सुपर 30 आनंद कुमार कौन है?

फरवरी 4, 2018

आनंद कुमार एक ऐसा नाम है जिसे अब सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया जानती है, जिन पर डिस्कवरी चैनल डॉक्यूमेंट्री बना चुका है, जिनकी बायोग्राफी अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित हो चुकी है और जिन्हें प्रो. यशवंत राव केलकर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है और बिहार गवर्नमेंट द्वारा ‘अब्दुल कलाम आज़ाद शिक्षा अवार्ड’ से भी नवाज़ा गया है। यकीनन आप भी आनंद कुमार के बारे में जानते होंगे लेकिन इनके इस ‘सुपर 30’ के सफर को करीब से जानने का मन आपका भी होगा। ऐसे में आज बात करते हैं सुपर 30 के आनंद कुमार के इस सफर की।

आनंद कुमार ऐसे गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देते हैं जिनके ख्वाब तो बहुत बड़े हैं लेकिन उन्हें पूरा कर पाने जैसे हालात नहीं हैं। आनंद कुमार अपनी कोचिंग ‘सुपर 30’ में ऐसे गरीब लेकिन होनहार बच्चों को मुफ्त शिक्षा देते हैं ताकि वो बच्चे देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी तक अपनी पहुँच बना सके और अपनी आँखों में छुपे सपनों को असली उड़ान दे सके।

अपने इन निश्छल प्रयासों के दम पर आनंद कुमार ने बहुत से बच्चों के सपनों को हकीकत से मिलवाया है। किसी बेरोजगार व्यक्ति का बेटा हो या अंडे बेचने वाले का बच्चा या फिर खेतों में मजदूरी करने वाले का बेटा हो, आंनद कुमार के ‘सुपर 30’ में हर उस होनहार बच्चे का स्वागत है जो आर्थिक तंगी से ऊपर उठकर अपना मुकाम हासिल करने को बेताब है।

बिहार के पटना से ताल्लुक रखने वाले आनंद कुमार ने बचपन में तंगी के हालातों को करीब से देखा था। उनकी पढ़ाई हिंदी मीडियम सरकारी स्कूल में हुयी जहाँ उन्हें मैथ्स के प्रति विशेष लगाव हुआ और इसी समय में आनंद कुमार ने मैथ्स के कई नए फॉर्मूले बना डाले।

ग्रेजुएशन के दौरान नम्बर थ्योरी में पेपर सब्मिट करने वाले आनंद कुमार को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से एडमिशन के लिए बुलाया गया लेकिन उस दौर में पिता की मृत्यु और घर के खराब हालातों ने उनके सपनों को पंख नहीं लगने दिए।

लेकिन जिसके हौसले बुलंद होते हैं, उन्हें हालात मात नहीं दे पाते। ऐसा ही आनंद कुमार के साथ भी हुआ। उन्होंने रामानुजन स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स नाम का एक क्लब खोला, जहाँ दिन में मैथ्स के स्टूडेंट्स को मुफ्त में पढ़ाने लगे और शाम को अपनी माँ के साथ पापड़ बेचने लगे।

आनंद कुमार ने कुछ समय बाद इस क्लब में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराना शुरू कर दिया और यहाँ पढ़ने आने वाले बच्चों की संख्या 500 तक पहुँच गयी। एक दिन एक स्टूडेंट ने आनंद कुमार से कहा कि हम गरीब है और बिना पैसों के हम अच्छे कॉलेज में कैसे पढ़ सकते हैं। इसके बाद साल 2002 में आनंद कुमार ने ‘सुपर 30’ की नींव रखी और इस ‘सुपर 30’ कोचिंग में हर साल परीक्षा के जरिये 30 बच्चे सेलेक्ट होते हैं और उन्हें खाने-पीने, रहने और किताबों की सुविधाएँ मुहैया करवाई जाती हैं।

गरीबों के मसीहा कहे जाने वाले आनंद कुमार जल्द ही ‘सुपर 30’ का दायरा बढ़ाना चाहते हैं ताकि 30 से ज़्यादा बच्चे अपने सपनों को साकार कर सकें।

दोस्तों, अगर दुनिया के लिए कुछ करने की चाह हो, तो शुरुआत करने के लिए एक छोटा-सा प्रयास भी काफी होता है और उसके बाद मनचाहे बदलाव और मदद के हाथ खुद-ब-खुद मिलते जाते हैं और बदलाव की शुरुआत खुद से करने का अनूठा उदाहरण हैं ‘सुपर 30’ के आनंद कुमार, जिनके निश्छल प्रयासों ने आज बहुत-सी आँखों के सपनों को पूरा कर दिया है।

ऐसे में अगर आप भी कोई बेहतर बदलाव देखना चाहते हैं तो क्यों ना उसकी शुरुआत खुद ही से की जाए?

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