सेंसर बोर्ड क्या है और किस तरह करता है काम?

सेंसर बोर्ड के बारे में थोड़ी जानकारी आपके पास जरूर होगी क्योंकि बीते कुछ समय में ऐसी कई फिल्में आयी हैं जिन्हें लेकर सेंसर बोर्ड चर्चा में बना रहा। लेकिन सेंसर बोर्ड किस तरह काम करता है और फिल्मों को अप्रूव करने की इसकी प्रक्रिया क्या होती है, ये आप जरूर जानना चाहेंगे इसलिए आज आपको बताते हैं सेंसर बोर्ड के बारे में –

‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन’ एक वैधानिक संस्था है जो ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय’ के अंतर्गत आती है। हमारे देश में बनने वाली फिल्मों को सर्टिफिकेट देने का कार्य ये संस्था ही करती है। हर फिल्म को रिलीज़ होने से पहले सेंसर बोर्ड की प्रक्रिया से गुजरना जरुरी होता है।

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है और इस बोर्ड के सदस्य किसी भी सरकारी पद पर नहीं होते हैं। इसका हेडक्वार्टर मुंबई में है और इसके 9 क्षेत्रीय कार्यालय मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलूर, तिरुवनंतपुरम, हैदराबाद, नयी दिल्ली, कटक और गुवाहाटी में मौजूद है।

सेंसर बोर्ड किसी भी फिल्म के सर्टिफिकेशन में अधिकतम 68 दिनों का समय ले सकता है। फिल्मों को उनके कंटेंट के अनुसार 4 कैटेगरीज के अंतर्गत सर्टिफिकेट दिया जाता है –

पहली कैटेगरी – (U) यानी यूनिवर्सल, इस कैटेगरी की फिल्में सभी वर्ग के दर्शकों के लिए होती है।
दूसरी कैटेगरी – (U/A) इस कैटेगरी की फिल्मों को 12 साल से कम उम्र के बच्चे अपने माता-पिता या किसी बड़े की देखरेख में ही देख सकते हैं।
तीसरी कैटेगरी – (A) ये फिल्में सिर्फ एडल्ट्स के लिए होती हैं।
चौथी कैटेगरी – (S) ये कैटेगरी किसी खास वर्ग के लोगों के लिए होती है जैसे किसान, इंजीनियर्स या डॉक्टर आदि ।

सेंसर बोर्ड में फिल्म को पास या फेल करने के लिए 3 पैनल होते हैं-

पहला पैनल जांच समिति का होता है जिसमें महिलाओं का होना जरुरी होता है। ज़्यादातर फिल्में इसी पैनल द्वारा पास कर दी जाती हैं। इस पैनल में सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष शामिल नहीं होते हैं। फिल्म में आवश्यक बदलावों की रिपोर्ट जांच समिति द्वारा अध्यक्ष को भेजी जाती है।

इसके बाद दूसरा पैनल अपना काम करता है। इस पैनल को रिवाइजिंग कमिटी कहते हैं। अगर जाँच समिति किसी फिल्म को सर्टिफिकेट देने से इंकार कर देती है, तभी उस फिल्म को इस पैनल के पास भेजा जाता है। इस पैनल में अध्यक्ष भी शामिल होता है।

इस पैनल के दिए सुझावों को अगर फिल्म निर्माता मानने से इंकार कर देता है तो ऐसे में ये पैनल फिल्म को पास करने से इंकार करने का अधिकार रखता है।

फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) तीसरा और आखिरी पैनल होता है जिसमें फिल्म जगत के अनुभवी सदस्य होते हैं, साथ ही सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज भी इसका हिस्सा होते हैं। अगर इस पैनल के ज़रिये भी फिल्म को सर्टिफिकेट नहीं मिले तो ऐसी स्थिति में फिल्मकार हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है।
वर्तमान में सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष स्क्रीनराइटर और कवि प्रसून जोशी हैं।

दोस्तों, सेंसर बोर्ड इसी तरह अपना काम बखूबी करता रहे और हमें ऐसी फिल्में देखने को मिलती रहे जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज में बेहतर बदलाव भी ला सके। उम्मीद है कि सेंसर बोर्ड से जुड़ी ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और अब आप समझ गए होंगे कि फिल्मों को हम तक पहुँचने के लिए कितना लम्बा सफर तय करना पड़ता है।

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