केरल की सामाजिक कार्यकर्ता दया बाई के बारे में कुछ खास जानकारियां

हम सभी समाज में रहते हैं और समाज की अच्छाइयों को अपनाने के अलावा समाज में फैली बुराइयों को भी अनजाने में स्वीकार लेते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एक बेहतर समाज का सपना देखते हैं और अपने इस सपने को सच करने के लिए अपने कदम भी बढ़ाते हैं। ऐसे लोग समाज में सुधार चाहते हैं और हर जाति-धर्म और तबके के लिए एक समान माहौल बनाना चाहते हैं। ऐसे लोगों को समाज-सुधारक और सामाजिक-कार्यकर्ता कहा जाता है जैसे दया बाई, जो केरल की सामाजिक कार्यकर्ता हैं और जनजातियों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत हैं।

केरल के पाला में एक क्रिस्चियन परिवार में जन्मी ‘मर्सी मैथ्यू’ ने 16 साल की उम्र में नन बनने के लिए अपना घर छोड़ दिया लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने जनजातियों के उत्थान में अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी और नेकी के साथ अंजाम दिया और आज भी लगातार इसी दिशा में प्रयासरत बनी हुयी हैं।

आदिवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने बहुत से प्रयास किये, जैसे- स्कूल खुलवाने के लिए किये गए सत्याग्रह और कैंपेन्स, गाँवों की ख़राब हालत को दुरुस्त करवाना, मध्य प्रदेश के आदिवासियों के जीवन-स्तर को ऊपर उठाने के लिए किये गए प्रयास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए उठायी गयी आवाज़।

मध्य भारत की जनजातियों को ऊँचा उठाने के लिए दया बाई ने 50 साल से भी ज़्यादा समय तक प्रयास किये हैं। प्रकृति से प्रेम करने वाली दया बाई ‘नर्मदा आंदोलन’ से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने एक स्कूल भी खोला है और बिहार, हरियाणा, मध्यप्रदेश, वेस्ट बंगाल और महाराष्ट्र के वनवासियों के लिए आंदोलन भी किये है।

उनके इन प्रयासों को बहुत सराहा गया और वनिता मैगज़ीन ने उन्हें साल 2007 की ‘वनिता वुमन ऑफ द ईयर अवार्ड’ से सम्मानित किया और उन पर एक डॉक्यूमेंट्री ‘ottayal – one woman alone’ भी बनायी गयी है।

साल 2012 में उन्हें शिकागो में ‘Good Samaritan National Award’ से नवाजा गया। भोपाल गैस त्रासदी और बांग्लादेश के युद्ध के दौर में समुदायों के साथ मिलकर उनकी सहायता करने वाली दया बाई हम सभी के लिए प्रेरणा हैं। इनके इरादों को ना उम्र रोक पायी, ना ही हालात। गरीब और निचले तबके को सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित करने वाली दया बाई आदिवासी जनजातियों का जीवन बेहतर बनाने के महान प्रयास में आज भी जुटी हुयी हैं। फर्क बस इतना है कि शुरुआत उन्होंने अकेले की थी और आज उनके पीछे कारवां चल पड़ा है।

दोस्तों, समाज में बेहतर बदलाव के लिए आप भी अपना कदम बढ़ा सकते हैं, देखते ही देखते आपके साथ भी बहुत से कदम बढ़ चलेंगे। शुरुआत तो करिये।

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