अनुभूति होगी।

25 – ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं अपने मन से द्वेष, अहंकार को दूर करके मुख से ऐसे वचन को बोलिए जिससे दूसरों को आपसे खुशी मिले और आप स्वयं भी शांति को महसूस कर सके।

26 – धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर।
अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं सेवा, दान, परोपकार से कभी धन में कमी नहीं आती। जिस तरह नदी सदैव बहती रहती है लेकिन उसके जल में कभी कमी नहीं आती। वो समय के साथ फिर से लबालब हो जाती है। अगर यकीन ना हो तो स्वयं परोपकार करके देख लो।

27 – कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत।
साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत।

अर्थ – कबीर जी संतो को शिक्षा दे रहे है कभी भी ऐसी जगह मत जाओं जहाँ आपके कुल-कुटुम्ब के लोग रह रहे है। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के गुण को नहीं समझ पाएँगे और आपके साथ देहधारि संबंध का नाम देंगे। जैसे फलाना का पिता या बेटा आया हैं।

28 – जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं शुद्ध आहार और पानी से जिस तरह व्यक्ति का तन-मन साफ रहता है। ठीक उसी प्रकार संगति का असर भी होता है। इंसान जैसी संगति में उठता-बैठता है उसकी वाणी भी वैसी हो जाती हैं। इसलिए सदैव अपने आहार-विहार और संगति को ठीक रखो।

29 – गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच।
हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं गाली ही सब फसाद की जड़ है जिसमें पड़कर मनुष्य झगड़ा और मरने-मारने तक ऊतर जाता है। वो व्यक्ति सच्चा संत है जो इस तरह के झमेले में पड़ने से पहले ही अपनी हार मान ले और स्वयं को विरक्त कर ले। जो व्यक्ति गाली-गलोच में पड़कर मरने-मारने पर ऊतर जाए वो नीच समान हैं।

30 – बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार।
औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं हे मनुष्य तू ईश्वर की सच्ची सेवा कर तभी ईश्वर के सच्चे स्वरूप के दर्शन होंगे। यह मनुष्य जीवन का जो उत्तम अवसर तुम्हें मिला हैं, यह बार-बार नहीं मिलने वाला। इस दोहे का तात्पर्य यह है सदा दूसरों की सेवा हेतु तत्पर रहे। क्योंकि मनुष्य जीवन अनमोल है। इसलिए मिले हुए इस जीवन को भी अनमोल बनाओं।

31 – जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश।
तन-मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जीते जी मनुष्य किसी ज्ञान को समझना नहीं चाहता। बल्कि ज्ञान देने पर यही कहता है मुझे उपदेश ना दे। जिसे अपने शरीर और आत्मा का ही बोध नहीं भला उसे किसी ज्ञान से क्या लाभ होने वाला। व्यक्ति को ये समझना चाहिए जीते जी ही ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद भला कौन ज्ञान देगा।

32 – साधू ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जिस तरह अनाज को साफ करने के लिए सूप की जरूरत होती है ठीक उसी तरह इस दुनिया को भी कई सज्जनों की आवश्यकता है जो समाज में सार्थक चीजों को बचा ले और निरर्थक यानी व्यर्थ को समाज से दूर कर दे।

33 – दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त।
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं मनुष्य स्वभाविक तौर से ही दूसरों के दोष-खामी आदि को देखकर बड़ा खुश होता है और मौका मिलने पर मजाक बनाने से भी पीछे नहीं हटता। उस वक्त उस व्यक्ति को स्वयं के दोष दिखाई नहीं देते की इनकी शुरुआत कब हुई और अंत कहाँ जाकर होगा।

34 – पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजू पहार।
था ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं अगर पत्थर की पूजा करने से हरी मिलन होता है तो मैं पर्वत को पूजने को तैयार हूँ। लेकिन कोई घर की चक्की की पूजा क्यों नहीं करते? जिसका पीसा अन्न खाकर व्यक्ति अपनी भूख शांत करता हैं। इसलिए किसी का पूजन करना ही है तो चक्की की करो। चक्की यानी आपका कार्य।

35 – साँच बराबर तप नहीं, झूँठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ताके हिरदे आप।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं इस जगत में सत्य के मार्ग पर चलने जैसी कोई तपस्या नहीं और झूठ से बड़ा कोई पाप कर्म नहीं। जिसके हृदय में सत्य रम जाता है वहाँ हरी का वास ना हो ऐसा हो नहीं सकता यानी उसके मन में सदैव हरी का वास होता है।

36 – साँच बिना सुमिरन नहीं, भय बिन भक्ति न होय।
पारस में पड़दा रहै, कंचन किहि विधि होय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं बिना सच्चे मन और ज्ञान के बिना प्रभु की भक्ति संभव नहीं और भक्ति का भेद जाने बिना हम सच्ची भक्ति कभी नहीं कर सकते। क्योंकि भक्ति के पीछे साहस और भय दोनों छुपा हैं जिसे समझकर ही हम प्रभु भक्ति करते है। अगर पारस पत्थर में जरा भी खोट हो तो वो सोने को कैसे निखारेगा। ठीक इसी तरह अगर मनुष्य के मन में भी विकारों का खोट होगा जैसे पाप, अहंकार, द्वेष, झूठ, लालच आदि के होते सच्चे मन से भक्ति कैसे संभव हैं।

37 – साँचे को साँचा मिलै, अधिका बढ़े सनेह।
झूँठे को साँचा मिलै, तब ही टूटे नेह।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जब सच्चे व्यक्ति की संगत किसी सच्चे व्यक्ति से होती है तब उनमें एक अटूट रिश्ता बन जाता है जिसमें स्नेह के अलावा ओर कुछ नहीं होता। लेकिन जब झूठे व्यक्ति को कोई सच्चा साथी मिलता है तब उनमें धीरे-धीरे प्यार और विश्वास का रिश्ता खत्म होते जाता है क्योंकि झूठ और सच अधिक समय तक साथ नहीं रह सकते।

38 – काह भरोसा देह का, बिनसी जाय छिन मांहि।
सांस सांस सुमिरन करो और जतन कछु नाहिं।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं इस शरीर का क्या भरोसा है यह कभी भी हमारा साथ छोड़ सकता है। इसलिए हर सांस में प्रभु को याद करो। इसके अलावा दूसरा कोई मार्ग नहीं जो मुक्ति दिला सके।

39 – दर्शन को तो साधु हैं, सुमिरन को गुरु नाम।
तरने को आधीनता, डूबन को अभिमान।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं दर्शन करना हो तो संतो का दर्शन सर्वश्रेष्ठ है और सुमिरन के लिए गुरुवाणी सबसे उत्तम है। आगे कबीर जी यह भी कहते है अगर संसार रूपी इस भव सागर को पार करना है तो विनम्रता का गुण अति आवश्यक है। अगर इस संसार में डूबे रहना है या मोक्ष को नहीं पाना है तो अहंकार, अभिमान ही पर्याप्त हैं।

40 – लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे, प्राण जाहिं जब छूट।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं हे मनुष्य अभी तुम्हारें पास जीवन शेष है इसलिए जितनी भक्ति कर सकते हो कर लो, जितना राम का नाम बटोर सकते है बटोर लो। बाद में पछताओगे जब शरीर से प्राण निकलेंगे की जीते जी मैंने कभी भगवान को याद नहीं किया और अब मुझे जाना भी उसी के पास है।

41 – आदि नाम पारस अहै, मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया, छूटा बंधन मोह।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं ईश्वर की याद पारस के समान है और मलिनता से भरा मन लौहे के समान। जिस तरह पारस के संपर्क में आते ही लौहा सोना बन जाता है ठीक उसी तरह ईश्वर का नाम लेने मात्र से मन का शुद्धीकरण हो जाता है और मनुष्य को सभी मोह-माया रूपी बंधनों से मुक्ति मिल जाती हैं।

42 – पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।

अर्थ – कबीर जी इस दोहे के द्वारा यह बताना चाहते है हे मनुष्य तुम सुबह से लेकर देर रात तक अपने ही काम में लगे रहते हो और बाकी का जो समय होता है उसे तुम सोने में निकाल देते हो। चौबीस घंटे में एक पहर भी हरि का नाम नहीं लेते, उसको याद नहीं करते। तो मरते वक्त वो ईश्वर तुम्हें कैसे याद रखेगा। अब तुम ही सोचो तुम्हें मुक्ति की प्राप्ति कैसे होगी?

43 – गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए, आए सिर पर काल।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं जो मनुष्य अपने गुरु की बात नहीं मानता और उसकी अवहेलना करता है वो गलत राह को चुनता है। धीरे-धीरे ऐसा मनुष्य दुनिया, समाज और धर्म से भी पतित हो जाता है और एक दिन ऐसा आता है जब वो सदा दुख व कष्टों से घिरा रहता हैं। इसलिए सदा अपने गुरु का आदर करो अगर आपका कोई गुरु नहीं है तो ईश्वर को अपना गुरु बनाओं और उसके दिखाए मार्ग पर चलने की कोशिश करो।

44 – गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं इस मायारूपी संसार में गुरु के बिना ज्ञान संभव नही और ज्ञान के बिना मोक्ष भी संभव नहीं। गुरु ज्ञान से ही मनुष्य सत्य को देख पाता है और गुरु की सहायता से ही मन के दूषित विकारों से मुक्ति पाना संभव होता है।

45 – गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दिन्ही दान।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं गुरु जैसा कोई दानी नहीं और शिष्य जैसा कोई याचक नहीं होता। गुरु के पास तीनों लोकों से भी बढ़कर एक अनमोल संपत्ति होती है वो है ज्ञान रूपी खजाना। लेकिन जब शिष्य याचक बनकर अपने गुरु से ज्ञान रूपी संपदा की माँग करता है तो गुरु बेझिझक अपनी संपत्ति दान कर देते है।

46 – यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं इस शरीर में सांसारिक विकार व विषयों की एक लंबी जहर की बेल है जो हमें हमेशा उलझाए रखती है। लेकिन गुरुवर इन सब से मुक्त होते है इसलिए उन्हें अमृत की खान कहते हैं। अहंकार, द्वेष, पाप कर्म जैसे विकार शरीर में विष की बेल की तरह हैं। इन विकारों से मुक्ति पाने के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है। अगर अपना सर यानी सर्वस्व देकर भी गुरु या गुरु ज्ञान मिल जाए, तो भी यह सौदा सस्ता समझो।

47 – जग में बैरी कोय नहीं, जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करे सब कोय।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं दुनिया में हमारा कोई भी शत्रु नहीं बन सकता। अगर हमारा मन सदा शांत रहे। यदि हम अपने मन से अहंकार, इच्छा, अभिमान का त्याग कर दे, तो हम सब पर दया कर पाएँगे और दूसरों के लिए हम प्रेम के पात्र होंगे। इसलिए अपने मन को कभी विचलित मत होने दीजिए।

48 – कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया, दूजा देखा काल।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं ईश्वर की प्रार्थना व ध्यान ही जीवन का मुख्य सार हैं। बाकी सब तो जीवन का जंजाल यानी मोह-माया का झमेला हैं। यकीन नहीं तो जीवन को शुरू, अंत और मध्य में जांच-परखकर देख लो। प्रभु ध्यान के अलावा सब कुछ दुख ही दुख हैं।

49 – कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिले, साकट संग न जाए।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं साधु या सज्जन व्यक्तियों की संगत में रहकर कभी स्वादहीन भोजन करना भी पड़े तो उसे प्यार से ग्रहण कीजिए। लेकिन दुष्ट की संगति में रहकर यदि स्वादिष्ट भोजन, खीर, मिठाई या कोई प्रलोभन भी मिले तब भी दुष्ट की संगति में नहीं जाना चाहिए।

50 – सब धरती कागज करू, लेखनी सब वनराज।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए।

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं अगर इस पूरी धरा के बराबर मैं बड़ा कागज बनाऊं, संसार के सभी पेड़ों से कलम बना लूँ और सातों सागर जितनी स्याही बना लूँ तो भी गुरु की महिमा, कृपा और गुणों को लिखना संभव नहीं।

51 – कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा, जादि बरन कुल खोय।

अर्थ – कामी यानी सदा वासनाओं में लिप्त, क्रोधी यानी द्वेष-जलन और लालच यानी निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति कभी भक्ति मार्ग पर नहीं चल सकते। भक्ति तो कोई शूरवीर ही कर सकता है जो जाती, कुल, वर्ण और अहंकार को सरलता से त्याग कर देता हैं।

52 – निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।

अर्थ – कबीर जी कहते है जो लोग दूसरों की निंदा करते है ऐसे निंदक लोगों को अपने आस-पास रखना चाहिए। क्योंकि ऐसे लोग आपको भी आपकी बुराई बताए बिना नहीं रहेंगे और जब आपको अपनी बुराई का पता चलेगा तो आप बड़ी आसानी से उसे सुधार सकते हैं। इस तरह बिना कुछ खर्च किए ऐसे निंदक लोग आपको शीतल बनाने का काम करते हैं।

53 – पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात।

अर्थ – मनुष्य की चाह पानी के बुलबुले की तरह है। पल में बनती हैं और पल में ही नष्ट हो जाती हैं। यह मनुष्य जात का आत्मिक स्वभाव होता हैं। लेकिन जिस दिन ईश्वर की सच्ची अनुभूति यानी दर्शन होंगे, उस दिन यह सब मोह-माया, अंधकार सब प्रभु के प्रभात से छिप जायेगा।

54 – मालिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार।
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार।

अर्थ – मालिन को बगीचें में देखकर कलियाँ आपस में बतियाती है आज मालिन ने फूलों को तोड़ा है कल हमारी बारी होगी। कबीर जी का कहने का यह तात्पर्य है आज आप जवां है लेकिन कल आप भी बूढ़े होंगे और इस मिट्टी में मिल जाएँगे। ठीक इस कली की तरह जैसे आज की कली कल फूल बनेगी।

55 – काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

अर्थ – समय की कीमत को दर्शाते हुए संत कबीर जी कहते है हमारे पास समय की बहुत कमी हैं। इसलिए जो काम भी आपने कल पर छोड़ा हैं उसे आज पूरा करो और जो कार्य आज करना हैं उसे समय गवाएं बिना अभी करो। क्योंकि कल क्या होने वाला है यह किसी को नहीं पता। किसी भी प्रलय को आने में पल भर भी नहीं लगता। फिर आप अपने कार्य को पूरा कब और कैसे करेंगे?

56 – ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग।

अर्थ – कविराज कहते हैं जिस तरह तिल के अंदर तेल होता है और आग के अंदर प्रकाश। ठीक उसी तरह हमारा ईश्वर भी हमारे हृदय में विराजमान हैं। इसलिए अपने मन के प्रकाश से अपने ईश्वर को खोज कर दिखाओं।

57 – जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप।
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।

अर्थ – कबीर जी कहते हैं जहाँ दया भाव होता है वहाँ धर्म होता हैं, जहाँ लालच होता है वहाँ पाप पैदा होता हैं, जहाँ क्रोध होता हैं वहाँ सर्वनाश निश्चित रूप से होता हैं और जहाँ क्षमा का भाव हैं वहाँ सदैव ईश्वर का वास होता हैं। इसलिए सदा अपने जीवन में दया और क्षमा का भाव जगाए रखो।

58 – आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर।

अर्थ – कबीर जी कहते हैं इस दुनिया में जो भी आया हैं उसे एक ना एक दिन तो जाना ही होगा। फिर चाहे वो राजा हो गरीब हो या भिखारी। बस फर्क होगा तो संसार से जाने के तरीके में। अगर किसी के कर्म अच्छे होंगे तो वो सिंहासन पर बैठकर स्वर्ग जाएगा और अगर किसी के पाप कर्म होंगे तो वो जात-पात की जंजीरों से बँधकर नर्क को जाएगा।

59 – अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ – कबीर जी कहते है जरूरत से ज्यादा बोलना और चुप रहना दोनों ही गलत हैं। जैसे अधिक बारिश और अधिक धूप दोनों ही असहनीय हैं। कहने का तात्पर्य यह है व्यक्ति को यह पता होना चाहिए उसे कब बोलना हैं और कब चुप रहना हैं। क्योंकि अधिक बोलने वालों की लोग सुनते नहीं और चुप रहने वालों को लोग कुछ समझते नहीं।

60 – दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ – इस संसार में अगर कुछ दुर्लभ हैं तो वो है मनुष्य का जन्म। यह मानव शरीर हर बार नहीं मिलता। जिस तरह पेड़ की डाल से टूटा पत्ता वापस पेड़ पर नहीं लगता। ठीक उसी प्रकार मरने के बाद हर बार मनुष्य जीवन मिले यह जरूरी नहीं। इसलिए अपने जीवन को अनमोल समझो और सदुपयोगी बनाओं।

61 – कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।

अर्थ – कबीर जी कहते है इस संसार रूपी बाजार में रहकर किसी का भला कर सकते हो तो करो। अगर किसी से दोस्ती नहीं कर सकते, किसी का भला नहीं कर सकते तो कम से कम किसी का बुरा करके उससे शत्रुता भी मत करों।

62 – हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ – कबीर जी कहते है हिंदू को राम प्यारे है तो मुस्लिम को रहमान अज़ीज हैं। दोनों अपने-अपने भगवान को लेकर इस कदर लड़ते हैं की मौत के मुँह तक पहुँच जाते हैं। फिर भी दोनों सच को नहीं जान पाते की ईश्वर तो एक हैं बस उसका नाम सबने अपने-अपने हिसाब से रखा हैं।

63 – कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।

अर्थ – कहते-सुनते जीवन के सभी दिन निकल गये। लेकिन फिर भी मन की उलझन वैसी की वैसी है कोई हल नहीं निकला। आगे कबीर जी कहते है इतना सब कुछ होने के बाद भी मन की चेतना लौटी नहीं हैं। ऐसा लगता है आज भी इसकी अवस्था जीवन के पहले दिन के समान ही हैं।

64 – कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ – कबीर जी कहते है मनुष्य का तन पंछी के समान हो गया है इसलिए जहाँ इसका मन होता है यह वही पहुँच जाता हैं। कहने का अर्थ यह है मनुष्य अपने मन का दास बन चुका हैं। आगे कबीर जी कहते है जैसी हमारी संगति होगी भविष्य में उसका फल भी उसी अनुरूप मिलेगा। कहने का तात्पर्य यह है की अपने मन को नियंत्रण में रखते हुए अपनी बुद्धि से काम लीजिए और बुरे की संगत में पड़ने से अच्छा है आप साधु-संत व सज्जनों की संगत कीजिए।

65 – झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

अर्थ – झूठे सुख को सच्चा सुख मानकर व्यक्ति मन ही मन फूला नहीं समाता। सबकी उसे यह नहीं पता यह पल दो कुछ समय का मेहमान हैं। हे मनुष्य अपनी बुद्धि की आँखों से देखो यह दुनिया काल का ग्रास है। कुछ इसमें समा गये और कुछ इसकी छाया में हैं अर्थात उनकी भी मौत तय हैं। आगे कबीर जी कहते है सांसारिक सुख में रहने से अच्छा है प्रभु का सुमिरन कीजिए। प्रभु याद से जो सुख मिलेगा वो सच्चा सुख होगा जो मरने के बाद भी आनंद की अनुभूति कराएगा।

66 – जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश।
जो है जा को भावना सो ताहि के पास।

अर्थ – कमल पानी में खुलता है और चाँद स्थान आकाश में है। दोनों में इतनी दूरी होने के बावजूद जब चंद्रमा का प्रतिबिंब जल में चमकता हैं तो मानों ऐसा लगता है जैसे चंदा स्वयं चलकर कमल के पास आया हैं और कितने पास लगते है दूरी के बावजूद भी। ठीक इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति ईश्वर से सच्चा प्यार करता है तो ईश्वर स्वयं चलकर अपने भक्त के पास आ जाते हैं।

67 – अहिरन की चोरी करै, करै सुई की दान।
उॅचे चढ़ि कर देखता, केतिक दूर बिमान।

अर्थ – व्यक्ति अपने जीवन में चोरी तो लोहे जितनी यानी समुंद्र जितनी और दान सुई जितना यानी बूँद बराबर करता हैं। फिर ऊपर ईश्वर को देखकर इतराता है की मेरा स्वर्ग जाने का विमान अब कितनी दूर हैं। लोग ता जीवन पाप कर्म करते है और जरा से दान से यह देखता-सोचता है की मैंने तो दान किया है अब तो स्वर्ग का विमान ही मुझे लेने आयेगा। हे मनुष्य तुम्हारें पाप-पुण्य की गठरी तय करेगी तुम्हें स्वर्ग जाना है या नर्क।

68 – आज कहै मैं काल भजू, काल कहै फिर काल।
आज काल के करत ही, औसर जासी चाल।

अर्थ – कबीर जी कहते है व्यक्ति अपने काम में इतना मग्न है की उसे आज प्रभु भजन करने को कहो तो कहते है मैं कल से करूँगा। जब कल आता है तो फिर से कहते है पक्का कल से करेंगे। इस आज-कल के चक्कर में पूरा जीवन यूँही व्यर्थ हो जाता है और सुमिरन का समय हाथ से निकल जाता हैं।

69 – जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

अर्थ – जिस तरह एक खरे हीरे की परख एक पारखी यानी जोहरी कर सकता हैं। ठीक उसी तरह हे मनुष्य तुम्हारें गुणों की कद्र भी तब होती है जब उसका सही खरीददार मिलता है। तब तुम्हारें गुणों की कीमत अनमोल हो जाती हैं। लेकिन जब उचित खरीददार नहीं मिलता तब वही गुण कौड़ी के भाव चला जाता हैं।

70 – जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ – संसार अपने नियम पर चलता हैं जो उदय हुआ हैं वो अस्त भी होगा। जो खिला है वो एक दिन मुरझा जायेगा। जिसे चिनवाया गया है वो एक दिन गिर जायेगा और जो इस संसार में आया है वो एक दिन निश्चित ही जायेगा।

71 – कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

अर्थ – कबीर जी यह कहना चाहते है हे मनुष्य तुम सांसारिक दौलत को ही सब कुछ समझ रहे हो। जबकि यह दौलत क्षणिक सुख हैं। ऐसे धन को इकट्ठा करो जो तुम्हारें आगे के जन्म में भी काम आए। क्योंकि धन की गठरी को सर पर ले जाते हुए तो आजतक किसी को नहीं देखा। यानी अच्छे कर्म के पुण्य को इकट्ठा करो।

72 – प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए।
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए।

अर्थ – कबीर जी कहते है प्रेम की खेती ना तो खेतों में होती है और ना ही यह बाजार में बिकाऊ हैं। प्रेम तो लोगों के हृदय में पैदा होता हैं। इसलिए जिसे भी प्रेम चाहिए चाहे वो राजा हो या प्रजा उसे अपना अहंकार, काम-क्रोध, भय, इच्छा नामक शीश का त्याग करना होगा।

73 – जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही।
ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही।

अर्थ – कबीर जी इस दोहे में यह समझाना चाहते है जिस घर में साधु-सज्जनों और सच की पूजा नहीं होती। वो घर पूज्‍यनीय नहीं हैं बल्कि उस घर में पाप का बसेरा हैं। ऐसा घर तो शमशान के समान है जहाँ दिन में भी भूत-प्रेत का डेरा रहता हैं।

74 – मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

अर्थ – कबीर जी कहते है हे मनुष्य मन की इच्छाओं का त्याग करो। क्योंकि यह इच्छाएँ तो अनंत सागर की तरह होती है जिसका ना कोई आदि और अंत। जिस इच्छा को तुम अपने बलबूते पर पूर्ण नहीं कर सकते, तो उन्हें त्यागना ही उचित हैं। अगर पानी से घी निकलने लग जाए तो भला रूखी-सुखी खाएगा कौन?

75 – जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।

अर्थ – कबीर जी कहते है जब तक मनुष्य को लगता है सब कुछ मैं कर रहा हूँ वो अहंकार में लिप्त रहता हैं और उसे कही भी ईश्वर नजर नहीं आते। जैसे ही अज्ञानता पर ज्ञान का प्रकाश पड़ता है वैसे ही चारों ओर प्रभु के ही दर्शन होते हैं। हृदय में जैसे ही ज्ञान का दीपक जला वैसे ही सारा अंधियारा मिट गया। ज्ञान के आलोक से प्रभु को पाया जा सकता है और अहंकार मिटाया जा सकता हैं।

76 – आंखि ना देखे बापरा, शब्द सुनै नहि कान
सिर के केश उजल भये, आबहु निपत अजान।

अर्थ – जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र का पड़ाव पार होते जाता हैं उसे आँखों से दिखना, कानों से सुनना सब बंद हो जाते हैं। यहाँ तक की सिर के सारे बाल भी सफेद हो जाते हैं। लेकिन फिर भी उसे ईश्वर की सत्ता पर विश्वास नहीं होता और अपना पूरा जीवन अनजान बनकर इसी मूर्खता में व्यतीत कर देता है की सब कुछ वहीं कर रहा हैं। उम्र के साथ ज्ञान भी आए यह जरूरी नहीं।

77 – अच्छे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।

अर्थ – जब हम अच्छे दिन व्यतीत कर रहे थे तब हमने हरि का ध्यान तक नहीं किया और जब आज वो दिन रहे नहीं तो हम हरि को प्रेम से याद कर रहे हैं। इसलिए अब पछतावे का क्या लाभ जब समय ही हाथ से निकल गया यानी जब किसान ने खेत की रखवाली ही नहीं की और देखते ही देखते पंछी सारी फसल खा गये। इसलिए दिन चाहे अच्छे हो या बुरे प्रभु का साथ कभी मत छोड़िए।

78 – ऐक शीश का मानवा, करता बहुतक हीश।
लंका पति रावन गया, बीस भुजा दस शीश।

अर्थ – कबीर जी कहते है एक सिर का मनुष्य आज इतना घमंड और अहंकार करता है जैसे उसके आगे कोई कुछ नहीं। जब लंकापति रावण दस शीश और बीस हाथ होते हुए भी इस दुनिया से चला गया तो औरों का क्या कहना। कहने का यह मतलब है अहंकार तो रावण का भी नहीं चला।

79 – एैसी गति संसार की, ज्यों गादर की थाट।
ऐक परि जीहि गार मे, सबै जाहि तिहि बाट।

अर्थ – इस संसार की चाल भेड़चाल के समान हैं। अगर एक भेड़ किसी खाई में गिर जाए तो भेड़ का पूरा झुंड भी वहीं पहुँच जाता हैं। ठीक इसी प्रकार इंसान भी एक दूसरे की नकल ही करते रहते हैं अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करते।

80 – रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।

अर्थ – रात सोने में गुजार दी और दिन खाने-पीने में व्यस्त था। प्रभु ने तुम्हें हीरे जैसा बहुमूल्य जन्म दिया। जिसे तुमने व्यर्थ के कामों में बिता दिया। जीवन में कुछ भी सार्थक नहीं किया, जिससे तुम्हें अपने जीवन पर नाज हो। तो अब तुम्हीं बताओं तुम्हारें जीवन का क्या मोल बचा है? कौड़ी समान।

81 – मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह।

अर्थ – मान-सम्मान, प्यार-प्रेम, गौरव, गुण, आशा, महत्व सब कुछ बाढ़ में बह जाते है जब किसी व्यक्ति से कुछ देने को कहा जाए।

82 – कबिरा चिंता क्या करु, चिंता से क्या होय।
मेरी चिंता हरि करै, चिंता मोहि ना कोय।

अर्थ – कबीर जी कहते है हे मनुष्य तू क्यों चिंता करता हैं और चिंता से भला क्या होने वाला हैं। देखों जिसने मुझे इस संसार में भेजा हैं वो ईश्वर खुद मेरी चिंता कर रहा हैं। तो भला मैं क्यों चिंता करके अपना समय खराब करू।

83 – जाके दिल मे हरि बसै, सो जन कलपै काहि।
एक ही लहरि समुद्र की, दुख दारिद बहि जाहि।

अर्थ – हे मनुष्य तू क्यों दुखी होकर रोता-बिलखता है जब तुम्हारें हृदय में ईश्वर का वास हैं। जिस तरह सागर की एक लहर सब कुछ बहाकर ले जाती हैं। ठीक उसी तरह प्रभु की एक कृपा की लहर मनुष्य के सभी दुख व दरिद्रता को बहाकर ले जायेगी।

84 – मुरदे को भी देत है कपड़ा पानी आग।
जीवत नर चिंता करै, ताका बड़ा अभाग।

अर्थ – कबीर जी कहते है भगवान तो मरे हुए के लिए भी कफन, पानी और आग की व्यवस्था कर देता हैं। यह तो जीवित मनुष्य का दुर्भाग्य हैं जो वो अपने जीवन यापन की चिंता में पूरा जीवन व्यर्थ कर देता हैं।

85 – जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ।
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ।

अर्थ – जो जाने वाला है वो जायेगा। इसलिए उसे रोकने का प्रयास मत करो, उसे जाने दो। बस तुम अपनी स्थिति व दशा को व्याकुल मत करो। उसे अपने स्वरूप में रहने दो। जिस तरह केवट के पास लोग खुद से आते हैं। ठीक उसी तरह समय आने पर अनेका अनेक व्यक्ति स्वयं आकर तुमसें मिलेंगे।

86 – सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग।
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग।

अर्थ – जिन घरों में सातों स्वर और हर पल त्यौहार मनाए जाते थे आज वो घर भी सुने पड़े हैं। आज उनपर कौए बैठते हैं। कहने का तात्पर्य यह हैं समय कभी एक सा नहीं रहता। जहाँ खुशी थी वहाँ गम का बसेरा हो सकता हैं। जहाँ उल्लास था वहाँ विषाद डेरा डाल सकता हैं और यह कोई सपना नहीं बल्कि यह सब कुछ इस संसार में होता हैं।

87 – तेरा संगी कोई नहीं सब स्वारथ बंधी लोइ।
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ।

अर्थ – इस संसार में कोई किसी का हितेशी नहीं, सभी मनुष्य स्वार्थ के रिश्ते में बँधे हैं एक दूसरें के साथ। लेकिन इस सच पर व्यक्ति तब तक विश्वास नहीं करता। जब तक उसे अपनी आत्मा पर विश्वास नहीं होता। जिस वजह से व्यक्ति संसार के मोह में रमा रहता हैं। जब संसार की स्वार्थमय सच का बार-बार सामना होता है तब अपनी अंतरात्मा की ओर उन्मुख होते और अपनी आत्मा पर विश्वास करते हैं।

88 – करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय।

अर्थ – यदि तू स्वयं को कर्ता समझता है तो बुरे कर्म के वक्त चुप क्यों बैठा था? अब अपने कर्मो को याद करके पछताने का क्या लाभ? जब तुमने अपने कर्म में बबूल के पेड़ का बीज़ बोया हैं तो अब आम खाने को कैसे मिलेंगे।

89 – मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई।
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई।

अर्थ – कभी भी मूर्ख लोगों की संगत मत रखो। ऐसे लोग लोहे के समान होते हैं जो जल में तैर नहीं पाता और डूब जाता हैं। ऐसे लोगों की संगत में रहने वाले भी डूब जाते हैं। संगति का असर बहुत ज्यादा होता हैं जैसे आकाश से ओस की एक बूँद केले के पत्ते पर गिरे तो कपूर, सीप के मुँह में गिरे तो मोती और सर्प के मुख में गिरकर विष बन जाती हैं। जबकि बूँद तो समान थी लेकिन हर बूँद की संगति का असर अलग था।

90 – ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय।
सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय।

अर्थ – कबीर जी कहते है उच्च कुल में जन्म लेने का क्या फायदा जब कर्म ही उच्च कोटि के ना हो। अगर सोने के कलश में मदिरा भर दी जाए तो साधु-सज्जन तो निंदा करेंगे ही। अर्थात व्यक्ति की पहचान उसके कुल से नहीं बल्कि उसके कर्म से होती हैं।

91 – जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी।
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्यौ गयानी।

अर्थ – जब घड़े में पानी भरा जाता है तब घड़ा पानी में रहता है और घड़ा भरने के बाद जल घड़े में होता हैं। देखा जाए तो भीतर-बाहर जल ही जल हैं। जैसे ही घड़ा फूटता है तो जल जल में मिल जाता है अलग नहीं रहता यानी घड़े के चारों तरफ पानी की ही सत्ता हैं। ज्ञानी इस विचार धारा को मानते है की आत्मा-परमात्मा दो नहीं बल्कि एक हैं। दोनों एक दूसरे के अंदर बसी हैं। यानी चारों तरफ संसार में परमात्मा की ही सत्ता हैं। जब शरीर मिट्टी में विलीन होता है तब आत्मा परमात्मा में समा कर एकाकार हो जाती हैं। क्योंकि आत्मा परमात्मा का ही अंश हैं।

92 – मन के हारे हार है मन के जीते जीत।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।

अर्थ – जीवन में हार-जीत मन की विचारधारा हैं। अगर मन से इंसान हार जाता है तो पराजय निश्चित है और व्यक्ति अगर मन को जीत लेता है तो वो विजेता कहलाता हैं। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पाया जा सकता है अगर ईश्वर को पाने का विश्वास ही नहीं तो कैसे पाएँगे?

93 – साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं।
धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं।

अर्थ – साधु-सज्जन लोग मन की भावना के भूखे होते हैं। उन्हें धन का लालच नहीं होता। जो साधु धन के लोभी होते हैं वो साधु कदापि नहीं हो सकते।

94 – हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार।
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार।

अर्थ – दाह-संस्कार में हड्डियाँ जलती है साथ में लकड़ी भी, यहाँ तक अग्नि देने वाला भी एक दिन जल जाता हैं। समय आने पर उस मंजर को देखने वाले भी जल जाते हैं। जब सब का अंत एक ही है तो गुहार, आग्रह किससे की जाए। आखिर सब एक नियती से जुड़े है और सबका अंत भी एक ही हैं।

95 – कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं।

अर्थ – इस दुनिया में ना कोई अपना है और ना हम किसी के। जैसे एक नौका किनारे पर आती है सब यात्री जो मिलजुल कर बैठे थे ऊतर कर बिछड़ जाते हैं। ठीक वैसे ही हम सब इस भव सागर में एक साथ मिले है और जिसका जब-जब किनारा आएगा वो ऊतर कर हम से बिछूड़ जाएगा और सभी सांसारिक बंधन यही रह जाएँगे।

96 – देह धरे का दंड है सब काहू को होय।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय।

अर्थ – शरीर धारण करने का दंड सभी को भुगतना पड़ता हैं। शरीर को जो भी सुख-दुख मिलने वाले है वो भोगने पड़ते हैं। अंतर सिर्फ इतना है ज्ञानी संतुष्टता के साथ सब कुछ भोगता है और अज्ञानी दुख-विलाप के साथ सब कुछ झेलता हैं।

97 – चिंता छोरि अचिंत रह देनहार समरथ।
पसु पखेरु जन्तु जीव, तिन के गंथि ना हाथ।

अर्थ – चिंता नहीं चिंतन करो और निश्चित रहो, क्योंकि देने वाला ईश्वर सामर्थयवान हैं वो सबको अपने हिस्से का देता हैं। संसार में पशु, पंछी, जीव, जन्तु के पास ना तो कोई गठरी है और ना ही मनुष्य के समान हाथ। फिर भी इस संसार में सबका पेट भरता है कोई भूखा नहीं रहता। क्योंकि ईश्वर सबका पालनहार हैं।

98 – कबीर गर्व ना किजीये, काल गहे कर केश।
ना जानो कित मारि है, क्या घर क्या परदेश।

अर्थ – कबीर जी कहते है कभी अपने आप पर घमंड मत करो। क्योंकि काल ने तुम्हारें बालों को कश के अपने हाथों में पकड़ रखा हैं। यह कोई नहीं जानता उसकी मृत्यु कहाँ होगी। अपने घर में या परदेश में। यह किसी को नहीं पता काल तुम्हें कहा मारेगा।

99 – मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख।
मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है किसी से कुछ मांग कर लेना तो मरण समान है। इसलिए माँगने की आड़ में कभी किसी से भीख मत लो। माँग कर जीने से तो कई गुणा अच्छा हैं मरना। कहने का तात्पर्य यह है समय चला जाता है लेकिन अहसान रह जाता हैं।

100 – कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।
मीठे वचन सुना के, जग अपना कर ले।

अर्थ – कौआ किसी का धन नहीं चुराता फिर भी वो किसी को पसंद नहीं। वहीं दूसरी ओर कोयल किसी को धन नहीं देती फिर भी सब उसे पसंद करते हैं। जबकि रंग दोनों का एक है। फर्क है तो सिर्फ बोली का…..कोयल अपनी मीठी बोली से सबका मन हर लेती हैं।

101 – कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढूढ़ै वन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं,दुनिया देखे नाहि।

अर्थ – हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है फिर भी हिरण उसकी खुशबू को पूरे जंगल में ढूंढता रहता हैं। ठीक इसी प्रकार ईश्वर सर्वव्यापी है यानी जन-जन के हृदय में बसा हैं। परंतु दुनिया उन्हें स्वयं में देख नहीं पाती और बाहर ढूंढती रहती हैं।

कबीर जी के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं। इसलिए हम कबीर जी के अधिका अधिक दोहों को संकलित करने हेतु प्रयासरत हैं।

विक्रम संवत् का इतिहास