प्राणायाम क्या है और प्राणायाम के फायदे

हम और आप सभी मानते है की दुनिया की सारी दौलत एक तरफ और अपना स्वास्थ्य एक तरफ। कहा भी गया है! – “पहला सुख निरोगी काया” अर्थात दुनिया का सबसे बड़ा सुख और खुशी यही है की हम स्वस्थ रहे। आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोग इतने व्यस्त है की उन्हे अपने स्वास्थ्य और शरीर की देखरेख का समय ही नही है। ऐसे में बीमारिया इतनी बढ़ गयी है कि हर कोई अस्वस्थ है। मधुमेह, ह्रदय रोग, मोटापा, पक्षाघात, घुटनो का दर्द, हड्डियो की कमज़ोरी, मानसिक तनाव, अस्थमा, सरदर्द, ऐसिडीटी आदि आम बात हो गयी है। हर कोई इनसे पीड़ित है। अगर समय रहते जागरूकता नही आई तो यह और ज़्यादा घातक हो जाएगी। इनसे बचने के लिए सभी को योग ओर प्राणायाम करना बहुत ज़रूरी है।

अगर हमारे पास इन सब के लिए समय कम है तो कम से कम 15-20 मिनिट तो हम अपने आप को दे सकते है। अगर हम रोज 15-20 मिनिट भी प्राणायाम करे तो हम स्वस्थ रह सकते है और पूरे दिन अपना कार्य सहजता और स्फूर्ति के साथ कर सकते है।

प्राणायाम शब्द प्राण+आयाम से मिलकर बना है। प्राण का आश्चय जीवन से है और आयाम से आश्चय आदान प्रदान करना है अर्थात जीवन के लिए सांसो का आदान-प्रदान आवश्यक है। श्वास का मुख्य आधार नासिका है। नासिका के माध्यम से ही श्वाश-प्रश्वास की क्रिया संपन्न होती है, जो जीवन तथा प्राणायाम का आधार है।

“जो वायु श्वास लेने के दौरान शरीर के अंदर फेफड़ो में पहुँचती है उसे श्वास तथा जो श्वास छोड़ने पर भीतर से बाहर आती है वो प्रश्वाश कहलाता है।”

प्राणायाम योग का चोथा अंग है। प्राणायाम की चार अवस्थाए होती है-

1. पूरक – जिसमे नासिका द्वारा श्वास को अंदर की तरफ लेते है उसे पूरक कहा जाता है।
2. कुम्भक – जिसके अंतर्गत श्वास लेकर भीतर रोकना होता है. श्वास को भीतर रोकने की क्रिया कुम्भक कहलाती है।
3. रेचक – श्वास को बाहर की तरफ छोड़ना रेचक अर्थात नासिका द्वारा श्वास को बाहर की तरफ छोड़ने की क्रिया रेचक कहलाता है।
4. शून्यक – अर्थात श्वास को बाहर निकालकर फिर वापस न लेकर बाहर ही रोक देने की क्रिया शून्यक है।

प्राणायाम शुरू करने से पूर्व- ओम का उच्चारण करते हुए यह प्रार्थना करनी चाहिए-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर्:
गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम: ॥

अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ||

इसी प्रार्थना के साथ हमे प्राणायाम शुरू करना चाहिए।

जब श्वास शरीर में आता है तब केवल वायु या आक्सीजन ही शरीर में प्रवेश नही करता वरन एक दिव्य शक्ति का भी प्रवेश होता है, जो शरीर में जीवन शक्ति को बनाए रखती है अर्थात ईश्वर से ठीक से जुड़ना और जुड़े रहने का प्रयास करना ही प्राणायाम है।

प्राणायाम व आसनो के प्रयोग के लिए आवश्यक निर्देश-

(1) प्राणायाम के लिए शांत व प्रदूषण रहित वातावरण होना चाहिए।
(2) प्राणायाम करने के लिए गरम चदर या टाट कुछ बिछाना चाहिए, बिना कुछ बिछाए भूमि पर बैठकर प्रणायाम नही करना चाहिए। इससे शरीर में होने वाला विधुत प्रवाह नष्ट हो जाता है।
(3) प्राणायाम के लिए शोच, स्नान आदि से निवृत होकर ही बैठना चाहिए। प्राणायाम करने के पश्चात ठंड में या तेज हवा में नही जाना चाहिए।
(4) प्राणायाम करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए की श्वास मुँह से ना लेकर नाक से ही लेना चाहिए।
(5) भोजन के चार घंटे पश्‍चात और पीने के दो घंटे बाद या बिल्कुल भूखे पेट ही प्राणायाम करे।
(6) प्राणायाम करते समय वस्त्र ढीले और आरामदायक होने चाहिए।
(7) प्राणायाम करने के बाद मूत्र त्याग अवश्य करे जिससे दूषित तत्व बाहर निकल जाते है।
(8) प्राणायाम करने के पश्‍चात जल पीना काफ़ी लाभ-दायक है।
(9) प्राणायाम करते समय शरीर के किसी भी अंग में कोई तनाव नही होना चाहिए।
(10) प्राणायाम उचित आसन लगाकर ही करना चाहिए। इसके लिए आप वज्रासन, पद्मासन या सिद्ध आसन जो भी आपको आरामदायक लगे वो लगा सकते हो। प्राणायाम करते समय मेरुदण्ड को सीधा करके बैठे।
(11) प्राणायाम करते समय मौसम व अपनी प्रकृति का भी ध्यान अवश्य रखना चाहिए। प्राणायाम के पश्‍चात थोड़ा विश्राम भी करना चाहिए।
(12) आसन करते समय अगर बीच में थकान लगे तो शवासन या मकरासन जो भी उचित लगे उसमे विश्राम करना चाहिए।
(13) प्रणायाम करने के लिए पेट साफ होना आवश्यक है। अत: उसके लिए आप रात को सोते समय त्रिफला चूर्ण का इस्तेमाल कर सकते हो।
(14) प्राणायाम के दौरान यदि पसीना आ जाए तो उसे पोंछ लेना चाहिए। इससे त्वचा स्वस्थ रहती है तथा चुस्ती आ जाती है। प्राणायाम के 15-20 मिनिट पश्‍चात शरीर का तापमान सामान्य होने के पश्‍चात स्नान करना चाहिए।
(15) प्राणायाम का अभ्यास किसी पुस्तक को पढ़कर या कोई विडियो देखकर नही करना चाहिए। किसी अनुभवी व्यक्ति की देख-रेख में उससे अच्छे से सीखकर अपनी आयु व सामर्थ्य के हिसाब से प्राणायाम करना चाहिए।

ध्यान व प्राणायाम करते समय बैठने के आसन-

प्राणायाम करते समय अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखनी चाहिए। इसके लिए किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठा जा सकता है। जैसे की सिद्धासन, पद्मासन, सुखासन, वज्रासन आदि। अगर आप ध्यान के किसी भी आसन में बैठने में समर्थ नही हो तो कुर्सी पर बैठकर भी प्राणायाम कर सकते हो परंतु रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए। प्राणायाम करने से प्राण शक्ति जागृत होती है और मेरुदण्ड से जुड़े हुए चक्रों का जागरण होता है। ध्यान के शुरूवात में आप सुखासन में भी बैठ सकते हो लेकिन धीरे-धीरे सभी आसनो में बैठने का अभ्यास करना चाहिए।

प्राणायाम करने से हमारा शरीर निरोगी व स्वस्थ और नियन्त्रण में रहता है तथा इससे हम अपने प्रत्येक कार्य को आसानी से सहज ही कर लेते है।

“तन को जान, मन को जान |
नाम को जान, श्वासो को जान |
सोए मानव तू जाग-तू जाग |
शरीर की नस-नाडी, की हर हरकत में जाग |
आनंद में जाग ,तू जाग-तू जाग |”

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मुद्रा प्राणायाम

चिनमुद्रा – अंगूठे व तर्जनी के अग्र भागों को आपस में मिलाकर बाकी सभी अँगुलियो को सीधा रखना है। इसे ज्ञान मुद्रा भी कहते है।

फ़ायदा :-
(1) इसके अभ्यास से पेट दर्द, कब्जी व आँतो के रोग में फ़ायदा होता है।
(2) पेरो व घुटनो के दर्द में भी आराम मिलता है।
(3) प्रजंन्न अंगो के दोष दूर होते है और पाचन शक्ति बढ़ती है।

आदि मुद्रा – अंगूठे को अंदर की तरफ रखकर अँगुलियो को हल्का दबाव डालकर मोड़ना है।

(1) इससे सरदर्द, कानो से कम सुनना, माइग्रेन आदि रोग दूर होते है।
(2) गले के थाईराइड में भी फ़ायदेमंद है।
(3) स्मरण शक्ति व एकाग्रता बढ़ती है, अनिद्रा तनाव व क्रोध दूर होता है।

चिन्मय मुद्रा – अंगूठे व तर्जनी के अग्र भाग को मिलाकर गोला बनाना है। शेष तीनो अँगुलियो को हथेली में दो बार मोड़ना है।

(1) ह्रदय रोग में फ़ायदा होता है।
(2) मधुमेह, ऐसिडीटी व लीवर के रोगो में भी फ़ायदा होता है।
(3) उच्च रक्तचाप में फ़ायदेमंद है तथा इससे शरीर में स्फूर्ति व उर्जा का संचार होता है।

मेरुदण्ड मुद्रा – चारो अँगुलियो को दो बार हथेली में मोड़कर मुठ्ठी बनाना और अंगूठे को सीधे रखना होता है। अँगुलिया आपस में मिली हुई होनी चाहिए।

(1) इससे कमरदर्द, गर्दन दर्द ठीक होता है।
(2) रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है।
(3) निरंतर अभ्यास से सायटिका, स्पौंडिलिसिस ओर स्लीपडिस्क के दर्द में भी आराम मिलता है।

पूर्ण मुद्रा – दोनो हाथो को अंगूठे को अंदर रखकर चारो अँगुलियो को हल्का दबाव डालकर मोड़ना है। उसके पश्‍चात दोनो हाथो के नकल्स एक दूसरे में फिक्स करना है तथा दोनो हाथो को जंघा पर रखकर कंधे को उपर की तरफ तानना है।

फ़ायदा –
(1) इससे प्राणो की सुप्त शक्ति का जागरण होता है।
(2) इससे जीवन शक्ति का विकास होता है. शरीर में स्फूर्ति, कांति व तेज आता है।
(3) उच्च रक्तचाप, पक्षाघात तथा दमा में भी फ़ायदा होता है।

भस्त्रिका प्राणायाम – इस प्राणायाम में आप किसी भी आसन में बैठ सकते हो। हाथो को ज्ञान मुद्रा में रखे। आँखो को बंद करके शरीर को ढीला छोड़ दो ओर दोनो नासिकाओं से श्वास को पूरा अंदर छाती में भरकर पूरी ताक़त के साथ बाहर छोड़ना ही भस्त्रिका प्राणायाम कहलाता है। इसमे फेफड़ो का प्रयोग लोहार की धोकनी के समान होता है। इसे उच्च रक्तचाप, ह्रदय रोगी तथा रक्त संचार संबंधी रोग वाले व्यक्तियो को विशेष सावधानी से धीरे-धीरे करना चाहिए।

फ़ायदा –
(1) सर्दी, जुकाम, एलर्जी, श्वासरोग, दमा, साइनस, पुराना नजला तथा समस्त कफ के रोग दूर होते है।
(2) फेफड़े मजबूत होते है तथा ह्रदय व मस्तिष्क को भी शुद्व प्राणवायु मिलती है।
(3) थाईराइड, टांसिल व गले के समस्त रोग दूर होते है।
(4) रक्त का शुद्धिकरण होता है।
(5) प्राण व मन स्थिर होता है तथा निरंतर अभ्यास से मन अंतर्मुखी बनता है।

भ्रामरी प्राणायाम – भ्रामरी अथार्त वास्तविक शब्दो में इसका अर्थ भंवरे से है। इसके दौरान आप ध्यान के किसी भी आसन में ज्ञान मुद्रा या चिनमुद्रा लगाकर बैठ सकते हो। दोनो नासिकाओ से पूरक करे। धीरे धीरे रेचक करते हुए भंवरे की तरह लगातार गुंजन करे।

फ़ायदे –
इससे मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध आदि दूर होते है। उच्च रक्तचाप में भी फ़ायदेमंद है।

कपालभाती, नाड़ी शोधन, उज्जयी तथा केवली बहुत से ऐसे प्राणायाम भी है जो बिना किसी जानकार की मदद लिए बिना नही करने चाहिए। इससे आपको नुकसान भी हो सकता है।

प्राणायाम करने के पश्चात ओम का उच्चारण करते हुए यह मंत्र बोलना चाहिए।
“असतो मा सद्ग्मय ,
तमसो मा ज्‍योतीर्गमय ,
मृत्यु मा अमृतम गमय,
ओम शांति शांति शांति”

प्राणायाम जीवन का आधार है। आज हर कोई सुखी और निरोगी जीवन जीना चाहता है। सभी को अपनी जिंदगी से प्यार होता है और जीने के लिए ज़रूरी है की श्वासों का आदान प्रदान बिना किसी रुकावट के चलता रहे। ये तभी संभव है जब आप अपने कीमती समय में से कुछ समय निकालकर योग व प्राणायाम को दे।

आज केवल भारत में ही नही अपितु विदेशो में भी योग व प्राणायाम को अपनाया जाने लगा है। ऐसे में हमे भी जागरूक होकर अपने अमूल्य खजाने और धरोहर को जागृत करने में योगदान देना चाहिए।

तभी हमारा यह मूल मंत्र सार्थक होगा-

“सर्वे भवंतु सुखिन
सर्वे संतु निरामया
सर्वे भद्राणि पश्यंतु
मा कश्चिद दु:खभाग्भवेत”

अभी भी कुछ नही बिगड़ा है, जागो, बढ़ो अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर जिसमे स्वास्थ्य का खजाना भरा पड़ा है।

“कच्चा केला खाने से होते हैं ये फायदे”
“ध्यान से मिलते हैं ये अद्भुत फायदे”

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