स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग

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प्राचीन भारत से आधुनिक वर्तमान भारत के युवाओं को अगर किसी ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है तो उस महान व्यक्ति का नाम है स्वामी विवेकानंद। इनका व्यक्तित्व ऐसा था कि आज के हर युवा के लिए वे आदर्श है और सदा रहेंगे। स्वामी विवेकानंद के जीवन के एक भी आदर्श को हम अपने जीवन में अगर उतार पाएं तो शायद ही हमें कभी हार का सामना करना पड़े। स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े अनेक रोचक प्रसंग है जो आज हमें प्रेरणा देते है। स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े कुछ प्रेरणादायक प्रसंग को पढ़े और समझने की कोशिश करे जिससे हमारा जीवन भी बदल सके।

1 – केवल लक्ष्य पर ध्यान लगाओ

एक समय की बात है जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में थे। भ्रमण करते हुए अचानक उनकी नज़र एक पुल पर पड़ी जहाँ कुछ लड़के खड़े थे और नदी में तैरते हुए अंडे के छिलके पर निशाना साध रहे थे लेकिन एक भी निशाना उन लड़को से सही नही लग रहा था। बहुत देर यह सब देखने के बाद स्वामी जी ने एक लड़के से बंदूक ली और खुद निशाना लगाने लगे, पहले निशाने में ही स्वामी जी सफल हुए और सभी निशाने में सफल हुए।

यह सब देख सारे लड़के आश्चर्यचकित हो गये और उनसे पूछा – स्वामी जी, आपने यह सब इतनी सहजता से कैसे किया? आपके सारे निशाने इतने सटीक कैसे लगे? स्वामी विवेकानंद जी ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया – असंभव को संभव करना कोई बड़ी बात नही क्योकि असंभव जैसा कुछ होता ही नही। तुम जो भी करो अपना सर्वस्व उस कार्य के प्रति लगा दो। अगर तुम निशाना सटीक लगाना चाहते हो तो अपना पूरा ध्यान उसी कार्य पे केंद्रित करो जिसे तुमने अपना लक्ष्य बनाया है फिर तुम कभी भी अपने लक्ष्य से नही भटकोगे।

अगर तुम अपनी पढ़ाई कर रहे हो तो उस समय में सिर्फ़ पढ़ाई के बारे में ही सोचो।

2. नारी का सदैव सम्मान करे

एक समय की बात है एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के पास आ कर कहती है मैं आपसे विवाह करना चाहती हूँ। स्वामी जी ने कहा आप तो किसी से भी विवाह कर सकती है फिर मुझसे ही क्यो? क्या आपको यह नही पता की मैं एक सन्यासी हूँ और आगे का पूरा जीवन सन्यासी जीवन जी कर ही यापन करूँगा। वो महिला बोली – मैं आपके जैसा ही सुशील, तेजमयी, ओजस्वी और गौरवशाली पुत्र चाहती हूँ और यह तब ही संभव होगा जब मेरा विवाह आपसे होगा।

स्वामी विवेकानंद ने बड़ी नम्रता और शालीनता से कहा – हमारी शादी तो नही हो सकती, लेकिन हाँ मेरे पास इस जटिल समस्या का एक उपाय है। उस महिला ने कहा मैं इस समस्या का उपाय जानना चाहती हूँ। स्वामी जी ने कहा – क्यो न मैं आज और अभी से ही आपका पुत्र बन जाऊँ और आप मेरी माँ। आपको मेरे स्वरूप में मेरे जैसा एक पुत्र मिल जायेगा और मुझे एक माँ।

वो महिला यह सब सुन के गदगद हो गई और रोते हुए स्वामी जी के चरणों में गिर गई और कहा आप तो साक्षात ईश्वर हो क्योकि ऐसा सुझाव तो सिर्फ़ ईश्वर ही दे सकता है।

ऐसा था स्वामी विवेकानंद का पुरुषार्थ क्योकि एक सच्चा और महान पुरुष वही होता है जो हर पराई नारी के प्रति भी अपने अंदर मातृत्व की भावना उत्पन कर सके। इस प्रसंग द्वारा बड़ी खूबसूरती के साथ स्वामी जी ने हमें भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया है।

3. माँ से बड़ा कोई नही

एक बार स्वामी विवेकानंद जी अपने आश्रम में अपने शिष्यों को संबोंधन कर रहे थे तभी एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया – माँ कि महिमा पूरे संसार में किस कारण से गाई जाती है?

स्वामी जी हँसे और उस व्यक्ति से बोले – जाओ कही से पाँच सेर का पत्थर ले आओ। आज्ञानुसार वह व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने कहा अब इस पत्थर को कपड़े में लपेटकर अपने पेट से बाँध लो और चार पहर बाद मेरे पास आना फिर में तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा।

स्वामी विवेकानंद के कहेनुसार वह व्यक्ति पत्थर को अपने पेट से बाँध कर चला गया और अपने दैनिक कार्य को करने लगा। किंतु हर क्षण उसे परेशानी और कमजोरी का अहसास होता रहा, क्योकि पेट पर बंधे हुए पत्थर से वह अपने कार्य में सहज नही था। दिन ढलते-ढलते उसके पेट में दर्द भी होने लगा, अब उस व्यक्ति के लिए पत्थर का बोझ संभालना असंभव था वह चल फिर भी नही पा रहा था। अतः वह थका मांदा, दिये गये समय से पहले ही स्वामी जी के पास पहुँच गया और बोला मैं इस पत्थर का भार अब और सहन नही कर सकता। एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं अपने आप को इतनी कड़ी सज़ा अब और नही दे सकता।

स्वामी विवेकानंद हँसते हुये बोले – तुम कुछ घंटो के लिए भी अपने पेट पर इस पत्थर का बोझ नही उठा पाएं तो ज़रा सोचो एक माँ अपने गर्भ में पूरे नौ माह एक शिशु का भार ढोती है और गृहस्ती का पूरा काम बिना शिकायत के करती है। तो अब तुम ही बताओ पूरे संसार में माँ से ज़्यादा धैर्यवान और सहनशील कोई हो सकता है? इसलिए संसार में माँ का स्थान सर्वोपरि है। माँ से बढ़कर इस संसार में कोई नही है।

4. मुसीबत का सामना करो उससे डरकर भागो मत

एक बार स्वामी विवेकानंद जी बनारस में दुर्गा माँ के दर्शन करके मंदिर से बाहर निकल रहे थे कि तभी वहाँ के असंख्य बंदरों ने स्वामी जी को घेर लिया। सारे बंदर प्रसाद लेने की इच्छा से स्वामी जी के करीब आने लगे और डराने लगे। इतने सारे बंदरों को देखकर स्वामी जी भी बहुत भयभीत हो गये और स्वंय को बचाने के लिए वहाँ से दौड़ने लगे। लेकिन वो बंदर प्रसाद लिए बिना कहा पीछा छोड़ने वाले थे, स्वामी जी भी पीछे-पीछे दौड़ाने लगे उन बंदरों को।

पास खड़े एक वृद्ध सन्यासी यह सब देख रहे थे। उन्होने स्वामी जी को रुकने को कहाँ और बोले डरो मत, जो समस्या तुम्हारे सामने है उसका सामना करो और देखो क्या होता है। वृद्ध सन्यासी की बात सुन स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों की तरफ बढ़ने लगे। उनके ऐसा करते ही सारे बंदर भाग खड़े हुए, ये देख स्वामी जी के आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। उन्होने वृद्ध सन्यासी को इस सलाह के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद किया।

इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई वर्षो बाद उन्होने एक सम्मेलन समारोह में संबोधन करते हुए इसका जिक्र भी किया और कहाँ – यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो, तो उससे भागो मत, पलटो और उस समस्या का सामना करो।

वाकई, स्वामी विवेकानंद की यह शिक्षा आज भी हमारे सामने ढ़ाल के रूप में खड़ी है। अगर हम भी अपने जीवन में आई सभी समस्याओं का सामना डट कर करें और उससे भागे नही तो बहुत सी समस्याओं का समाधान हम अपने स्तर पर ही कर सकते है।

5. देने का सुख, लेने के सुख से हमेशा बड़ा होता है

यह उन दिनों की बात है जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में एक महिला के घर शरणार्थी थे। रोज की तरह उस दिन भी स्वामी जी अपने भाषण समारोह से थके हुए अपने निवास स्थान पर लौटे। वे अपने सभी कार्य खुद करते थे। उस दिन भी वे अपने लिए भोजन बना रहे थे कि कुछ बालक उनके समीप आ कर खड़े हो गये। वैसे तो स्वामी जी के पास बच्चों का आना-जाना लगा रहता था लेकिन उस दिन वें सभी बच्चे भूखे थे। स्वामी जी उन बालकों के भूखे होने की बात को भाँप गये थे, बस फिर क्या – स्वामी जी ने जितनी भी रोटियाँ बनाई थी एक-एक कर के सभी बच्चों में बाँट दी।

महिला को बड़ा आश्चर्य हुआ यह सब देख कर, उससे रहा नही गया आखिर उसने स्वामी जी से पूछ ही लिया – आपने सारी रोटियाँ उन भूखे बच्चों में बाँट दी, अब आप अपनी भूख कैसे मिटाएँगे?

स्वामी जी के चेहरे पर मंद सी मुस्कान दौड़ आई। उन्होनें खुश हो कर कहा – ” माँ, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने की वस्तु है, इस पेट में नही तो उस पेट में ही सही” क्योकि देने का सुख लेने के सुख से सदैव बड़ा होता है।

6. आस्था में है ईश्वर

एक समय की बात है जब हमारे देश में राजाओं का शासन होता था। स्वामी विवेकानंद जी का जीवन भी उन्हीं राजाओं के शासन काल में ही गुजरा था। एक बार एक राजा ने स्वामी जी को अपने राज्य में निमंत्रण दिया। स्वामी जी ने निमंत्रण को स्वीकार किया और राजा के राज्य में चले आये।

स्वामी विवेकानंद के आदर सत्कार के बाद राजा ने मंत्रणा की इच्छा जताई। बातों-बातों में राजा ने स्वामी जी से पूछा – ”तुम हिंदू लोग मूर्ति पूजन क्यों करते हो?” धातु, मिट्टी और पत्थर से बनी यह मूर्तियां तो बेजान है। यह तो केवल एक वस्तु है। मैं यह सब नही मानता।”  उस राजा के सिंहासन के पीछे एक तस्वीर थी जिस पर विवेकानंद जी कि नज़र गई। स्वामी जी ने राजा से पूछा – यह तस्वीर किसकी है?

राजा ने कहा – ”मेरे पिताजी की” स्वामी जी बोले – ”जरा उस तस्वीर को अपने हाथो में लिजिये, राजा तस्वीर को हाथो में लेता है, तभी स्वामी जी बोले अब आप इस तस्वीर पर थूकिए” राजा ने कहा – ”यह आप क्या बोल रहे है?”

स्वामी जी ने अपनी बात फिर से दोहराई। तभी राजा क्रोध से बोलता है – ”स्वामी जी आप होश में तो है, मैं यह काम कदापि नही कर सकता।” स्वामी जी बोले – ”क्यो? ये तस्वीर तो बस एक कागज़ का टुकड़ा है जिसमे कुछ रंग भरे है।” इसमें ना तो जान है, ना स्वर, ना तो ये सुन और बोल सकती है। यहाँ तक कि इस तस्वीर में हड्डिया और प्राण भी नही है फिर भी आप इस तस्वीर पर थूक नही सकते। क्योकि, राजन आप इस तस्वीर में अपने पिता का स्वरूप देखते है। इस तस्वीर का अपमान करना आप अपने पिता का अपमान करना समझते है।

ठीक उसी तरह , ”हम हिंदू भी धातु, पत्थर और मिट्टी से बनी मूर्तियों में अपने भगवान का स्वरूप मान कर पूजा करते है। भगवान तो सब जगह है, अगर मन में सच्ची आस्था और विश्वास हो तो मूर्तियों में भी ईश्वर नज़र आते है।” हम हिंदू मूर्तियों को ईश्वर का आधार मान कर अपने मन को एकाग्रचित कर मूर्ति पूजा करते है क्योकि हम यह मानते है ईश्वर तो ”कण-कण में है।”

हिंदुओं के मूर्ति पूजन का रहस्य जान कर राजन ने स्वामी विवेकानंद के चरणों में गिर कर क्षमा माँगी।

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