नैतिक सामाजिकता (प्रेरक प्रसंग)

अक्टूबर 20, 2015

एक फटेहाल महिला घायल अवस्था में सड़क के किनारे पड़ी हुई कराह रही थी। पास में उसका नादान बच्चा लेटा हुआ था। जो भूख के मारे रोए जा रहा था। महिला में तो इतनी भी ताक़त नही थी कि वो अपने बच्चे को गोद में ले पाएं। अनेक लोग उस रास्ते से आ-जा रहे थे। वे कुछ देर रुकते, महिला की हालत को देखते फिर अपनी प्रतिक्रिया देते और चले जाते। लगभग सभी की यही राय थी कि पता नही यह कौन है? अगर इसकी मदद करने गये तो पुलिस को कई जवाब देने पड़ेंगे।

तभी वहा से एक गाड़ी गुजरी। उस महिला की कराह सुनते ही गाड़ी रुकी और एक व्यक्ति नीचे उतरा। उस व्यक्ति ने बिना कुछ कहे-सुने उस महिला और बच्चे को उठाया और अपनी गाड़ी में बैठा दिया। वह व्यक्ति अपने ड्राइवर से बोला – गाड़ी को अस्पताल ले चलो। ड्राइवर ने कहा – लेकिन साहब, आपको तो उत्सव में जाना है। सभी आपका इंतजार कर रहे होंगे। वह व्यक्ति बोला – मेरे लिए मानव सेवा हर उत्सव से बड़ी है। ड्राइवर फिर कुछ नहीं बोल पाया और गाड़ी अस्पताल की ओर मोड़ दी। अस्पताल में घायल महिला का यथोचित उपचार किया गया। जब महिला पूरी तरह से होश में आई, तो उस व्यक्ति ने उसे कुछ रुपये दिए और वापस अपनी गाड़ी में आके बैठ गया ओर ड्राइवर से बोला – अब उत्सव में चलो। ये महान व्यक्ति थे पंडित मदन मोहन मालवीय जी।

सार यह है कि किसी असहाय की सहायता को अपने अन्य सभी कार्यो से अधिक महत्व देना चाहिए। यही वो नैतिक सामाजिकता है, जो एक मानवीय समाज की रचना करती है।

“ईमानदारी सर्वोपरि है (कहानी)”

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