आखिर क्यों है भारत में खेलों की दुर्दशा

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भारत आज डांस, गायन, फ़िल्में आदि में काफी नाम कमा रहा है लेकिन अगर बात खेलों की हो तो भारत काफी पिछड़ा हुआ नजर आता है। भारत में क्रिकेट ही आज एक ऐसा खेल है जिसे काफी बढ़ावा मिल रहा है और दुनिया में नाम कमा रहा है। लेकिन भारत क्रिकेट के अलावा कई खेलों में यहाँ तक की राष्ट्रीय खेल हॉकी में भी काफी पीछे छूट गया है। जहां दुनियाभर के देश फुटबॉल में काफी उत्साह से भाग लेते हैं वहीँ भारत फुटबॉल से कहीं गुम हो गया है। इसी कारण कई लोगों को लगता है की भारत को फुटबॉल खेलने पर बैन कर दिया गया है। फुटबॉल के अलावा एथलेटिक्स, जिम्नास्टिक, तैराकी आदि में भी भारत का नाम कहीं शीर्ष पर नहीं आता।

हालाँकि भारतीय लोग फुटबॉल, ओलम्पिक आदि देखने में काफी रुचि रखते हैं लेकिन फिर भी हमारे खिलाडी इनमें कुछ ख़ास प्रदर्शन नहीं कर पाते। लेकिन विचार करने वाली बात है की आखिर भारत में खेलों की ऐसी दुर्दशा क्यों है ? आखिर कौन है इसका जिम्मेदार ? जहाँ हम क्रिकेट की उपलब्धियों को लेकर काफी गुणगान करते हैं वहीँ देखा जाये तो क्रिकेट कुछ ही देशों तक सीमित है।

भारत युवा देश है और देखा जाये तो यहाँ युवाओं के पास योग्यता की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी हमारे युवा खेलों में आगे नहीं बढ़ पाते इसकी एक वजह पेसे की कमी और सामाजिक रीतियां भी हैं। दरअसल हमारे यहाँ एक कहावत मशहूर है “खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब, पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब” और इसी सोच के चलते भारत में आज खेलो की ख़राब स्थिति है।

भारत में क्रिकेट को लेकर सभी लोगों में काफी दिलचस्पी होती है और क्रिकेट खिलाडियों कमाई भी काफी ज्यादा है इतना ही नहीं क्रिकेट के अलावा आज कल खिलाडी विज्ञापन और बॉलीवुड से भी काफी अच्छी कमाई करने लगे हैं। ये भी एक कारण है की लोगों का क्रिकेट की तरफ ज्यादा रुझान रहता है। अगर भारत में क्रिकेट के बाद किसी खेल का नाम सामने आता है तो वो है टेनिस और बैडमिंटन। इन्हें भी बड़ी बड़ी कंपनियां स्पॉन्सर करती हैं। इन खेलों में सरकार से लेकर खिलाडियों तक सभी मोटा पैसा कमाते हैं और ये भी एक सोच है की हम इन खेलों की तरफ ज्यादा रूचि रखते हैं।

हॉकी में भारत ने काफी नाम कमाया और लगातार कई मैडल भी प्राप्त किये। 1980 में मास्को ओलिम्पिक में भारत को आखिरी मेडल मिला था और उसी दौरान 1983 में भारत ने क्रिकेट में विश्वकप जीता और तभी से क्रिकेट में लोगों की रूचि बढ़ने लगी। एक तरीके से देखा जाये तो यहीं से भारतीय खेलों का पतन होना शुरू हुआ और क्रिकेट का नया आगाज हुआ।

सिंधु, साक्षी, अभिनव बिंद्रा, सुशील कुमार कई ऐसे नाम है जिन्होंने ओलम्पिक और अन्य खेलों में भारत का काफी नाम रोशन किया। लेकिन इस बात को भी नाकारा नहीं जा सकता की अन्य खेलों की याद हमे 3-4 साल में एक बार आती है जब विश्व स्तर पर ये खेल आयोजित किये जाते हैं लेकिन बाकी समय में राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें उतना बढ़ावा नहीं मिलता जिस कारण हमारी भी इन खेलों में रूचि कम हो जाती है।

भारत में खेलों की दुर्दशा का मुख्य कारण खेलों में राजनीति, दलालों और नौकरशाहों की दखलंदाजी को भी माना जाता है। इन लोगों की दखलंदाजी से खिलाडियों के चयन में भी काफी धांधलेबाजी होने लगी है। जो खिलाड़ी आर्थिक रूप से मजबूत हैं या चयनकर्ताओं या रसूकदार लोगों के रिश्तेदार हैं उन्हें आगे बढ़ने का मौका मिल जाता है जबकि लाखों प्रतिभावान खिलाड़ी जो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हैं वो पिछड़ कर रह जाते हैं। ये भी ऐसे कारण हैं जो कहीं ना कहीं खेलों के स्तर को गिरा रहे हैं।

अगर भारत में खेलों का स्तर बढ़ाना है तो खेलों से राजनीति को दूर हटाना होगा क्योंकि ऐसे में खेलों के प्रमुख पद पर ऐसे लोग है जिन्हें खेलों की समझ बिल्कुन नहीं है, वो सिर्फ पैसा कमाने की ओर ध्यान देते हैं ना की खिलाडियों को मिलने वाली पर्याप्त सुविधाओं पर।

इसके अलावा दुनिया के बाकी देशों को देखा जाये तो वो बच्चों को छोटी उम्र से भी खेलों की ट्रेनिंग देते हैं और ऐसा ही कुछ हमें भी अपनाना होगा। बच्चों को अगर शुरूआती उम्र से ही बढ़िया ट्रेनिंग दी जाये तो वो आगे चलकर काफी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

खेलों में भी टेक्नोलॉजी काफी आगे बढ़ गई है लेकिन इनका प्रयोग क्रिकेट, टेनिस जैसे बड़े बड़े खेलों में ही किया जाता है बल्कि बाकी खेलों में भी खिलाड़ियों और कोचों को पर्याप्त टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि खिलाडियों को बेहतर ट्रेनिंग मिल सके।

सरकार देश में खेलों के लिए नए टैलेंट और सुविधाओं के लिए स्पोर्ट्स बजट देती है लेकिन भ्रष्टाचार और धांधलियों के चलते स्पोर्ट्स बजट का दुरुपयोग होता है जिससे प्रतिभावान खिलाड़ी उभरकर नहीं आ पाते। तो ऐसे में स्पोर्ट्स बजट का सही उपयोग भी बेहद जरुरी है।

निष्कर्ष के रूप में देखा जाये तो सरकार, भ्रष्टाचार और हमारी बाकी खेलों को लेकर विचारधारा ही हमें खेलों में पछाड़ रही है। हमारे देश में टैलेंट की कमी नहीं है बस जरुरत है तो व्यापक कदम और उसे सही दिशा देने की। आशा करते हैं भारत में खेलों की स्थिति सुधरेगी और हमारे खिलाड़ी दुनिया भर में दूसरे देशों को कड़ी टक्कर देंगे और नाम कमाएंगे।

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