जीवन के अंतिम पाँच अफसोस

जुलाई 1, 2017

जीवन के अंतिम समय प्रकृति का नियम अटल है जिसे इंसान तो क्या स्वयं भगवान भी नहीं बदल सकते। जन्म हुआ है तो मृत्यु भी होगी। इस बात से सभी वाकिफ है। लेकिन फिर भी इंसान जीवन जीना जैसे भूल ही गया है। क्या आपने कभी अपने जीवन का मूल्यांकन किया है की आप जैसा जीवन जीने की कल्पना करते थे क्या आप वैसा अपने जीवन में अनुभव कर रहे है। क्या आप अपने जीवन से संतुष्ट है। क्या आपने कभी खुद की खुशी के लिए कुछ किया है। क्या आपके जीवन में अभी भी कोई काश है तो यह लेख आपकी बहुत मदद करेगा।

दोस्तों, आज का टॉपिक बहुत ही नाजुक और भावुक है। यह आर्टिकल आपको सोचने के लिए विवश करेगा की आप अपने जीवन में कहा हो, क्या कर रहे हो और क्यों कर रहे हो। आज हम आपको ब्राऊनी वेर (BRONNIE WARE) की किताब फाइव रीग्रेट्स ऑफ डाइंग (5 REGRETS OF THE DYING) में लिखे वो रीग्रेट्स या अफसोस बताएँगे। जिसका जिक्र लोग तब करते है जब वो जीवन के अंतिम समय में होते है।

Author ब्राऊनी वेर ने Palliative care यूनिट में बतौर नर्स कई वर्षो तक काम किया। पॅलीयेटिव केयर यूनिट उस जगह को कहते है जहाँ ऐसे मरीजों की देखभाल की जाती है जो अपने जीवन के अंतिम समय में होते है। जिनके बचने की कोई आस नहीं होती। Author ने अपने काम के दौरान यह पाया की मरीज अपने जीवन से जुड़ी कई बातों पर अफसोस करते है। उन्हें इन अफसोस में एक समानता नजर आई। अधिकांश मरीज इन पाँच बातों पर अफसोस करते थे। तो चलिए देखते है वो कौन से है पाँच अफसोस, जो लोग अपने जीवन के अंतिम समय में करते है।

1. काश! मैं अपना जीवन खुद चुनता – सबसे कॉमन रीग्रेट् जो जीवन के अंतिम समय में लोगों को होता है वो यह है की काश मैं अपना जीवन वैसे जीता जैसे मैं चाहता था, ना की वैसे जैसे दूसरे लोग चाहते थे। मैंने प्रोफेशन वो पसंद नहीं किया जिसके लिए मेरा दिल कहता था। माता-पिता और बड़ों की मान ली और रो धोकर आखिर मैं रिटायर हो गया। लेकिन वो नहीं कर पाया जिसके लिए मैं पैदा हुआ था। लोग इस वजह से सिर्फ अपने दिल की नहीं सुनते की लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा, माँ-बाप क्या सोचेंगे। मेरे कजिन्स पढ़ लिखकर डॉक्टर, वकील या इंजीनियर बन गये है तो मुझे भी ऐसा ही कुछ बनना पड़ेगा। अगर मेरा शौक है की मैं यू ट्यूबर, फोटोग्राफर या ब्लॉगर बनू तो मैं नहीं बन सकता क्योंकि मेरा परिवार और समाज मुझे इसकी इजाजत नहीं देता। लेकिन जब मौत करीब होती है तो इंसान सोचता है की मैं सारी उम्र वो काम करता रहा जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था। जब मैं उठता था तो मैं उस काम के लिए खुश नहीं होता था। लेकिन मैं पैसा और शोहरत कमाने के लिए मजबूरी में सारी उम्र वो काम करता रहा। एक ऐसा काम जिससे मुझे एसो-आराम तो मिला लेकिन शुकून और खुशी कभी नहीं।

यह दुनिया का सबसे बड़ा रीग्रेट् है जब इंसान मरने वाला होता है। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई! अगर आपको लगता है की आप वो काम करना पसंद नहीं करते जो आप कर रहे हो, तो दुनिया में ओर भी बहुत से रास्ते है जो शायद आपके लिए हो। जीवन रहते एक कोशिश जरूर कीजिए। कही जीवन के अंतिम समय में आपको यह अफसोस ना रह जाए की आपने कोशिश नहीं की। काश मैं कोशिश कर लेता। हमेशा अपने दिल की सुनो और वो काम करो जो आपको पसंद है। ऐसी जिंदगी जियो जो आपको पसंद है। अगर आप यही सोचते रहोगे की लोग क्या कहेंगे तो आप उम्रभर ऐसी लाइफ ही जीते रहोगे जो आपको पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ पढ़कर आप भी यही सोच रहे होंगे काश मैंने दूसरों की नहीं बल्कि अपने दिल की सुनी होती।

यह लेख पढ़ रहे सभी पेरेंट्स से मेरा अनुरोध है प्लीज़ अपने बच्चों पर दबाव ना बनाइए की वो डॉक्टर या इंजीनियर ही बने या वही पढ़ाई करे जो उनके कजिन ने की है। हर इंसान अलग होता है उनकी खूबियाँ अलग होती है। अगर आपके दबाव से आपके बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बन भी गये तो वो एक अच्छे डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाएँगे। आप ऐसे कई डॉक्टर को अपने आस-पास देख सकते हो की वो फेमिली के दबाव से डॉक्टर तो बन गये लेकिन सफल नहीं हो पाए क्योंकि उन्हें अपने काम में मजा नहीं आ रहा। दबाव से थोपे हुए सभी प्रोफेशन में बच्चों का यही हाल है। क्या आप चाहते हो की आपका बच्चा जीवन के अंतिम समय में यह अफसोस करे की काश मैंने अपने पेरेंट्स की नहीं अपने दिल की सुनी होती।

2. काश! मैंने इतनी मेहनत ना की होती – यह दूसरा सबसे बड़ा रीग्रेट् होता है जो जीवन के अंतिम समय में लोगों को होता है। काश मैंने इतनी ज्यादा मेहनत ना की होती। जब आप मरने के करीब होते है तो यह महसूस होता है की आखिर मैं इतनी मेहनत क्यों करता रहा। मैं सिर्फ कमाने में लगा रहा। परिवार को समय नहीं दे पाया। बच्चों का बचपन नहीं देख पाया। उनके साथ खेल नहीं पाया। यहाँ तक की मैंने खुद के लिए भी समय नहीं निकाला। मैं बस दूसरों के लिए काम करता रहा या तो दूसरों को खुश करने के लिए काम करता रहा या दूसरों को पीछे छोड़ने के लिए काम करता रहा।

आप उतना ही काम करो जीतने की आपको जरूरत है। इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं हैं कि आप मेहनत करना ही छोड़ दो। इसका मतलब यह है कि आप खुद के साथ अपने परिवार व बच्चों को भी समय दो। जब आपका परिवार आपका इंतजार करता है तो सोचिए उन्हें कैसा लगता होगा। क्या आप नहीं चाहते आपके जाने के बाद आपका परिवार आपको अच्छी यादों में याद करे ना की ऐसे की उन्हें तो सिर्फ अपने काम की पड़ी रहती थी। हम मानते है पैसे से आपके परिवार को आराम मिलेगा। लेकिन उन तमाम पैसों से भी वो आपकी कमी को पूरा नहीं कर पाएँगे। समय रहते जाग जाइए, कही जीवन के अंतिम समय में आपको यह अफसोस ना रह जाए की काश काम के साथ-साथ मैंने परिवार की कीमत भी समझी होती।

3. काश! मैं अपनी फीलिंग व्यक्त कर पाता – यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रीग्रेट् है। परिवार, समाज या किसी ओर वजह से हम अपनी फीलिंग्स व्यक्त नहीं कर पाते। अपनी फीलिंग्स एक्शप्रेस करने का मतलब यही नहीं है की आप किसी को प्रपोज़ करो। फीलिंग्स एक्शप्रेस करने का मतलब यह भी है की आप अपने माँ-बाप, पति-पत्नी, बच्चों को बता सको की आप उन्हें कितना प्यार करते हो। साइकोलॉजिकली प्यार को एक्शप्रेस करने से दो लोगों के बीच प्यार में इजाफ़ा होता हैं। यह हमेशा याद रखिए अगर आप किसी के बारे में अच्छा फील करते हो तो उसे व्यक्त कीजिए। अगर आपको बोलने में शर्म आ रही है तो लिख के बताइए। यह कर के देखिए आपको अच्छा लगेगा।

4. काश! मैं अपने दोस्तों के संपर्क में रहा होता – यह चौथा अफसोस जो हम जीवन के अंतिम समय में करते है। हम अपने जीवन में इतने व्यस्त हो जाते है की अपने दोस्तों को पीछे छोड़ आते है। हम उन दोस्तों को भूल जाते है जो हमारे सुख-दुःख के साथी होते है। वो दोस्त जो मुसीबत में हमारे काम आते है और हमें हौसला देते है। वो दोस्त जो आपको शायद आपके परिवार से भी ज्यादा जानते है। वो दोस्त जो आपकी मदद करते है। वो दोस्त जिनके साथ आपने काफी वक्त गुज़ारा है शायद बचपन भी। इसलिए यह हमेशा याद रखिए चाहे आपकी शादी हो गई हो, आपके बच्चे भी हो, आप चाहे जिस भी पोज़िशन में हो अपने दोस्तों को कभी मत भूलिए। उनके संपर्क में रहे. दोस्ती, हमारी जिंदगी का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस लेख को पढ़ने के बाद आपको जो भी दोस्त याद आता है तो सब कुछ भुला कर उसे फोन कीजिए या उसके घर जाइए, उससे मिलिए आपको जो खुशी मिलेगी आप सोच भी नहीं सकते। सभी रिश्तों का नाम हमें परिवार और समाज से मिलता है एक यही वो रिश्ता होता है जिसको हम चुनते है। इसलिए अपने चुने हुए इस रिश्ते को जिंदा रखिए। जीवन के अंतिम समय में यह रीग्रेट् नहीं रहेगा की काश मैं अपने दोस्तों के संपर्क में रहा होता तो आज इतना अकेला महसूस नहीं करता।

5. काश! मैं अपने मन को खुश रख पाता – यह वो पाँचवा रीग्रेट् है जो जीवन के अंतिम समय में हम करते है। यह बात याद रखिए कोई आपको बाहर से खुशी नहीं दे सकता की यह लो खुशी और आप खुश हो जाओं। खुशी कोई वस्तु नहीं जिसे खरीदी जा सके यह तो कमानी पड़ती है। खुशी तो आपके अंदर से आती है. मान लीजिए आप एक पर्वतारोही हो और आपको लगता है की पीक पर पहुँचकर आपको खुशी मिलेगी। तो आपको एक हेलिकॉप्टर से उठाकर पीक पर छोड़ दिया जाता है तो क्या आपको खुशी मिलेगी? यह कैसी खुशी मजा ही क्या आया पर्वतारोही होने का।

मशहूर राइटर टाल बेन शेहर (Tal Ben-Shahar) कहते है पीक पर खुशी नहीं हैं और खुशी बिना किसी लक्ष्य के पहाड़ के आस-पास भटकने में भी नहीं हैं। खुशी तो है उस अनुभव में जो आपको पहाड़ चढ़ते दौरान होती है। यानी खुशी तो है उस काम में जो आपको आपके सपनें की तरफ आगे बढ़ाता हैं। अगर आपका कोई ड्रीम नहीं है तो ड्रीम देखो। इस रीग्रेट् का हल पहले बताए गये चार रीग्रेट्स में मिलता है, रीग्रेट् नंबर एक – वह काम करो जो आपका दिल चाहता है या आपको अच्छा लगता है, आपको खुशी मिलेगी। रीग्रेट् नंबर दो – अपने प्रियजनों को समय दो, आपको खुशी मिलेगी। रीग्रेट् नंबर तीन – अपनी फीलिंग्स एक्शप्रेस करो, आपको खुशी मिलेगी। रीग्रेट् नंबर चार – अपने दोस्तों से मिलो, आपको खुशी मिलेगी। इसके अलावा – किसी की मदद कर दो, खुशी मिलेगी। किसी के हँसने की वजह बनो, आपको खुशी मिलेगी। जिंदगी का हर पल एंजॉय करो, खुशी मिलेगी।

हम उम्मीद करते है इस लेख को पढ़कर आप जरा खुद के बारे में सोचेंगे!! जीवन सीमित है इसे जिंदादिली से जिए, मर-मर के नहीं। क्या पता कल क्या होना है इसलिए आज को खुशनुमा बनाइए। आपका कल अपने आप निखर जाएगा। जरा सोचिए हम पैदा खुद के लिए होते है या दूसरों के लिए। अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ को निभाना कोई गलत नहीं, इसे पूरी निष्ठा से पूरा कीजिए। लेकिन साथ ही साथ खुद के लिए भी जीना सीखिए। कही जीवन के अंतिम समय में आपका साथी सिर्फ अफसोस या काश ही ना रह जाए। अपने जीने का तरीका बदलिए और जीवन से रीग्रेट्स को कम कीजिए। यकीन मानिए मरने का भी दुख नहीं होगा।

स्टीव जॉब्स की यह कुछ पंक्तियाँ आपका जरूर मार्गदर्शन करेगी –

”यदि आज का दिन आपकी जिंदगी का आखरी दिन होता, तो क्या आप, आज जो करने वाले हैं, वही करते?”

”आपका समय सीमित है, इसलिए इसे किसी और की जिंदगी जी कर व्यर्थ मत कीजिये। बेकार की सोच में मत फंसिए, अपनी जिंदगी को दूसरों के हिसाब से मत चलाइए। दूसरों के विचारों के शोर में अपनी अंदर की आवाज़ को, अपने इन्ट्यूशन को मरने मत दीजिए। वे पहले से ही जानते हैं की आप सच में क्या बनना चाहते हो. बाकि सब गौड़ है।”

जीवन – यह एक विकल्प है. यह आपका जीवन है। बुद्धिमानी से चुनिए, सोच समझकर और ईमानदारी से चुने। अपनी खुशियों का भी चयन करे। आपको हमारा आर्टिकल कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें। स्वस्थ रहे, खुश रहे।

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