जानिए मल्टीप्लेक्स में खाने पीने की चीजें इतनी महंगी क्यों होती हैं ?

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फिल्में देखना तो सभी को पसंद होता है और थिएटर में जाकर फिल्म देखने का तो मजा ही कुछ और है, दमदार साउंड बड़ा पर्दा और बेहतरीन प्रिंट। यूँ तो जब भी कोई फिल्म रिलीज होती है तो दर्शक थिएटर की तरफ भागते हैं लेकिन थिएटर में फिल्म देखना आज के समय में काफी महंगा हो गया है। दरअसल मल्टीप्लेक्स थिएटर में फिल्म देखना तो सभी को अच्छा लगता है लेकिन वहां मिलने वाली खाने पीने की चीज़ों की कीमत सभी को अखरती है। थिएटर में दर्शकों को बाहर से कुछ भी खाने पीने की चीज़ें ले जाने की अनुमति नहीं होती जो भी लेना हो तो दर्शकों को थिएटर के अंदर से ही खरीदना पड़ता है और थिएटर के अंदर ये चीज़ें काफी महंगी होती है।

थिएटर में फिल्म देखने का मजा और दुगना हो जाता है जब साथ में कुछ खाने पीने का सामान हो लेकिन वहां मिलने वाले इन सामानों की महंगी कीमतों के चलते हमे या तो जेब ढीली करनी पड़ती है या अपना मन मारना पड़ता है। यूँ तो थिएटर पहले के समय से ही मनोरंजन का सबसे बढ़िया साधन रहे हैं लेकिन उस समय सिंगल स्क्रीन थिएटर हुआ करते थे और खाने पीने की चीज़ों की कीमतें भी ज्यादा नहीं थी लेकिन समय के साथ साथ सिंगल स्क्रीन थिएटर की जगह अब मल्टीप्लेक्स ने ले ली है और मल्टीप्लेक्स की चकाचोंध के साथ वहां मिलने वाली चीज़ें भी महंगी हो गई।

लेकिन क्या आपको इसकी असली वजह का पता है की आखिर ऐसी क्या वजह है जो थिएटर अंदर मिलने वाली खाने पीने की वस्तुओं की दर्शकों से मनचाही कीमत वसूल रहे हैं ? तो चलिए जानते हैं इसके पीछे की असली वजह के बारे में।

दरअसल अगर विदेशों की बात करें तो वहां थिएटर में टिकट की बिक्री से जो कमाई होती है उसमे से करीब 90% प्रोडक्शन कंपनी को चला जाता है और थिएटर के पास बहुत कम कमाई बचती है। इस कारण थिएटर्स वहां मिलने वाली खाने पीने की चीज़ों की कीमत बढ़ा देते हैं ताकि दर्शकों के जरिये अपनी कमाई की भरपाई कर सकें। लेकिन भारत की बात करें तो यहाँ के थिएटर्स के साथ ऐसा नहीं होता तो फिर भी ऐसी क्या वजह है तो बाहर मिलने वाली इन खाने पीने की कीमतों में और थिएटर में मिलने वाली इन चीज़ों की कीमतों में इतना अंतर आ जाता है ?

दरअसल भारत में मल्टीप्लेक्स वहां लगने वाली खाने-पीने की स्टाल्स का कॉन्ट्रैक्ट किसी तीसरी पार्टी को देते हैं और वो कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा पाने के चक्कर में इन चीज़ों की कीमत कई गुना बढ़ा देती है और हम मजबूरन उस कीमत में उन चीज़ों को खरीदने को विवश हो जाते हैं। लेकिन दूसरे शब्दों में कहा जाये तो हम ऐसे मल्टीप्लेक्स और ऐसी कंपनियों को खुद बढ़ावा दे रहे हैं।

मल्टीप्लेक्स की व्यापारिक सोच होती है की अगर कोई रूपए की टिकट लेकर फिल्म देखने आता है तो जाहिर सी बात है वो कम से कम रूपए की कोल्ड ड्रिंक और पॉपकॉर्न जरूर लेगा और ऐसे में अगर फिल्म हाउसफुल है तो मल्टीप्लेक्स और वहां स्टाल्स लगाने वाली कंपनियों की चांदी ही चांदी है। लेकिन दूसरे नजरिये से देखें तो हमारी भी यही सोच होती है की जब हम फिल्म देखने आये हैं तो उसका पूरा आनंद लिया जाये और हमारी सोच भी ऐसी ही बन जाती है की कौनसा हम रोज रोज आते हैं तो हम महंगी कीमतों वाली चीज़ें भी खरीद लेते हैं। लेकिन अगर हम मल्टीप्लेक्स में मिलने वाली इन महंगी चीज़ों को खरीदना बंद कर दें तो ये स्टाल्स अपनी कीमतें कम करने को मजबूर हो जाएँगी।

धीरे धीरे देश में सभी जगह सिंगल स्क्रीन थिएटर बंद हो रहे हैं और उनकी जगह मल्टीप्लेक्स थिएटर्स ले रहे हैं जहाँ हमे खाने पीने के लिए भारी रकम चुकानी पड़ती है। लेकिन अगर हम थोड़ा सा सजग बन जाएँ तो इन मल्टीप्लेक्स को अपनी महंगी चीज़ों की कीमतें मजबूरन कम करनी होगी क्योंकि हर कोई इतना सक्षम नहीं होता की इतनी भारी भरकम रकम देकर अपना मनोरंजन पूरा करे।

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