संथारा क्या है?

जैन संप्रदाय की एक साधना है संथारा, जिसके बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। कुछ साल पहले इस साधना पर बहुत विवाद हुआ लेकिन जैन धर्म की इस साधना को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। ऐसे में आपको भी ये जरूर जानना चाहिए कि संथारा क्या होता है। तो चलिए, आज आपको बताते हैं इस साधना के बारे में।

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ये तो आप भी जानते हैं कि जैन धर्म में दो पंथ होते हैं श्वेताम्बर और दिगंबर। श्वेताम्बरों में इस साधना को संथारा कहा जाता है जबकि दिगंबरों में इसे सल्लेखना कहा जाता है।

सल्लेखना दो शब्दों से मिलकर बना है – सत्+लेखना, जिसका अर्थ है सम्यक प्रकार से काया और कषायों को कमजोर करना।

जैन धर्म में संथारा को जीवन की अंतिम साधना माना जाता है जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छा से देह त्याग करता है। जब व्यक्ति को लगता है कि वो मृत्यु के करीब है तब वो स्वयं खाना-पीना छोड़ देता है।

संथारा से जुड़ी एक बड़ी भ्रान्ति हमेशा से रही है कि संथारा लेने वाले व्यक्ति का खाना-पीना जबरदस्ती बंद करा दिया जाता है और वो एकदम से खाना-पीना छोड़ देता है जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

संथारा लेने वाले व्यक्ति पर इस प्रकार का कोई दबाव नहीं डाला जाता है और वो व्यक्ति धीरे-धीरे अपने खाने की मात्रा को कम करता है।

जैन ग्रंथों के अनुसार, संथारा में उस व्यक्ति को नियम से भोजन दिया जाता है और अन्न बंद करने का मतलब उस स्थिति से है जब अन्न का पाचन करना संभव ना हो पाए।

संथारा लेने से पहले गुरु की आज्ञा और परिवार की अनुमति मिलनी जरुरी होती है।

संथारा को शुरू करने के लिए सबसे पहले सूर्य उदय होने के बाद 48 मिनट का उपवास रखा जाता है जिसमें व्यक्ति कुछ पीता भी नहीं है।

संथारा में उपवास दोनों तरीकों से किया जा सकता है, पानी के साथ भी और बिना पानी के भी।

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