मिलिए दुनिया के सबसे बड़े दानवीर से

हर महीने हम सबका खर्चा हमारी दैनिक आय से चलता है लेकिन हम में से बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो अपनी आय में से कुछ भी दान में देते होंगे। देते भी होंगे तो वह राशि बहुत कम होगी लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि आपको अपनी पूरी तनख्वाह दान में देनी है तो क्या आप ऐसा सोच भी सकते हैं? नहीं ना। आज हम आपको एक ऐसे इंसान से मिलवाने जा रहे हैं जिन्होंने पिछले 30 साल से अपनी पूरी आमदनी दान में दी है। जी हां पूरी आमदनी Tirunelveli के रहने वाले पालम कल्याणसुंदरम पिछले 30 वर्षों से हर महीने मिलने वाली अपनी पूरी तनख्वाह दान में दे देते हैं। तो चलिए सबसे बड़े दानवीर के बारे में जानते हैं कि ऐसा क्या है जो यह अपनी पूरी तनख्वाह दान में देते हैं।

अब तक मिल चुके सम्मान-

  • आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सुपरस्टार रजनीकांत भी इन्हें अपने पिता के रूप में अडॉप्ट कर चुके हैं।
  • पालम को यूनाइटेड नेशंस में बीसवीं शताब्दी का सबसे आउटस्टैंडिंग इंसान माना है।
  • इन्हें अमेरिका की एक संस्था से मैन ऑफ मिलेनियम का अवार्ड भी मिल चुका है।
  • पालम ही वह इंसान है जिससे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन अपनी भारत यात्रा के दौरान मिलना चाहते थे।
  • भारत सरकार के द्वारा उन्हें बेस्ट लाइब्रेरियन ऑफ इंडिया का अवार्ड मिल चुका है।
  • पालम को इंटरनेशनल बायोग्राफीकल सेंटर कैंब्रिज ने लिस्ट ऑफ द वर्ल्ड का पुरस्कार भी दिया है।

पालम का प्रारंभिक जीवन-

तमिलनाडु के तिरूनेवेली जिले के मेलाकरुवेलान्गुलम गाँव में सं 1953 में पालम कल्याणसुन्दरम का जन्म हुआ। जब पालम मात्र 1 साल के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था उनकी माता ने अकेले ही उन्हें पाल पोस कर बडा किया और उनको एक संस्कारी इंसान बनाया।

कल्याणसुंदरम जी बताते हैं कि उनकी माता ने उन्हें खुश रहने के तीन मूल मंत्र बताए थे। जिनमें से पहला था कि कभी लालच मत करो। दूसरा मंत्र था कि अपनी कमाई का दसवां हिस्सा किसी नेक इंसान के काम में खर्च करो और तीसरा मूलमंत्र था रोज कम से कम कोई एक दयालुता का काम जरूर करो।

कल्याणसुंदरम जी ने अपनी माता की दी गई इन सीखों को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। वह जिस गांव में रहते थे वहां ना तो लाइट थी और ना ही पक्की सड़कें और ना ही कोई स्कूल फिर भी 10 साल का होने तक वह केरोसिन लैंप और मोमबत्ती की रोशनी में ही पढ़ाई किया करते थे।

चलिए जानते हैं कल्याणसुंदरम जी की शिक्षा के बारे में-

अपनी स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद कल्याणसुंदरम जी ने तमिल विषय में बीए की डिग्री हासिल की। लेकिन आपको बता दें कि इस सब्जेक्ट को लेने वाले वह अकेले व्यक्ति थे। उस समय सेंट जेवियर कॉलेज के मैनेजमेंट ने उन्हें किसी और सब्जेक्ट को लेकर पढ़ने के लिए कहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। लेकिन जब कॉलेज के फाउंडर को इस बात का पता चला तो उन्होंने उनको उनके पसंदीदा कोर्स में एडमिशन दे दिया और यहां तक कि उनकी पढ़ाई का खर्च भी उठाया। अपनी बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद कल्याणसुंदरम जी ने m.a. की डिग्री हासिल की। उन्होंने अपने m.a. की डिग्री इतिहास के विषय में हासिल की आप सबको सुनकर आश्चर्य होगा कि कल्याणसुंदरम जी विश्व के 10 सबसे अच्छे लाइब्रेरियन के रूप में जाने जाते हैं।

अगर आपको कभी मौका मिले तो Youtube पर उनका वीडियो देखिएगा। उनकी आवाज सुनकर आपको यह प्रतीत नहीं होगा कि यह किसी और इंसान की आवाज है क्योंकि उनकी आवाज बहुत ही पतली थी। एक समय ऐसा भी था कि वह इस वजह से बहुत ज्यादा परेशान थे।

वो अपने आप को खत्म कर लेना चाहते थे लेकिन तभी उन्हें उनकी मुलाकात एक मोटिवेशनल स्पीकर से हुई और इस मुलाकात के दौरान उन्होंने यह कहा कि अब जीवन जीने की कोई इच्छा नहीं है। इस बात को सुनकर उस मोटिवेशनल स्पीकर ने कहा की “इस बात की चिंता मत करो कि तुम कैसे बोलते हो तुम इस बात की चिंता करो की दूसरे तुम्हारे बारे में कैसे अच्छा बोलें” और इन्हीं शब्दों ने उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया।

जब भी कल्याणसुंदरम जी किसी गरीब अनाथ व बेसहारा बच्चे को देखते थे उनका कलेजा भर आता था। इसीलिए वह अपने पढ़ाई के दिनों में भी इन बच्चों की मदद किया करते थे और उन्होंने इंटरनेशनल चिल्ड्रेंस वेलफेयर आर्गेनाईजेशन नाम से एक संस्था की स्थापना भी की थी।

आपको बता दें कि जब 1962 में कल्याणसुंदरम जी मद्रास यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की शिक्षा ले रहे थे उसी दौरान उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू का देशवासियों के प्रति एक संदेश सुना जिसमें वह देश वासियों को देश के प्रति अपना योगदान देने की अपील कर रहे थे।

यह बात सुनते ही वह सीधे चीफ मिनिस्टर जी के पास गए और अपनी गोल्ड चेन देदी ऐसा करने वाले वह शायद पहले स्टूडेंट थे। इस काम को करने के बाद उनकी न्यूज़पेपर में काफी तारीफ हुई इस काम से उस समय के मुख्यमंत्री इतने प्रभावित हुए कि उन्हें 1963 में मजदूर दिवस के दिन सम्मानित किया गया।

वह चाहते थे कि यह बात उस समय की एक मशहूर मैगजीन में छपे लेकिन उस मैगजीन के संपादक ने इस बात को एक पॉलिटिकल स्टंट समझकर नकार दिया और उन्होंने कल्याणसुंदरम जी को आने वाले 5 सालों तक किसी रुप से सक्रिय रहने को कहा और यह वादा किया कि अगर ऐसा करते हैं तो वह निश्चित ही उनके बारे में अपनी मैगजीन में छापेंगे।

इसके बाद भी उनके दान करने का सिलसिला बना रहा उन्होंने पालम संस्था की शुरुआत की जिसमें बच्चों के कल्याण के लिए कार्य किए जाते हैं। अब कल्याणसुंदरम जी 73 साल के हो चुके हैं वह साइदापेट, चेन्नई में अपने एक छोटे से मकान में रहते हैं।

उन्होंने कभी शादी नहीं की क्योंकि वह पूर्ण रूप से समाज सेवा करना चाहते थे वह आज भी अपने ऑफिस जाते हैं और Underprivileged लोगों की उन्नति के लिए काम करते हैं।

उनके अंदर दानवीरता इस कदर भरी हुई है कि उन्होंने अपने शरीर के सारे अंग दान करने की शपथ ली हुई है। सचमुच इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि यह एक महान आत्मा है और हम सभी को उनके जीवन से कुछ प्रेरणा लेनी चाहिए।

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