आचार्य रजनीश ‘ओशो’ कौन थे?

मार्च 31, 2018

आचार्य रजनीश के बारे में भले ही आप नहीं जानते हों लेकिन ओशो नाम से तो आप जरूर परिचित होंगे और हो सकता है कि देश-दुनिया में फैले उनके लाखों प्रशंसकों में से आप भी एक हों। असल में आचार्य रजनीश ‘ओशो’ का ही नाम है जो ‘भगवान श्री रजनीश’ और ‘ओशो’ कहलाये। लाखों समर्थकों के बीच ओशो के हजारों विरोधी भी रहे और उनके विरोध का मुख्य कारण रहा मानव कामुकता के प्रति उनका ज़्यादा खुला नजरिया। समाजवाद और हिन्दू धार्मिक रूढ़िवादी के प्रखर आलोचक रहे ओशो, रजनीश आंदोलन के प्रणेता रहे और अपने जीवनकाल में एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में पहचाने गए।

ओशो शब्द लैटिन भाषा के ‘ओशनिक’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है- सागर में विलीन हो जाना।

ओशो का वास्तविक नाम चंद्र मोहन जैन था और उनका जन्म भारत के मध्यप्रदेश राज्य के रायसेन शहर के कुच्वाडा गाँव में हुआ था। अपने माता-पिता की ग्यारह संतानों में से सबसे बड़े रहे चंद्र मोहन का बचपन अपने ननिहाल में गुजरा जहाँ उनकी नानी ने उन्हें स्वतंत्र और उन्मुक्त वातावरण दिया और उन्हें रूढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा।

बचपन से सरल और गंभीर स्वभाव रखने वाले रजनीश आगे चलकर एक अमीर संन्यासी बने जिन्होंने अमीरों के बीच रहना पसंद किया और महंगी जीवनशैली को अपनाया। कहा जाता है कि उनके पास कम से कम 90 रॉल्स रॉयस गाड़ियां थी। साथ ही उन पर पूंजीवाद को बढ़ाने का आरोप भी लगा।

ऐसा भी माना जाता है कि ओशो ने धर्म को एक व्यापार बना दिया। अपने जीवनकाल में उन्होंने बहुत सी किताबें लिखी जिनमें से ‘संभोग से लेकर समाधि तक’ नामक किताब ने उन्हें विवादों के चरम पर पहुंचा दिया।

एक बेहतरीन तर्कशास्त्री रहे ओशो ने परम्पराओं को नहीं अपनाया और युवावस्था तक आते-आते वो विरोधी विचारधारा वाले एक नास्तिक के रूप में उभरे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का हिस्सा रहे ओशो, जबलपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक और सागर यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद, साल 1957 में रायपुर यूनिवर्सिटी में संस्कृत के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए लेकिन उनके विरोधी विचारों के चलते उनका ट्रांसफर कर दिया गया।

इसके बाद अगले साल जबलपुर यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए रजनीश, गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण देने के लिए देश के हर कोने में गए और इस तरह आचार्य रजनीश के रूप में उनकी पहचान स्थापित हो गयी।

सार्वजनिक भाषणों की शुरुआत करने के बाद लगभग 15 साल तक ओशो ने सार्वजनिक भाषण दिए और उसके बाद साल 1981 में उन्होंने सार्वजनिक मौन धारण कर लिया। उस दौरान उनके प्रवचन रिकॉर्डेड सत्संग और किताबों के जरिये ही प्रसारित किये गए और साल 1984 में उन्होंने सीमित रहते हुए फिर से सार्वजनकि सभाएं करना प्रारम्भ कर दिया।

आचार्य रजनीश ने अमेरिका के ओरेगन शहर में ‘रजनीशपुरम’ की स्थापना की जिसमें उनके अनुयायियों की संख्या इतनी ज़्यादा बढ़ गयी कि ओरेगन सरकार के लिए खतरा बन गयी और अमेरिका की सरकार और ओशो के मध्य संबंधों में खटास आने के बाद अमेरिका सरकार ने उन पर करीब 35 आरोप लगाए और उसके बाद ओशो को अमेरिका छोड़ना पड़ा।

अपने विवादित जीवन के बाद 19 जनवरी 1990 को आये हार्ट अटैक ने आचार्य रजनीश की साँसें रोक ली, ओशो का यूँ अचानक दुनिया से चले जाना उनके अनुयायियों के लिए किसी सदमे से कम नहीं रहा लेकिन उनके जीवन को एक सामान्य जीवन नहीं माना गया बल्कि उनके लिए ये कहा गया कि “Never Born-Never Died-Only Visited This Planet Earth Between- 11 December 1931 – 19 January 1990” यानि आचार्य रजनीश का “ना जन्म हुआ और ना मृत्यु हुयी, बल्कि उन्होंने 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 तक पृथ्वी का भ्रमण किया।”

भले ही आचार्य रजनीश एक विवादित संन्यासी और गुरु रहे लेकिन उनके जीवन के सिद्धांत हमें सीख भी देते हैं। उनका कहना था कि – ज़िन्दगी में आप जो करना चाहते हैं वो जरूर करिये, बिना ये सोचे कि लोग क्या कहेंगे क्योंकि लोग तब भी कहेंगे जब आप कुछ नहीं करेंगे।

दोस्तों, आचार्य रजनीश के अनुसार प्रेम ही प्रार्थना का दूसरा नाम था और जीवन को वर्तमान के क्षण में जीने का उनका नजरिया हमें भी भूत और भविष्य की उलझनों से बाहर निकालने में मददगार हो सकता है इसलिए आप भी जीवन को वर्तमान में जीना शुरू कर दीजिये और उम्मीद है कि आचार्य रजनीश यानि आध्यात्मिक गुरु ओशो के जीवन को करीब से जानकर आपको अच्छा लगा होगा।

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