धीरूभाई अंबानी के प्रेरणात्मक कथन

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गुजरात के एक छोटे से गांव चोरवाड के एक स्कूल में शिक्षक के पद पर काम करने वाले हीराचंद गोवरधनदास अंबानी के तीसरे बेटे धीरूभाई अंबानी का जन्म 28 दिसंबर 1933 को हुआ था. आर्थिक तंगी के कारण धीरूभाई को हाईस्कूल के बाद ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी. धीरूभाई ने बचपन में ही घर की आर्थिक मदद करनी शुरू कर दी थी। इस समय वे गिरनार के पास भजिए की दुकान लगाया करते थे।

सन् 1955 में जेब में 500 रुपए रखकर किस्मत आजमाने धीरूभाई मुंबई आ गये और यहीं से शुरू हुई उनकी सफलता की यात्रा। यहां से धीरूभाई अंबानी ने ऐसे कदम बढ़ाए कि फिर कभी भी पलटकर नहीं देखा। उनका नाम केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हुआ।

धीरूभाई का मानना था कि जितना बड़ा सोचोगे उतना ज्यादा पाओगे। जब धीरूभाई एक जगह पर नौकरी करते थे तो उनके साथ काम करने वाले एक मजदूर ने उनसे पूछा कि जब हमारी और तुम्हारी तनख्वाह बराबर है तो तुम उस होटल में जाकर एक रूपए की चाय क्यों पीते हो, जबकि हम सब इस ढाबे में पच्चीस पैसे की चाय पीते हैं। धीरूभाई ने जवाब देते हुए कहा कि मुझे तुम्हारे साथ चाय पीने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन जिस होटल में एक रूपए की चाय पीता हूं वहां मुझे यह पता चलता है कि हजारों लाखों के सौदे कैसे होते हैं। इसलिए में वहां चाय पीता हूं।

 

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