नमन उन्हें जो तिरंगे के लिए कुर्बान हो गए

कभी आपने सोच है की आप अपने देश में इतना सुरक्षित क्योँ महसूस करते है?? क्योँकि सरहद पर हमारी सेना के जवान पूरी मुस्तेदी से अपना कर्तव्य निभा रहे है। हम में से शायद ही कोई होगा जो हमारे सैनिकों की क़ुरबानी को भूला होगा। तो चलिए आज विजय दिवस के मौके पर पर हम उन शहीदों को याद करते है जिन्होंने कारगिल में अपने प्राणों की आहूती दे दी।

1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल में एक भीषण उड़ हुआ जिसमे कई भारतीय जवानों की जाने गयी मगर भारत पाकिस्तान को धूल चटाने में कामियाब रहा। पाकिस्तान की मंशा भारतीय भूमी पर ही नहीं सुख शांति पर कब्ज़ा करने की भी थी।

यह युद्ध सिर्फ सरहद पर ही नहीं हर भारतीय के ज़ेहन में भी लड़ा गया किसी बच्चे ने अपना पिता और किसी ने अपना पती खो दिया किसी बूढ़े माँ बाप का सहारा छीन गया और कोई जवान खुद बेसहारा हो गया।

लेकिन यह हमारे जवानों का जज़्बा ही था की उन्होंने कभी भी अपने तिरंगे पर आंच भी नहीं आने दी। 26 जुलाई 1999 को भारत युद्ध में विजय हो गया और इस दिन को विजय दिवस के रूप में घोषित किया गया।

चलिए आपको कारगिल युद्ध के जाबाजों से मिलाते है।

कैप्टन विक्रम बत्रा – शेर शाह के नाम से मशहूर कैप्टन विक्रम शहीद हो गए लेकिन उनका विजय घोष “यह दिल मांगे मोर प्रसिद्ध हो गया”।

लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय – वो लेफ्टिनेंट मनोज ही थे जिनकी वजह से दुश्मनो के 6 बंकर और 11 जवान मारे गए

राइफलमैन संजय कुमार – अपनी जान की परवाह किये बिना खून से लथपथ होने के बावजूद भी वो तब तक लड़ते रहे जब तक प्वाइंट फ्लैट टॉप पर भारत का कब्ज़ा नहीं हो गया।

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव – योगेंद्र सिंह सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले भारतीय सैनिक है।

ऐसे ही कितने वीर जवान थे जिन्होंने अपने प्राणों की आहूति दे दी लेकिन अपनी मातृभूमि का फ़र्ज़ बखूबी निभाया। फौजी बनना कोई आसान काम नहीं है इसके लिए जो जज़्बा और जूनून चाहिए होता है वो हर किसी में नहीं हो सकता।

अंत में बस यही कहना चाहेंगे। जय हिन्द जय भारत।

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