जानिए गुदगुदी क्यों होती है और इससे क्यों आती है हंसी

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जब भी हम बच्चों के साथ मस्ती करते हैं तो उन्हें हंसाने के लिए हम गुदगुदी करते हैं जिससे वो खिलखिलाकर हंसने लगते हैं। बच्चे ही नहीं बल्कि बड़ों को भी शरीर के ख़ास हिस्सों में गुदगुदी करने से हंसी निकल ही पड़ती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की आखिर ऐसा क्या है जो गुदगुदी होती है और गुदगुदी करने पर क्यों हमें हंसी आती है। तो चलिए आपको बताते हैं आखिर गुदगुदी क्यों होती है और गुदगुदी से हंसी क्यों आती है ?

दरअसल गुदगुदी हमारे शरीर के कुछ हार्मोंस और सैंसटिविटी के कारण होती है। कई बार तो बिना छुए भी गुदगुदी का अहसास होता है। दरअसल हमारी त्वचा की सबसे बाहरी परत जिसे एपिडर्मिस कहा जाता है वो कई नसों से जुडी होती है और ऐसे में जब कोई हमारी त्वचा को छूता है तो इसका सन्देश हमारे मस्तिष्क तक जाता है जो इस छुअन का एनालिसिस करता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार गुदगुदी करने से शरीर सिकुड़ता है और गुदगुदी शरीर के उन हिस्सों में ज्यादा होती है जहाँ कम से कम हड्डियां हों जैसे पेट और पैर के तलवे। वैज्ञानिकों की माने तो गुदगुदी 2 तरह से होती है, एक निसमेसिस और दूसरी गार्गालेसिस। निसमेसिस में शरीर पर जब हलके से स्पर्श किया जाये या किसी पतली चीज़ से सहलाया जाये तो उस जगह की त्वचा मस्तिष्क तक सन्देश भेजती हैं और इससे त्वचा पर हलकी-हलकी खुजली का अहसास होता है जबकि गार्गालेसिस में पेट, बगल या गले पर उंगलियों से छूने पर खिलखिलाहट वाली हंसी छूट पड़ती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार गुदगुदी होने पर दिमाग का वह हिस्सा सक्रिय होता है जिससे व्यक्ति को दर्द का अनुभव होता है और इसी कारण गुदगुदी करने पर मस्तिष्क व्यक्ति को पहले ही सतर्क कर देता है। यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति बेहद गुस्से में होता है उस समय उस व्यक्ति को गुदगुदी का एहसास कम होता है और उसे हंसी नहीं आती।

इसके विपरीत जब हम कुछ को गुदगुदी करते हैं तो हमें किसी भी प्रकार का भय नहीं रह जाता है और ऐसे में हमारा दिमाग के दूसरे हिस्सों को मिलने वाले संवेदात्मक संकेतों को कण्ट्रोल कर लेते है जिस कारण हमे खुद को गुदगुदी करने पर हंसी नहीं होती। हालाँकि गुदगुदी करने पर हंसी आना दिमागी परिस्थिति पर भी निर्भर होता है।

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