क्या है लाई डिटेक्टर टेस्ट और कैसे किया जाता है

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हम सभी ने लाई डिटेक्टर टेस्ट का नाम मीडिया, अख़बार और फिल्मों आदि के माध्यम से सुन रखा है। अक्सर प्रचलित अपराधिक कांडों मे यह टेस्ट करवाने की बात आती है जैसे हाल ही मे राम रहीम और उससे पहले इन्द्राणी मुखर्जी, नुपुर तलवार हत्याकांड, अब्दुल करीम तेलगी स्टाम्प घोटाला सभी मे लाई डिटेक्टर टेस्ट की बात किसी न किसी स्तर पर आती है। लाई डिटेक्टर टेस्ट के सम्बन्ध मे सामान्य धारणा यह है कि ऐसी कोई मशीन जो झूठ पकड लेती है, पर वास्तव मे ऐसा बिलकुल नहीं है। लाई डिटेक्टर टेस्ट मुख्यतः दो तरह से किया जाता है।

पॉलीग्राफ टेस्ट :- यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि झूठ बोलने पर विभिन्न शारीरिक क्रियाओं जैसे रक्तचाप, श्वसन दर और त्वचा की चालकता की तीव्रता मे वृद्धि होती है जिसे सम्बंधित यंत्रों क्रमशः स्फिग्मोमैनोमीटर, न्युमोग्राफ और इलेक्ट्रोड की सहायता से जांचा जा सकता है और अपराधी का पता लगाया जा सकता है।

उपरोक्त टेस्ट की अपनी कुछ सीमाए हैं जैसे उपरोक्त शारीरिक क्रियाओं जैसे रक्तचाप, त्वचा चालकता और श्वसन दर मे सच बोलने की परिस्थिति मे भी मनोविज्ञानिक कारणों से वृद्धि संभव है और उसी तरह कोई भी पेशेवर मुजरिम अभ्यास और मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण के बल पर इस तरह के टेस्ट से आराम से बच कर निकल सकता है।

ब्रेन मैपिंग टेस्ट :- हमारे मस्तिष्क से समान परिस्थतियों की पुनरावृत्ति होने पर विशेष तरह की P300 तरंगे निकलती हैं, इसी तथ्य के आधार पर संदिग्ध के सिर मे कई सेंसर लगा कर उसके सामने अपराधिक घटनास्थल, अपराध के समय मौजूद लोगों, परिस्थितियों और अन्य कारकों को पुनः शब्दों चित्रों और विडियो आदि के माध्यम से दोहराया जाता है, अगर उसके मस्तिष्क से P300 तरंगे निकलती हैं, जो सामने ही रखे कंप्यूटर मॉनिटर पर प्रदर्शित हो जाती हैं तो इतना तय हो जाता है कि ये व्यक्ति किसी न किसी रूप मे अपराध से जुड़ा हुआ है, जबकि निर्दोष व्यक्ति के मस्तिष्क से इस तरह की तरंगे नही निकलती और उसे निर्दोष साबित किया जा सकता है।

इस टेस्ट की भी अपनी सीमाए हैं जैसे घटनास्थल पर मौजूद रहने या अपराध होते हुए देखते समय भी सारी चीज़े किसी के मस्तिष्क मे संरक्षित हो सकती है और जब उस व्यक्ति के सामने उनकी पुनरावृत्ति की जाएगी तो उसके मस्तिष्क से भी P300 तरंगे निकलने की सम्भावना रहेगी, परन्तु इससे वो दोषी साबित नही हो जाता है।

उपरोक्त दोनों तरीकों विशेषतः पॉलीग्राफ टेस्ट मे प्रश्नकर्ता या जांचकर्ता की मानसिकता बहुत मायने रखती है, कि वो किस तरह संदिग्ध के सामने प्रश्न पूछता है या अपराध की पुनरावृत्ति करता है। यदि प्रश्नकर्ता या जांचकर्ता खुद निष्पक्ष नही होगा तो निष्पक्ष नतीजे आना लगभग असम्भव है।

उपरोक्त उल्लेखित कमियों के कारण इन्हें दुनिया मे कही भी पूर्णरूपेण कानूनी वैधता नहीं मिली हुई है। भारत मे भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस पर 5 मई 2010 के निर्णय संविधान मे प्रदत्त मौलिक अधिकारों [अनुच्छेद-20(3)-(जिसके अंतर्गत किसी भी आरोपित व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाही देने या साक्ष्य देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।) और अनुच्छेद 21-(जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)] के हनन के आधार पर और इसकी खामियों को दृष्टिगत रखते हुए इस पूरी प्रणाली पर सवाल उठाये थे।

सार रूप मे कहा जा सकता है कि लाई डिटेक्टर टेस्ट भले ही अपराधिक जाँच मे सहायक हो पर इनके नतीजे पूरी तरह त्रुटिविहीन नही होते अतः सिर्फ इन नतीजों के आधार के पर किसी को दोषी या निर्दोष नहीं साबित नही किया सकता है।

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