रहीम के दोहे अर्थ सहित

सितम्बर 19, 2018

रहीम के दोहे अपने समय में सभी के पढ़े हुए है। लेकिन आज भी उनकी उपस्थिति दोहों के रूप में उतनी ही महत्वपूर्ण और उपयोगी है जितनी उनकी अपने समय में थी। रहीम जी के दोहे अनंत काल तक ऐसे ही सदा सबके जीवन में रोशनी भरते रहेंगे और मार्गदर्शन करेंगे।

जीवन परिचय-

पूरा नाम – अब्दुल रहीम खाने खाना
जन्म – दिसंबर 1556, लाहौर
मृत्यु – सन् 1627
पिता – मरहूम बैरम खाने खान
माता – सुल्ताना बेगम
प्रसिद्धि – कवि, विद्वान
रचनाएं – रहीम दोहावली, रहीम सतसई, मदनाश्टक, रहीम रत्नावली

रहीम जी के वालिद अकबर के संरक्षक थे। कहा जाता है रहीम जी के जन्म पर इनका नामकरण स्वयं अकबर ने किया था। यह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। एक ही समय में यह प्रशासक, आश्रयदाता, सेनापति, कूटनीतिज्ञ, दानवीर, कलाप्रेमी, कवि, विद्वान और बहुभाषी गुणों के प्रख्यात ज्ञानी थे। यह सभी जातिवर्ण के प्रति समान भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। रहीम जी भारतीय संस्कृति के सच्चे आराधक और मानवता के सूत्रधार थे। इतना ही नहीं रहीम जी तलवार और कलम के अच्छे धनी थे।

तो चलिए समय को ना गवाते हुए रहीम जी के कुछ चुनिन्दा दोहों को पढ़िए और समझिए। क्योंकि इनके दोहे चाय में चीनी की तरह है। जिस तरह थोड़ी सी चीनी पूरी चाय में मिठास का रस घोल देती हैं ठीक उसी तरह रहीम जी के दोहों में शब्दों की संख्या कम है लेकिन इनका महत्व, मर्म और जीवन का सार अनंत हैं।

1 दोहा – जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं।
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है अगर किसी बड़े को छोटा कह भी दिया जाए तो उससे उसका बड़प्पन कम नहीं होता। जैसे गिरधर को कान्हा कह भी दिया तो क्या गिरधर को बुरा लगेगा? नहीं, क्योंकि गिरधर की महिमा उनके नाम से कम नहीं होती।

2 दोहा – रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है संसार में प्रेम का धागा यानी रिश्ता बहुत ही नाज़ुक होता हैं। इसे जरा से झगड़े या मनमुटाव के कारण तोड़ना उचित नहीं। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूटता है तो फिर इसे जोड़ना बहुत ही मुश्किल हैं और जैसे-तैसे अगर इस धागे को जोड़ भी दिया जाए तो इसमें अविश्वास की गाँठ पड़ जाती हैं।

3 दोहा – बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है व्यक्ति को अपने व्यवहार में वाणी का लेन-देन सोच समझकर करना चाहिए। क्योंकि किसी वजह से अगर बात बिगड़ जाती है तो उसे फिर से संभालना नामुमकिन होता है। जिस तरह दूध के फटने पर चाहे लाख कोशिश कर लो उसे मथकार मक्खन नहीं निकाला जा सकता।

4 दोहा – क्षमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है बड़ों में हमेशा क्षमा का भाव होना चाहिए और छोटों में शरारत। कहने का तात्पर्य यह है छोटों की शरारत भी हमेशा छोटी ही होती है। इसलिए बड़े अपना बड़प्पन दिखाते हुए क्षमा करना सीखे। क्योंकि बड़ों के व्यवहार में क्षमा शोभा देती हैं। जैसे एक छोटा सा कीड़ा अगर लात मार भी दें तो उससे भला क्या क्षति होने वाली हैं।

5 दोहा – रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है किसी बड़ी वस्तु के मिल जाने से छोटी वस्तु को बाहर मत फेकिय। क्योंकि इससे छोटी वस्तु की कीमत कम नहीं होती। जहाँ सुई काम आ सकती है वहाँ बड़ी तलवार किसी काम की नहीं।

6 दोहा – तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है पेड़ स्वयं अपना फल नहीं खाता और ना ही नदी स्वयं अपना जल पीती हैं। ठीक इसी प्रकार सज्जन और अच्छे मनुष्य भी दूसरों के हित और कार्य के लिए धन का संचय करते हैं।

7 दोहा – रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है जिस प्रकार कीमती मोतियों की माला के टूटने पर सभी मोतियों को इकट्ठा करके धागे में पिरो दिए जाते हैं। ठीक उसी प्रकार प्रियजन के सौ बार नाराज होने पर भी उन्हें मना लेना चाहिए।

8 दोहा – दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है कौआ और कोयल समान रंग के होते हैं। लेकिन जब तक उनकी आवाज सुनाई ना दे तब तक उनकी पहचान मुश्किल हैं। लेकिन जैसे ही बसंत का मौसम आता है दोनों के बीच का अंतर कोयल की मीठी और सुरीली बोली से दूर हो जाता हैं। तात्पर्य यह है समय आने पर इंसान की परख उसकी बोली से हो जाती है तब तक सब समान लगता हैं।

9 दोहा – खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है दुनिया आपकी खैरियत, अपराध, बीमारी, दुख-सुख, दुश्मनी, प्यार, बुरी आदत जैसी सभी बातों को भलीभाँति जानती हैं। इसलिए आप इस भ्रम में ना रहिए की आप किसी से कुछ छिपा सकते हैं।

10 दोहा – समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है समय का फेरा कभी एक जैसा नहीं रहता। जिस तरह समयनुसार पेड़ पर फल आते और झड़ते हैं। ठीक वैसे ही बुरी स्थिति में पछताने का कोई लाभ नहीं। क्योंकि यह स्थिति भी वक्त के साथ बदल जायेगी।

11 दोहा – रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँती विपरीत।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है बुरे और गिरे हुए मनुष्य के साथ ना तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी। क्योंकि कुत्ते का काटना और चाटना दोनों ही घातक हैं।

12 दोहा – जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह।
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है इस शरीर को सब कुछ सहने की आदत होनी चाहिए। जिस तरह यह धरती सर्दी, गर्मी और बारिश अपने ऊपर सब कुछ सहन करती हैं। ठीक उसी प्रकार इस शरीर को भी सुख-दुख, अच्छा-बुरा सब कुछ धरती की तरह सहन करना आना चाहिए।

13 दोहा – एकहि साधै सब सधैए, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबोए, फूलहि फलहि अघाय।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है एक पर ध्यान देने से सभी का ध्यान संभव है। लेकिन सभी पर साथ ध्यान देने से सबके खोने की संभावना अधिक रहती हैं। ठीक वैसे ही जैसे पेड़ की जड़ को सींचने से फूल-फल, तना सभी भाग को पानी प्राप्त हो जाता है उन्हें अलग-अलग पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती। कहने का अर्थ यह है व्यक्ति को भी अपने एक कार्य में ही पूरी साधना करनी चाहिए। क्योंकि कई कार्य एक साथ करने के चक्कर में सारे काम बिगड़ने की आशंका बनी रहती हैं।

14 दोहा – वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटन वारे को लगे, ज्यो मेहंदी को रंग।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है ऐसे लोगों का जीवन धन्य है जिनका संपूर्ण जीवन सदा दूसरों के परोपकार में गुजरा हैं। जिस तरह मेंहदी बेचने वाले के हाथ में रंग और खुशबू दोनों रह जाती हैं। ठीक इसी प्रकार परोपकारी व्यक्ति की अच्छाई सभी जगह महकती हैं।

15 दोहा – जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है जब छोटी सोच के लोग अचानक से अपने जीवन में तरक्की कर लेते है तो फूले नहीं समाते। जैसे शतरंज के खेल में किस्मत से जब प्यादा आगे बढ़कर रानी बन जाता है तो इतराते हुए टेढ़ी चाल चलने लग जाता है और यह भूल जाता है की मेरी पहचान एक प्यादे से हैं। जीवन में तरक्की आपकी बाधा नहीं बल्कि सोच आपकी रुकावट हैं।

16 दोहा – आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है इज्जत, आदर और आँखों का प्रेम तभी खत्म हो जाता है जब कोई किसी से कुछ माँग लेता हैं। इसलिए इतना इंतजाम जरूर करो जिससे बुरा समय निकल जाए और किसी के आगे हाथ ना फैलाना पड़े।

17 दोहा – रहिमन विपदा हु भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है समस्या कुछ दिनों की आए तो ही अच्छा हैं। क्योंकि ऐसे समय में ही दुनिया का पता चलता है की कौन अपना है और कौन पराया।

18 दोहा – देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरै, याते नीचे नैन।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है देने वाला तो वो ईश्वर है जो दिन रात हमें देता रहता हैं। लेकिन लोगों की मूर्खता की तो कोई हद नहीं, जो यह सोचते है की सब कुछ हम ही कर रहे हैं। आगे रहीम जी कहते है लोगों की इस मूर्खता और भ्रम को देखकर मेरी आँखें शर्म से झुक जाती हैं।

19 दोहा – रहिमन पानी राखिए, बिनू पानी सब सुन।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।

अर्थ – रहीम जी ने इस दोहे में पानी शब्द का तीन बार उपयोग किया है जिसमें तीनों बार पानी का अर्थ अलग-अलग हैं। संसार और संसार की हर चीज के लिए पानी ही सब कुछ है क्योंकि पानी के बिना संसार कुछ नहीं। मोती का पानी यानी चमक बनाए रखना चाहिए नहीं तो उसकी कीमत कम हो जाती हैं। व्यक्ति को अपना पानी यानी मान-प्रतिष्ठा बनाए रखनी चाहिए। क्योंकि संसार में मान बिना इंसान की कोई पहचान नहीं और पानी यानी पीने के जल को व्यर्थ ना करे, क्योंकि अगर संसार से पानी गया तो हर जीव का जीवन भी समाप्त हो जायेगा।

20 दोहा – रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ।
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ।

अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते है मन की व्यथा आँसू द्वारा आँखों से झलक जाती हैं। लेकिन एक सत्य यह भी है जिसे घर से निकाल दिया जाता है वो घर की बातें यानी भेद दूसरों से कहकर ही अपने मन को हल्का करेगा। इसलिए अपना मन हल्का अपनों के साथ करे। इसके लिए दूसरों के कंधे का सहारा ना लें।

कबीर जी के पश्चात रहीम जी के दोहों को ही सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली हैं। रहीम के दोहे बहुत ही प्रेरक और अर्थपूर्ण हैं जो मनुष्य जाती को अच्छे जीवन का संदेश देते हैं। इसलिए हम रहीम जी के अधिकाधिक दोहों को संकलित करने हेतु प्रयासरत हैं।

विक्रम संवत् का इतिहास

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