भौतिक वस्तुएं महानता का आधार नहीं (कहानी)

फरवरी 5, 2016

राजा भोज दिनभर की व्यस्तता के बाद गहरी नींद में सोए हुए थे. स्वप्न में उन्हें एक दिव्य पुरुष के दर्शन हुए. राजा ने बड़ी नम्रता से उनका परिचय पूछा. दिव्य पुरुष ने कहा – ”मैं सत्य हूँ, मैं तुम्हें तथाकथित उपलब्धियों का वास्तविक स्वरूप दिखाने आया हूँ. राजन! चलो मेरे साथ.” राजा भी बड़ी उत्सुकता और खुशी से उनके साथ चल दिए.

राजा भोज खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा मानते थे. उन्होनें अपने राज्य में कई मंदिर, धर्मशालायें, कुएं, नदी आदि का निर्माण करवाया था. इसलिए उनके मन में इन कामों को लेकर गर्व भी था.

वो दिव्य पुरुष राजा भोज को उन्हीं के बनवाये एक शानदार बगीचे में लेकर गये और बोले, ”तुम्हें इस बगीचे का बड़ा अभिमान है ना.” फिर उन्होनें एक पेड़ को छुआ तो वो पेड़ मुरझा गया. एक-एक करके सभी सुंदर फलों व फूलों से लदे पेड़ों को छूते गये और वे सब मुरझा गये. इसके बाद वह उन्हें भोज के एक स्वर्णज़ड़ित मंदिर के पास ले गये. यह मंदिर राजा भोज को अतिप्रिय था. दिव्य पुरुष ने जैसे ही उस मंदिर को छुआ, वह लोहे की तरह काला हो गया और खंडहर की तरह बिखरता चला गया. यह सब देख राजा के तो होश ही उड़ गये. वे दोनों उन सभी स्थानों पर गये, जिन्हें राजा भोज ने बड़ी लगन और मेहनत के साथ बनवाया था.

दिव्य पुरुष ने कहा – ‘राजन, भ्रम में मत रहो. भौतिक वस्तुओं के निर्माण के आधार पर कभी किसी की महानता नही आंकी जाती. एक गरीब व्यक्ति के द्वारा पिलाए गये एक लोटे जल की कीमत, उसका पुण्य, किसी यशलोलुप धनी की करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से कई गुना अधिक है. इतना कहकर दिव्य पुरुष अंतर्ध्यान हो गये.

राजा भोज ने स्वप्न पर गंभीरता से विचार किया और नगर में ऐसे कार्य करवाये, जिन्हें करते हुए उन्हें यश प्राप्ति की लालसा बिल्कुल नही रही.

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