जीवन संजीवनी आयुर्वेद, आयुर्वेद के नियम

स्वास्थ्य ही जीवन है – जीवन संजीवनी आयुर्वेद

स्वास्थ्य वो खजाना है जिसे पाने के लिए हर कोई आतुर रहता है। हम और आप सभी जानते हैं की स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का पदार्पण होता है। अर्थात हम कह सकते हैं की अच्छा स्वास्थ्य और खुशहालजीवन ही सबका एकमात्र लक्ष्य और उद्देश्य होना चहिये। गौतम बुध के अनुसार “हमारा कर्त्तव्य है की हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मन को शुद्ध और सक्षम नहीं रख पाएंगे”। वर्तमान दौर में बहुत सी चकित्सा प्रणालियां प्रचलित हैं, हमारे लिए कौन सी उत्तम है और कोन सी नहीं है असमंजस का विषय है।

विडम्बना है की सभी प्रणालियों का एक मूल अर्थात एक शर्त है – आप पहले बीमार पडो फिर हम इलाज़ करेंगे। लेकिन हम बताने जा रहे हैं एक ऐसी अनोखी चिकित्सा पद्दति जिसका मूल मन्त्र है – अपनाओ और कभी बीमार ही न पडो, वो है जीवन संजीवनी “आयुर्वेद”। आयुर्वेद हमारे ऋषि महर्षियों, आयुर्वेदाचार्यों और सेवा भावी महात्माओं द्वारा जन साधारण के आरोग्य हेतु दी गई अमूल्य भेंट व् धरोहर है।

आयुर्वेद बहुत ही प्राचीन और प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली है। जिसका जन्म 5000 वर्ष पूर्व हुआ माना जाता है। आयुर्वेद शब्द संस्कृत के दो शब्दों आयु तथा वेद से आशय ज्ञान है अर्थात जीवन जीने का ज्ञान जिससे हम दीर्घायु, निरोगी व् खुशहाल जीवन जीने की कामना रखें।

सर्वप्रथम आयुर्वेद का उल्लेख वेद व्यास जी ने अपने चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, अर्थवैध, सामवेद) में से अर्थवैध में भली भांति किया गया है। चिकित्सक धन्वन्तरि ने भी आयुर्वेद को एक नई दिशा प्रदान की है और इसे परिपूर्ण कर हमारी संस्कृति को गौरवान्वित किया। आयुर्वेद हमारी एक ऐसी धरोहर है जिस पर स्वस्थ, सुदृढ़ और संस्कारवान भविष्य की आधारशिला टिकी है।

आयुर्वेद के कुछ ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य या सूत्र जिनका उपयोग हम दैनिक दिनचर्या में सफलता व् सहजता से कर स्वस्थ व् निरोगी रह सकते हैं।

1. हमे सदा सूर्योदय से पूर्व शैया त्याग देनी चाहिए, इस समय प्रकर्ति से अमृत अर्थात प्राणवायु की वर्षा होती है, जिससे हमारे शरीर को स्फूर्ति तथा ताजगी मिलती है।

2. उठते ही हमे सबसे पहले मूत्र त्याग देना चाहिए उसके पश्चात हमे 2 या 3 गिलास गुनगुना पानी पीना चाहिए जिससे, उच्च रक्तचाप, मोटापा, कब्ज, नेत्ररोग, अपच, सरदर्द आदि रोगो में फायदा होता है।

3. अपने समर्थ के अनुसार हमे रोजाना प्राणायाम, योग, ध्यान करना चाहिए।

4. दिन में 2 या 3 बार मुह में शुद्ध जल भरें और साथ में आँखों को शीतल जल से धोएं इससे नेत्रज्योति बनी रहती है।

5. हमे नित्यप्रति सरसो, तिल, नारियल या अन्य औषधीय तेल की मालिश अवश्य करनी चाहिए इससे थकावट दूर होती है त्वचा में कान्ति तथा स्वच्छता आती है और हड्डीओं को मजबूती प्राप्त होती है।

6. भोजन के आधे घंटे पहले व् आधे घंटे बाद तक जल नहीं पीना चाहिए।

7. पूरे दिन में कम से कम 3 या 4 लीटर जल पीना चाहिए जिससे शरीर में पानी की कमी नहीं रहती व् चेहरे की चमक बनी रहती है।

8. भोजन करने के पश्चात 5 या 10 मिनट वज्रासन लगाना चाहिए या बांयी तरफ करवट लेकर 5 से 10 मिनट तक लेटना चाहिए।

9. भोजन करने के बाद कोई भी ऐसा कार्य जिसमे शारीरिक श्रम लगे वो नहीं करना चाहिए, स्वास्थय की दृष्टि से ये बहुत हानिकारक है।

10. भोजन करने के तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए इससे पाचन शक्ति का नाश होता है।

11. ऐसे पदार्थ जिनका सेवन आयुर्वेद में वर्जित बताया गया है – दूध के साथ दही, नमक, मूली, नींबू, उड़द, करेला, जामुन आदि चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

12. सोने से पहले हाथ-पैर को शीतल जल से धोना चाहिए जिससे नींद आराम से आती है।

आज आयुर्वेद सर्वोत्तम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है, जिस में हर मर्ज की दवा है, इसका श्रेय जाता है वर्तमान आयुर्वेद के चरक व् सुश्रित को। महाऋषि चरक ने ही सबसे पहले पाचन, अपचन तथा शरीर की प्रतिरक्षा की प्रेरणा दुनिया के सामने रखी। उनके अनुसार हमारे शरीर में 3 प्रकार के दोष पाये जाते हैं जिन्हें आयुर्वेद में त्रिदोष का नाम दिया गया है वे हैं – कफ, वायु, पित्त। उनका कहना था की ये तीनो शरीर में संतुलित मात्रा में रहे तब तक व्यक्ति स्वस्थ रहता है और इनका संतुलन बिगड़ते ही व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है।

महर्षि चरक ने आयुर्वेद का एक ग्रन्थ लिखा है जिसे चरक संहिता के नाम से जाना जाता है। इसके पश्चात समय समय पर आयुर्वेदाचार्यों ने जरुरत के हिसाब से नई-नई बीमारियों के इलाज खोजे तथा आयुर्वेद को सर्व श्रेष्ठ प्रणाली का दर्जा दिया है। उन्होंने सर्वप्रथम एक वृद्ध व्यक्ति की कटी हुई नाक का प्रत्यारोपण कर प्लास्टिक सर्जरी का अविष्कार किया।

“आयुर्वेद हमारे ऋषि मुनियों की एक अतुल्य खोज तथा भविष्य को दिया गया अमूल्य उपहार है”। वर्तमान में यह एक सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा प्रणाली है, इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। अंततः यह ही कहना उचित होगा की हो सके तो आयुर्वेद के नियमों अर्थात सूत्रों का पालन करना चाहिए जिससे आपका जीवन सदैव स्वस्थ रहे ।

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