कैलाश सत्यार्थी कौन है?

फरवरी 19, 2018

‘भारत में सैंकड़ों समस्याएं और लाखों समाधान हैं’ ये कहना है शांति का नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले कैलाश सत्यार्थी का, जिन्होंने बाल मजदूरी का अंत करने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। 11 जनवरी 1954 को मध्यप्रदेश के विदिशा में जन्मे ‘कैलाश शर्मा’ ने आगे चलकर अपना नाम ‘कैलाश सत्यार्थी’ कर लिया और ये नाम उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही है क्योंकि उन्होंने सत्य की राह को चुनकर उस पर चलने का विकल्प ही अपनाया।

इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई पूरी करने के बाद कैलाश सत्यार्थी ने बतौर टीचर एक कॉलेज में नौकरी भी की लेकिन ये काम उन्हें ज़्यादा समय तक बांधे नहीं रख सका क्योंकि उनका झुकाव शुरू से ही समाज की सेवा और सुधार की ओर था।

बच्चों के बचपन को बचाने के लिए उन्होंने ढ़ेरों प्रयास किये जो आगे चलकर ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के रूप में सामने आये। ये उन्हीं के नेक इरादे और प्रयासों का नतीजा था कि 80 हजार से भी ज़्यादा बच्चों का बचपन सुधर गया और उन्हें बेहतर शिक्षा और जीवनयापन के अवसर मिल गए।

बच्चों को बाल मजदूरी के जाल से बचाने और उनके बचपन की रक्षा करने के लिए कैलाश सत्यार्थी ने दुनिया भर के गैर सरकारी संगठनों, शिक्षकों और ट्रेड यूनियंस को अपने साथ जोड़ लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने दुनिया भर के ऐसे संगठनों के साथ खुद को जोड़ा जो बच्चों के हितों की सुरक्षा के लिए काम करते हैं ताकि वो पूरी दुनिया के बच्चों तक अपनी पहुँच बना सकें।

कैलाश सत्यार्थी ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ और इसकी अंतर्राष्ट्रीय एडवोकेसी बॉडी के सदस्य भी हैं जिसे ‘इंटरनेशनल सेण्टर ऑन चाइल्ड लेबर एंड एजुकेशन’ के नाम से भी जाना जाता है।

कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों से मजदूरी करवाने के काम को मानव अधिकारों से जोड़कर इसके खिलाफ आवाज़ उठायी। यूनेस्को ने भी कैलाश सत्यार्थी के इन प्रयासों को समझा और ‘ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन’ नामक अपनी संस्था का सदस्य बनाया। ये संस्था बच्चों की शिक्षा के लिए गठित की गयी है।

बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी को जड़ से मिटाने में जुटे कैलाश सत्यार्थी के प्रयासों और नेक इरादों को पूरी दुनिया ने सराहा और आज उनकी पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बन गयी है और उनके प्रयासों में पूरी दुनिया की संस्थाएं जुट गयी हैं। उन्हें भारत के अलावा अमेरिका, इटली, स्पेन, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देशों में भी सम्मानित किया गया है।

कैलाश सत्यार्थी ने इंजीनियरिंग की राह छोड़कर इतनी कठिन राह का चुनाव किया और उस पर बिना थके आज भी चलने वाले शख्स का नाम ही सत्यार्थी हो सकता है जिन्होंने बच्चों के बचपन को बचाने के लिए अपनी पूरी उम्र लगाने का जो संकल्प लिया, उसे वे लगातार निभा रहे हैं।

हमें भी अपने स्तर पर बच्चों को बाल मजदूरी के चंगुल से छुड़ाने के लिए कुछ प्रयास तो करने ही चाहिए ताकि हर बच्चा अपने बचपन को खुलकर जी सके और इसके लिए अगर हम सिर्फ एक कदम भी बढ़ाये तो बहुत से बच्चों की ज़िन्दगी को संवार सकते हैं इसलिए इस बारे में सोचियेगा ज़रूर! क्यूंकि हम सभी में, कहीं ना कहीं आज भी बचपन छुपा है और एक सत्यार्थी भी।

“मुरलीकांत पेटकर कौन है?”

Featured Image Source

अगर आप हिन्दी भाषा से प्रेम करते हैं और ये जानकारी आपको ज्ञानवर्धक लगी तो जरूर शेयर करें।
शेयर करें