जानिए कैसे पाखंडी बाबा बना लेते हैं करोड़ों का साम्राज्य

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भारत में अध्यात्म और अंधविश्वास का चोली दामन का साथ है । कोई अपनी गरीबी से तंग है तो कोई और ऊंचाइयों को छूना चाहता है तो कोई अपनी ख़राब स्थिति के लिए किस्मत को दोष देता है और ऐसे में ये रास्ता उन्हें अध्यात्म की तरफ ले जाता है । अब चूँकि लोग सीधे भगवान से नहीं मिल सकते तो ऐसे में कुछ पाखंडी बाबाओं को भोली भाली जनता को ठगने का जरिया मिल जाता है जो खुद को ईश्वर का अवतार बताते हैं और लोगों की समस्या हल करने का दावा करते हैं । आश्चर्य तो तब होता है जब जनता उनसे अपनी समस्या बताती है और जवाब में बाबा कहते हैं “आप समौसे के साथ लाल चटनी खाते हो और हरी चटनी नहीं खाते, जाओ आज से हरी चटनी खाना शुरू कर दो तुम्हारा भाग्य बदल जायेगा” ।

अगर संयोग से ऐसे बाबाओं के संपर्क में आने से किसी का बिगड़ा काम बन जाये तो वो उस बाबा को भगवान समान मानने लगते हैं और फिर ऐसे बाबाओं का प्रचारक बन जाते हैं और इस तरह बाबाओं का नेटवर्क बढ़ता जाता है । ऐसे में जनता का भला हो ना हो लेकिन बाबाओं के पास धन-दौलत, बड़ी बड़ी गाड़ियां और भरी भरकम प्रॉपर्टी जरूर बन जाती है ।

ये अंध विश्वास ही है जिससे दुखी जनता ऐसे बाबाओं की तरफ आकर्षित होती है, ख़ास तौर पर महिलाऐं । आप किसी भी सत्संग या बाबाओं के आश्रम में देखेंगे तो वहां ज्यादा संख्या महिलाओं की ही होती है । दरअसल महिलाऐं ज्यादा भावुक होती हैं जो अपने घर की सुख शांति के लिए सब छोड़कर बाबाओं के चक्कर में आसानी से आ जाती हैं । इतना ही नहीं वो अपने परिवार के सदस्यों को भी इस ओर खींंच लाती हैं ।

कुछ धर्मगुरु बाबा तो इतने चालाक होते हैं की अंधविश्वासी भक्तजनों की आस्था को मोहरा बनाकर उन्हें ये सीख देते हैं की घर में उनकी ही तस्वीर लगाओ और रोज उसकी पूजा करो । आश्चर्य तो तब होता है जब अंधविश्वासी भक्तजन उनकी सलाह मानकर ऐसा करते भी हैं। इन्ही में से आये दिन पाखंडी बाबाओं का घिनोना चेहरा बेनकाब होता आ रहा है और उनके काले धंधे पकडे जा रहे हैं । कुछ बाबाओं के तो सेक्स स्केंडल भी सामने आये हैं लेकिन दुःख की बात ये है की फिर भी इनके भक्तजन और अंधविश्वासी जनता अपनी ऑंखें खोलने को तैयार नहीं है । यहाँ तक की इन पाखंडी बाबाओं के समर्थन में खड़े हो जाते हैं और कहते हैं की हमारे गुरु को झूठे इल्जाम में फंसाया जा रहा है और उन पर लगे सभी आरोप झूठे हैं ।

इन पाखंडी बाबाओं को बढ़ावा देने में हमारे न्यूज़ चैनल भी अहम भूमिका अदा करते हैं जो इन्हें अपने ही चैनल पर बुलाते हैं जहाँ वो अपना ज्ञान बांटते हैं और फेमस होते हैं । लेकिन दूसरे नजरिये से देखा जाये तो हम लोग भी इन ढोंगी बाबाओं को बढ़ावा देने में अपनी भागीदारी निभाते हैं जो इनकी बकवास बातों को सुनते हैं और ग्रहण करते हैं । हमें ये सोचने की आवश्यकता है की हम हमारे जीवन की मुसीबतों से खुद निकल सकते हैं या बाबा द्वारा बताये गए हास्यास्प्रद समाधान अपनाकर । क्या अब हमारी समस्याएं रोज लाल चटनी की बजाये हरी चटनी खाने से हल होगी ?

कब तक हम इन बाबाओं के चंगुल में फंसते रहेंगे ? हालाँकि ऐसा नहीं है की सभी धर्मगुरु या बाबा पाखंडी हों – उदाहरण के तौर पर आदरणीय रामसुखदास जी महाराज को ही ले लीजिये जिन्होनें कभी भी चाहे पुरुष हो या स्त्री अपने पैर के हाथ नहीं लगाने दिया । उनका कहना था की पैर छूने हैं तो अपने घर के बड़े बुजुर्गों के छुएं जिनके आशीर्वाद से आपको सभी पुण्य मिल जायेंगे । लेकिन आज के पाखंडी बाबाओं पर आँख बंद करके भरोसा करना और सिर्फ इन्हीं पर आश्रित हो जाना सही नहीं है । अगर हमें धर्म और ईश्वर में आस्था है तो हम भगवान की आराधना घर पर भी कर सकते हैं । क्योंकि हम लोगों की कमजोरी और आत्मविश्वास की कमी का ही ये पाखंडी बाबा फायदा उठाते हैं और खुद दिन रात अमीर होते जाते हैं और ऐशो आराम की जिंदगी जीते हैं । हाल ही में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम के भी काले कारनामों से पर्दा उठ चुका है और कोर्ट ने उन्हें सलाखों के पीछे भेज दिया है । सिर्फ राम रहीम ही नहीं पहले भी कई बड़े बड़े धर्मगुरु बेनकाब हो चुके हैं जो अब भी जेल की हवा खा रहे हैं लेकिन फिर भी जनता इनके बहकावे में आ रही है ।

आश्चर्य की बात तो ये है की सिर्फ गरीब, अनपढ़ लोग ही नहीं बल्कि पढ़े लिखे लोग और बड़ी बड़ी हस्तियां भी ऐसे ढोंगी बाबाओं के चंगुल में फंस जाते हैं । लेकिन सवाल ये है की आखिर कब तक हम ऐसे बाबाओं पर भरोसा करते रहेंगे? जब तक हम खुद नहीं समझेंगे ऐसे बाबाओं का कारोबार बढ़ता रहेगा और ये हमें ऐसे ही लूटते रहेंगे और खुद की संपत्ति बनाते रहेंगे ।

अंत में हम बस यही कहना चाहते हैं की सजग रहें, खुद पर भरोसा रखें क्योंकि अपने बिगड़े काम सिर्फ हम खुद ही संवार सकते हैं कोई और नहीं । अगर इस लेख में कुछ गलत लगा हो या किसी की भावनाओं को ठेस लगी हो तो हम माफ़ी चाहते हैं ।

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