अस्पताल की लूट से बचा सकते हैं हमें ये अधिकार

हम सभी स्वस्थ बने रहना चाहते हैं लेकिन कभी किसी दुर्घटना या बीमारी के चलते हमें या हमारे प्रियजनों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। ऐसे समय में हम सलामती के लिए बहुत-सा पैसा और समय भी लगा देते हैं लेकिन जब इलाज के नाम पर, अस्पतालों के कमर तोड़ देने वाले बिल सामने आते हैं तो हम बहुत लाचार अनुभव करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आम नागरिक यानी एक मरीज या उसके परिजन के तौर पर, हमारे पास भी ऐसे कुछ अधिकार होते हैं जिनका उपयोग करके हम अस्पतालों द्वारा दिए गए बेहिसाब बिलों का हिसाब मांग सकते हैं और अपने अधिकारों के प्रति आवाज़ भी उठा सकते हैं। ऐसे में क्यों ना, आज ऐसे अधिकारों और कानूनों की बात की जाए जो हमें अस्पताल की लूट से बचा सके। तो चलिए, आज इन्हीं अधिकारों के बारे में बात करते हैं–

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986)
इस कानून के बारे में आपने जरूर सुना होगा। हालाँकि अभी तक हमारे देश में ‘पेशेंट राइट’ नाम का कोई कानून नहीं बना है लेकिन उपभोक्ताओं के अधिकारों से जुड़े इस अधिनियम के ज़रिये भी हमारे अधिकारों की सुरक्षा की जा सकती है।

सूचना का अधिकार कानून 2005
इस अधिकार के ज़रिये डॉक्टर और अस्पताल से ये जानने का अधिकार मिल जाता है कि मरीज पर किस तरह का ट्रीटमेंट चल रहा है और अस्पताल की जांच में क्या आया है, हर टेस्ट की कीमत कितनी है और मरीज को दी जाने वाली दवाओं का कब और कितना असर हो रहा है लेकिन अगर मरीज ये सब पूछने की स्थिति में ना हो तो अस्पताल में मरीज के साथ रह रहे परिजन इस सम्बन्ध में जानकारी अस्पताल प्रशासन से मांग सकते हैं और ये जानकारी हासिल करना हम सभी का अधिकार है। इतना ही नहीं, हमारे द्वारा डॉक्टर की योग्यता और डिग्रियों के बारे में जानकारी भी मांगी जा सकती है।

क्लिनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट 2010
इस अधिनियम के तहत हर क्लिनिक, अस्पताल और नर्सिंग होम को रजिस्टर करना अनिवार्य होता है। इसके साथ ही एक गाइडलाइन के तहत हर बीमारी के टेस्ट और इलाज की प्रक्रिया भी निर्धारित है और इसके अनुसार ना चलने की स्थिति में इस एक्ट में जुर्माने का प्रावधान भी है।

अभी तक सभी राज्यों ने इस एक्ट को लागू नहीं किया है लेकिन एक जागरूक उपभोक्ता होने के नाते हमें ये पता करना चाहिए कि हमारे राज्य में ये कानून लागू है या नहीं। हम चाहे तो मरीज की इस बीमारी और इलाज की प्रक्रिया के बारे में दूसरे ऐसे राज्य से भी जानकारी ले सकते हैं जहाँ ये कानून लागू है।

प्रोफेशनल कंडक्ट एंड एथिक्स एक्ट 2002
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने डॉक्टरों के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किये है जिनमें अगर आपको इमरजेंसी में इलाज की जरुरत है तो कोई भी डॉक्टर इसके लिए इंकार नहीं कर सकता है, जब तक कि फर्स्ट एड देकर मरीज की स्थिति ख़तरे से बाहर ना कर ली जाए।

एमआरटीपी एक्ट 1969
इस कानून के तहत दवा विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। साथ ही इस एक्ट के कई प्रावधानों के तहत ये बात स्पष्ट होती है कि कोई भी अस्पताल आपको वहीँ से दवाइयां खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

इसके अलावा इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स के 2012 के संस्करण के अनुसार – हर मरीज के पास ये अधिकार है कि वो अपनी बीमारी को गोपनीय रखे। इसका अर्थ ये है कि अगर मरीज ये नहीं चाहता कि उसके परिवार के अन्य सदस्यों को उसकी बीमारी के बारे में पता चले तो डॉक्टर किसी भी स्थिति में मरीज के परिवार को उसकी बीमारी के बारे में नहीं बताएँगे।

इसी जर्नल में ये भी बताया गया है कि मरीज अपनी बीमारी के बारे में सेकेंड ओपिनियन या दूसरे डॉक्टर से सलाह भी ले सकता है। इस तरह की सलाह लेने के लिए कोई भी डॉक्टर मरीज या उसके परिवार को हतोत्साहित नहीं कर सकता और अगर सलाह के बाद दोनों डॉक्टर के सुझाव बिलकुल अलग-अलग आये तो ये मरीज और उसके परिजन पर निर्भर करेगा कि वो किस सुझाव का अनुसरण करना चाहते हैं। इस स्थिति में किसी भी डॉक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

इस जर्नल के मुताबिक ये जिम्मेदारी डॉक्टर की है कि हर ऑपरेशन/सर्जरी से पहले मरीज या उसके परिजन को संभावित ख़तरे के बारे में पूरी जानकारी दे और सहमति पत्र पर उनके हस्ताक्षर लें।

मरीज का ये अधिकार है कि उसे किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने के पहले उसे या उसके परिजन को समय रहते इसकी सूचना दी जाए और ऐसी स्थिति में मरीज की हालत ख़तरे से बाहर हो, ये निश्चित करना भी डॉक्टर का कर्तव्य है।

अगर मरीज चाहे तो इलाज की पूरी फाइल अस्पताल से मांग लें। सामान्यतः अस्पताल खुद ये फाइल नहीं देते हैं इसलिए अगर आपको बहुत जरुरी लगे तो अस्पताल से छुट्टी मिलने के समय इसे मांग लें।

दोस्तों, हमारे अधिकारों की सुरक्षा के लिए बहुत से कानून बने हैं। चाहे उपभोक्ता के तौर पर हमारे अधिकारों की सुरक्षा करनी हो या अस्पतालों की लूट से सुरक्षा करनी हो, हमारे अधिकारों के लिए बहुत से कानून मौजूद है।

जरुरत है तो बस हमारी जागरूकता की, ताकि किसी भी गंभीर परिस्थिति में हम लाचार और ठगा हुआ महसूस ना करें और अब आप पेशेंट के राइट्स के बारे में भी जान चुके हैं। इसी तरह अपनी जागरूकता को बनाये रखिये और अपने आसपास भी ऐसी ही जागरूकता ले आइये ताकि हर आम नागरिक सुरक्षित महसूस कर सके।

आपको यह लेख कैसा लगा? अगर इस लेख से आपको कोई भी मदद मिलती है तो हमें बहुत खुशी होगी। अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे। हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है, हमेशा स्वस्थ रहे और खुश रहे।

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