जैविक घड़ी क्या है और ये कैसे काम करती है?

जनवरी 16, 2018

आपने कभी ना कभी, कहीं ना कहीं बॉडी क्लॉक के बारे में सुना-पढ़ा ज़रूर होगा और आप जानना चाहते होंगे कि क्या वाकई शरीर के पास ऐसी कोई क्लॉक होती है? ऐसे में क्यों ना आज, बॉडी क्लॉक या जैविक घड़ी के बारे में बात की जाए ताकि आपको अपने इस सवाल का जवाब मिल सके। तो चलिए, आज जानते हैं बॉडी क्लॉक के बारे में-

समय देखने के लिए आप घड़ी का इस्तेमाल करते है ना ! बिलकुल वैसे ही प्रकृति ने एक घड़ी हमारे शरीर को भी दी है ताकि शरीर से जुड़ा हर काम सही समय पर हो सके। प्रकृति द्वारा दी गयी इस घड़ी को ही जैविक घड़ी या बॉडी क्लॉक कहते हैं।

हम सभी जिस प्रकृति का हिस्सा हैं उस प्रकृति की अपनी एक घड़ी है जो हमारे अलावा पेड़-पौधों और जानवरों पर भी लागू होती है। जैसे-जैसे बाहरी वातावरण में बदलाव होते हैं वैसे-वैसे हमारे शरीर के अंदर मौजूद ये जैविक घड़ी, उसके अनुसार शरीर के सभी क्रियाकलाप करती है।

सूरज उगने से लेकर सूरज अस्त होने तक, समय एक चक्र के रूप में चलता रहता है और इसी अनुसार हमारा शरीर भी सोता-जागता है और दैनिक कार्य किया करता है। इस दौरान प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों की तरह ही हमारे शरीर में भी परिवर्तन होते हैं।

सभी जीवों की दैनिक क्रियाएं इस जैविक घड़ी के अनुसार ही चला करती हैं और जब इस बॉडी क्लॉक के अनुसार नहीं चला जाता है तो शरीर और मन पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगते हैं।

इस दुनिया में जितने भी तरह के जीव और जंतु रहते हैं, उन सभी की बॉडी क्लॉक का पैटर्न एक ही है, जो करोड़ों सालों पहले भी ऐसा ही हुआ करता था। रिसर्च बताते हैं कि इस बॉडी क्लॉक का मूल स्थान हमारे मस्तिष्क में है। मस्तिष्क ही हमें जगाता है और सुलाता भी है।

हमारी दिनचर्या के सभी जरुरी कार्यों का संचालन मस्तिष्क में स्थित जैविक घड़ी करती है लेकिन किसी भी वजह से अगर इस घड़ी के कार्य में बाधा आ जाती है तो सिरदर्द और सर्दी लगने से लेकर कैंसर जैसे भयंकर रोग भी लग जाते हैं। अवसाद और अनिद्रा जैसे मानसिक रोगों के अलावा यूरिन सम्बन्धी रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और हृदयरोग जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं।

जैविक घड़ी के गड़बड़ होने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है जिससे कई तरह के रोग होने का ख़तरा बढ़ जाता है।

आइये अब आपको बताते हैं जैविक घड़ी के अनुसार किस समय कौनसा अंग सक्रिय होता है–

सुबह 3 से 5 बजे – सुबह के इस समय फेफड़े क्रियाशील रहते हैं यानी इस समय अगर थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमा जाए तो फेफड़ों को शुद्ध हवा मिलने से इनकी कार्यक्षमता बढ़ती है।

सुबह 5 से 7 बजे के बीच – इस समय बड़ी आंत सक्रिय रहती है इसलिए ये समय मल त्यागने का समय होता है। इस समय ये क्रिया नहीं करने वाले लोगों में कब्ज जैसे पेट सम्बन्धी रोग होने लगते हैं।

सुबह 7 से 11 बजे के बीच – सुबह 7 से 9 बजे तक आमाशय क्रियाशील रहता है और 9 से 11 बजे तक अग्न्याशय और प्लीहा सक्रिय रहते हैं। इस समय पाचक रस ज़्यादा बनने के कारण भोजन करने का सही समय 9 से 11 बजे होता है। इस समय एकाग्रता और विचारशक्ति भी उत्तम होती है और ये तीव्र क्रियाशीलता का समय है।

दोपहर 11 से 1 बजे के बीच – इस समय ऊर्जा का प्रवाह हृदय की ओर होने लगता है इसलिए इस समय हृदय क्रियाशील रहता है।

दोपहर 1 से 3 बजे के बीच – इस समय छोटी आंत सक्रिय रहती है। इसका कार्य भोजन से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण और व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आंत की ओर धकेलना होता है। इस समय पानी पीना बेहतर होता है। इस समय भोजन करना, सोना या चाय पीना नुकसानदायक होता है क्योंकि ऐसा करने से शरीर बीमार होने लगता है।

दोपहर 3 से 5 बजे के बीच – इस समय मूत्राशय सक्रिय रहता है और 2-4 घंटे पहले पीया गया जल मूत्र में बदल जाता है इसलिए मूत्र त्याग करने की जरुरत महसूस होती है।

शाम 5 से 7 बजे के बीच – सुबह किये गए भोजन का पाचन इस समय तक पूरा हो चुका होता है इसलिए इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए। सूर्यास्त से 40 मिनट पहले और सूर्यास्त के 10 मिनट बाद तक यानी संध्याकाल में भोजन नहीं करना चाहिए।

रात्रि 7 से 9 बजे के बीच – इस समय अग्न्याशय और गुर्दे सक्रिय रहते हैं। साथ ही मस्तिष्क भी विशेष रूप से क्रियाशील रहता है इसलिए सुबह के अलावा इस समय की गयी पढ़ाई जल्दी याद हो जाती है।

रात्रि 9 से 11 बजे के बीच – इस समय किया गया भोजन सुबह तक पचता नहीं हैं और एसिड जमा होने से कई रोग पैदा कर देता है इसलिए इस समय भोजन नहीं करना चाहिए और इस समय की नींद सबसे ज्यादा शांति देने वाली होती है। इस समय ऊर्जा का प्रवाह रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में रहता है इसलिए अगर इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर आराम किया जाए तो मेरुरज्जु को मिलने वाली शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है।

रात्रि 11 से 1 बजे के बीच – इस समय यकृत और पित्ताशय सक्रिय रहते हैं। इस समय जागते रहने से पित्त बढ़ सकता है जिससे अनिद्रा, सिरदर्द और नेत्र रोग हो सकते हैं। रात के 12 बजे, दिन में किये गए भोजन द्वारा क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के बदले नयी कोशिकाओं का निर्माण होने लगता है और इस समय जागते रहने से बुढ़ापा जल्दी आता है।

रात्रि 1 से 3 बजे के बीच का समय – इस समय लीवर क्रियाशील रहता है और खाये गए अन्न का सूक्ष्म पाचन करता है। इस समय शरीर को गहरी नींद की जरुरत होती है और ऐसा ना करने पर पाचन तंत्र बिगड़ जाता है।

हमारे द्वारा ली गयी दवाएं भी जैविक घड़ी द्वारा प्रभावित होती हैं यानी सही समय पर ली गयी दवा फायदा पहुँचाती है जबकि ग़लत समय पर ली गयी दवा नुकसानदायक साबित होती है।

तो दोस्तों, अब आप जान चुके हैं कि हमारे शरीर को सही तरीके से चलाने के लिए हमारे अंदर एक घड़ी है, जिसके अनुसार चलने पर हम निरोगी रहते हैं और इससे विपरीत चलने पर तन और मन दोनों को नुकसान पहुँचता है। ऐसे में आपको तय करना है कि आपको अपने अंदर चलने वाली इस टिक-टिक घड़ी के अनुसार चलकर स्वस्थ रहना है या इसकी अनसुनी करके बीमारियों को निमंत्रण देना है।

आपको यह लेख कैसा लगा? अगर इस लेख से आपको कोई भी मदद मिलती है तो हमें बहुत खुशी होगी। अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे। हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है, हमेशा स्वस्थ रहे और खुश रहे।

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