लीडरशिप के गुण

सितम्बर 11, 2018

लीडरशिप! यह एक ऐसा अहसास है जो हर इंसान में किसी ना किसी रूप में अवश्य मौजूद है। ओर भला हो भी क्यों ना…आज का दौर है ही लीडरशिप का। फिर चाहे व्यापार हो, नौकरी हो या फिर राजनीति ही क्यों ना हो। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ लीडर की जरूरत ना हो। क्योंकि एक लीडर ही अपने संस्थान को अपनी काबिलियत से उस मुकाम तक ले जाता है जिसकी आशा उससे की जाती है। अपने सपने को साकार करने के लिए किसी भी हद तक जाके काम करना या दूसरों से काम करवाना, दोनों ही स्थिति आसान नहीं होती। यह सिर्फ वही कर सकता है जिसमें लीडरशिप का गुण होता है। एक स्मार्ट लीडर वही होता है जो ”मैं” को नहीं ”हम” को साथ लेकर स्वयं की जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ते जाता है।

”एक लीडर का काम हैं कि वह अपने लोगों को जहाँ वो हैं, वहां से ऐसी जगह ले जाए जहाँ वो नहीं गए हैं।”

लीडरशिप स्किल में बहुत से गुण आते है जैसे ईमानदारी, प्रतिनिधित्व, प्रेरणा, धैर्य, आत्मविश्वास, कम्युनिकेशन, कमिटमेंट, लचीलापन, प्रतिक्रिया, रचनात्मकता, ज़िम्मेदारी। इन सभी गुणों के बारे में आपको कई बड़े-बड़े लेख मिल जाएँगे। लेकिन हम आपको अपने तर्क नहीं बल्कि एक ऐसा सच्चा प्रसंग बताने जा रहे है जिसमें इन गुणों के अलावा भी आपको कई गुण नजर आएंगे। यह प्रसंग है ए. पी. जे. अब्दुल कलाम साहब का।

यह किस्सा 1979 का है। जब कलाम साहब इसरो के डायरेक्टर थे और सतीश धवन जी वहाँ के चेयरमेन। इसरो की बड़ी टीम के साथ और लंबे समय से एक रॉकेट पर काम हो रहा था। बहुत ही कड़ी मेहनत, लगन और टीम की मदद से आखिर वो दिन भी आया जिस दिन रॉकेट को लॉंच करना था। रॉकेट में सटेलाइट को भी फिक्स कर दिया गया। सारी तैयारी हो चुकी थी बस लॉन्चिंग में 10 मिनट का समय बाकी था। इतने बड़े प्रोजेक्ट को कंप्यूटर के माध्यम से जोड़ा गया। क्योंकि किसी भी इंसान के लिए यह सब अकेले के बस की बात भी नहीं थी। कलाम साहब के ऊपर पूरी जिम्मेदारी थी इस रॉकेट के लॉन्चिंग की। क्योंकि डायरेक्टर होने के नाते वो एक लीडरशीप का ही काम कर रहे थे।

कलाम साहब को कंप्यूटर में सारे प्रोग्राम को एक बार फिर से क्रॉस-चेक करने का विचार आया। आखिर टीम की कड़ी मेहनत के साथ-साथ लाखों-करोड़ों रुपये जो लगे थे। प्रोग्राम की जांच के दौरान पहले चरण में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन दूसरे चरण में कुछ दिक्कत कंप्यूटर दिखा रहा था। कलाम साहब के पास समय था नहीं। कुछ ही मिनटों में फैसला लेना था। समय की नजाकत को देखते हुए कलाम साहब ने सीनियर वैज्ञानिकों से बात की और कहा क्या रॉकेट की लॉन्चिंग आज रोक दी जाए। वैज्ञानिकों ने कहा ऐसी समस्या के बारे में हमें पहले से पता है चिंता की कोई बात नहीं। आप रॉकेट लॉन्चिंग को ग्रीन सिग्नल दीजिए। सतीश धवन जी भी इस सारी वार्तालाप का हिस्सा थे। लेकिन फैसला कलाम साहब को ही लेना था। आखिरकार रॉकेट लॉंच हुआ।

जैसा की हमने कहा पहले चरण में कोई समस्या नहीं आई लेकिन दूसरे चरण में रॉकेट में प्रॉब्लम आ गई और वो बंगाल की खाड़ी में जा गिरा। कलाम साहब सोच में पड़ गये बाहर मीडिया अच्छी खबर के लिए इंतजार कर रही है अब वो बाहर जाके क्या कहे। अभी कलाम साहब कुछ सोच ही रहे थे की चेयरमेन धवन जी आए और कहा आप सब मेरे साथ मीडिया के समक्ष चलिए जो कुछ भी कहना होगा वो मैं कहूँगा। अपनी बात के अनुसार धवन साहब ने रॉकेट लॉन्चिंग में हुई असफलता के लिए स्वयं की जिम्मेदारी बताई और कहा अगले साल हमारी टीम एक ओर रॉकेट लॉंच करेगी वो भी पहले से ज्यादा शक्तिशाली और सफल।

क्योंकि हमारी टीम इस काम के लिए पूरी तरह से सक्षम है और मुझे मेरी टीम पर पूर्ण विश्वास है। पास में बैठे कलाम साहब धवन जी को देख रहे थे और मन ही मन सोच रहे थे की एक अच्छी लीडरशिप सब कुछ कितनी आसानी से कठिन समय को भी सहज बना देती है। कलाम साहब ने धवन जी की कही एक-एक बात का अच्छे से अनुसरण किया और जैसा की धवन जी ने मीडिया के सामने अपना विश्वास प्रस्ताव रखा था ठीक एक साल बाद सफल रॉकेट लॉन्चिंग हुई। इस सफलता के बाद धवन जी ने मीडिया के समक्ष सारा श्रेय अपनी टीम को दिया।

इसमें कोई संदेह नहीं कलाम साहब भारत को उस बुलंदियों तक ले गये की आज उन्हें मिसाइल मेन के नाम से सदियों तक संसार में याद रखा जाएगा।

दोस्तों, इस प्रसंग को पढ़कर एक बात तो स्पष्ट होती है अच्छी लीडरशिप वही होती है जो टीम को श्रेय दे और भूल होने पर स्वयं जवाबदारी ले। क्योंकि अच्छा आउटपुट तभी मिलता है जब टीम आपसे खुश हो। टीम में कुछ वर्कर नये भी होते है कुछ पुराने भी। लेकिन टीम लीडर का काम होता है सभी का संचालन समान रूप से हो। अपनी टीम के साथ डिनर कीजिए बातचीत का माहौल बनाइए। ऐसे माहौल से कई बार ऐसे आइडिया भी आ जाते है जिसकी कल्पना आपने उस व्यक्ति से तो कदापि नहीं की थी। लीडरशिप का गुण आपके अंदर होना चाहिए। आपका लीडर वाला रूप किसी को दिखना नहीं चाहिए। मान लीजिए आप अपनी टीम से कह रहे है काम जल्दी पूरा करो नहीं तो बॉस नाराज होगा। इस तरह से लोगों में डर पैदा होता है। ठीक इसके विपरीत अगर आप कहते है जल्दी काम पूरा करो बॉस खुश होगा तो टीम को अपनी काबिलियत नजर आती है की हम ऐसा कर सकते है। दोनों ही स्थिति में काम ही तो हो रहा है तो फिर डरा के क्यों।

”आपने क्या कहा, लोग भूल जायेंगे, आपने क्या किया, ये भी लोग भूल जायेंगे। लेकिन आपने लोगों को कैसा महसूस कराया, ये वो कभी नहीं भूलेंगे – माया आंजल्यू”

अगर आप एक लीडर है तो कभी अपनी टीम से ऐसा वादा मत कीजिए जिसे पूरा करना शायद आपके लिए संभव ना हो। बार-बार जब वादें झूठे साबित होते है तो आपकी सच्चाई और ईमानदारी पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। जब आप टीम की नजर में ईमानदार नहीं है तो भला टीम आपके प्रति ईमानदारी कैसे दिखाएगी। जैसा की कहा जाता है मिलता वही है जो हम देते है। इसलिए लीडरशिप के रूप में सर्वदा अपना बेस्ट दीजिए और कभी भी स्वयं की वाह-वाह करवाने की कोशिश मत कीजिए। अपनी टीम को भी बोलने का मौका दीजिए। श्रोता बनने से आपको टीम की काबिलियत और नियत दोनों का पता चलेगा।

”एक ऐसे आरामदेह व्यक्ति बने, जिससे आपके साथ होने पर कोई तनाव में न रहे मजाकिया, अनुभवी टाइप के व्यक्ति बने।”

यह कभी मत भूलिए हर लीडर के ऊपर भी एक लीडर होता है। अगर आपकी टीम सिर्फ आपके पोजीशन की रेस्पेक्ट करती है तो आप कभी भी रीप्लेस किए जा सकते है। लेकिन अगर आपकी टीम आपकी और आपके लीडरशिप स्किल की रेस्पेक्ट करती है तो सभी आपके साथ हर स्थिति में आपके लिए काम करना पसंद करेंगे। आपकी टीम आपके विश्वास की कसौटी पर खरी उतरे यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है। वो कहते है ना जिस तरह से अपनों के बिना घर…घर नहीं बनता ठीक उसी तरह टीम के बिना एक अच्छा संस्थान नहीं बनता। टीम के सहयोग के बिना आप किसी भी मुकाम का सफर तय नहीं कर सकते।

लीडरशिप पर कुछ ऐसे विचार जो आपको सही मार्गदर्शन देंगे-

तो आज से ही अपनी लीडरशिप स्किल पर ध्यान दीजिए और अमल कीजिए। हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है। हमेशा स्वस्थ रहे और खुश रहे।

विक्रम संवत् का इतिहास

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