स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर विशेष

जनवरी 12, 2016

संपूर्ण विश्व में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसे ‘भारत माता’ के नाम से संबोधित किया जाता है क्योकि इस धरा ने समय-समय पर अपनी और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अनेकों महापुरुषों और वीरों को जन्म दिया है। उन्हीं महापुरुषों में एक नाम है ‘स्वामी वेवेकानंद’, इनके नाम में ही अखिल भारतीय संस्कृति का समावेश है। महान विचारक स्वामी विवेकानंद के जन्म से यह धरती भी गौरवान्वित हुई। स्वामी जी का जन्म उस समय हुआ जब यह धरती माँ गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ी हुई थी। हमारी विरासत, संस्कृति, धर्म, शिक्षा, भाषा, सभ्यता सब कुछ इस धरा से लुप्त हो रहा था। हम इस लेख के माध्यम से महान विचारक स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर कुछ रोशनी डालने की कोशिश करेंगे।

12 जनवरी 1863 की सुबह सूर्योदय से ठीक छः मिनट पूर्व विवेकानंद जी का जन्म हुआ। ऐसे महापुरुष का स्वागत खुद प्रकृति ने मंगल बेला में मंगल शंख और मंगल ध्वनि से किया। आपका जन्म कोलकात्ता की पावन भूमि में हुआ। आपके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। बाल्यकाल में आपको नरेंद्र दत्त के नाम से और आगे चलके स्वामी विवेकानंद के नाम से जाना गया। नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद तक का सफ़र बहुत ही प्रेरणादायक था।

पाँच वर्ष की उम्र में ही नरेंद्र को शिक्षा के लिए पाठशाला में दाखिला करा दिया गया। 1879 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर कोलकात्ता के जनरल असेम्बली कॉलेज से बी. ए. की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। आप पर आपके पिता के पाश्चात्य सभ्यता और अंग्रेज़ी शिक्षा के विचारों का तो असर नही हुआ। अपितु आपकी माताजी के धार्मिक आचार-विचारों का अविश्वसनीय प्रभाव पड़ा, जिस कारण आपका बचपन से ही धार्मिक प्रवृति में रुझान रहा। आपके अंदर बचपन से ही परमात्मा को जानने और देखने की प्रबल इच्छा रही। इसी उत्सुकतावश नरेंद्र ने अपनी तलाश जारी रखी और इसी तलाश में उन्होंने सन् 1881 में सर्व प्रथम रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात की और अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु वही आश्रम में शरण ली। कुछ ही दिनों में परमहंस जी ने नरेंद्र की योग्यता को भाप लिया और उनके गुणों को परखने के बाद कहां कि ”नियती ने कुछ खास कार्य हेतु तुम्हें भेजा है, तुम्हें समस्त मानव जाति का कल्याण करना है, तुम सिर्फ़ अपने देश तक ही सीमित नही रहोगें बल्कि विदेशों में भी भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना है। जिससे हमारे देश के हताश हुए नौजवानों को तुमसे अपने देश व धर्म के प्रति प्रेरणा मिलेगी।”

स्वामी परमहंस की सारी बातें सुनकर नरेंद्र ने अपना सारा जीवन भक्ति, धर्म और देश को समर्पित करना ही अपना परम कर्तव्य समझा और परमहंस जी को अपना गुरु बनाया। नरेंद्र बहुत जल्द परमहंस के प्रिय और अनुयायी शिष्य बने। नरेंद्र के सन्यास लेने के निर्णय पर परमहंस ने सन्यास का विरोध करते हुए कहां ”अगर तू अपनी मुक्ति की इच्छा हेतु सन्यास ले रहा है तो यह विचार त्याग दें क्योकि दुनिया में लाखों लोग दुख से पीड़ित है, उनका दुख दूर करने कौन आयेगा।” तत्पश्चात नरेंद्र ने परमहंस से वेद-वेदांत, ग्रंथों की शिक्षा ग्रहण कर महारथ हासिल की और कहा ”सन्यास का वास्तविक अर्थ, मुक्त होकर जन सेवा’ करना ही असली सन्यास है। सिर्फ़ स्वयं के मोक्ष की कामना से जो सन्यास लेता है वो स्वार्थ है।”

इसलिए समस्त मानव जाती के कल्याण व उनके मोक्ष हेतु नरेंद्र ने स्वयं के लिए सन्यास का मार्ग चुना। जिसके बाद से वे नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद कहलाये। स्वामी जी काली माँ के परम भक्त थे। सन् 1886 में गुरु परमहंस की मृत्यु के पश्चात स्वामी जी ने कोलकात्ता से प्रस्थान किया और उत्तर में वराद नगर के आश्रम में रह कर दर्शन व अन्य शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया और दो वर्ष की कठोर तपस्या के बाद 25 वर्ष की आयु में ही स्वामी जी ने गेरुवेवस्त्र को धारण किया और देश-विदेश की यात्रा पर निकल पड़े।

स्वामी जी ने सारे जगत को आत्म-रूप बताया और अपने उपदेशों में कहा ”आत्मा को हम देख नही सकते किंतु अनुभव कर सकते है। सारे जगत का निर्माण आत्मा से होता है और उसी में विलीन हो जाता है। मनुष्य धर्म के लिए नही है बल्कि धर्म मनुष्य के लिए है।” भारत में विशेषकर युवाओं के लिए उनका यह विचार बहुत ही प्रसिद्ध हुआ-

”उठो, जागों और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक रूको मत।”

अपने संबोधन से उन्होंने सम्मेलन में एक अलग पहचान कायम की। यूरोपीय देशों के अतिरिक्त स्वामी जी ने अपना अधिकतम समय अमेरिका और इंग्लैंड के लोगों को दिया। वहाँ रहकर उन्होंने भाषण, वाद-विवादों और लेखों द्वारा हिंदुत्व को फिर से जीवंत किया और कहा हिंदू धर्म भी श्रेष्ठ है, इसमें सभी धर्मो को समाहित करने की क्षमता है। 11 सितंबर, 1883 में शिकागों के विश्व धर्म सम्मेलन में अपना ऐसा ओजस्वी भाषण दिया कि सभी मंत्र-मुग्ध होकर तालियां बजाते हुए सुनते रहे। स्वामी विवेकानंद जी को अपने भाषण के लिए 20 मिनट की समय अवधि दी गई थी। लेकिन स्वामी जी भाषण देते गये और निर्धारित समय कब समाप्त हुआ किसी को पता नही चला। अपनी इसी ओजस्वी वाणी के कारण भाषण के पश्चात हज़ारों लोग स्वामी जी के शिष्य बन गये। शिकागों में भाषण देना उनके लिए कतई आसान नही था। स्वामी जी के सामने कई चुनौतियाँ और परेशानियां भी आई, लेकिन उगते सूरज को भला कौन रोक सकता है। इस तरह अनेकों विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए विवेकानंद जी ने सात समंदर पार विदेशों में भी भारतीय संस्कृति का परचम लहराया।

ये कहना कतई गलत नही होगा कि भारतीय संस्कृति को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने का एक मात्र श्रेय स्वामी विवेकानंद जी को ही जाता है। स्वामी जी ने चार वर्षो तक विदेशों में घूम-घूम कर सभी धर्मो का सम्मान करते हुए हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार किया और भारत को विश्व के नक्शे में स्थान दिलवाया। जिसके बाद से भारत को एक गरीब देश के रूप में नही बल्कि सुसंस्कृत देश के रूप में पहचान मिली।

सन् 1887 में स्वामी जी स्वदेश लौट आयें। वे अपने भाषण से पराधीन भारतीय समाज को स्वार्थ, भय और कायरता की नींद से झंझोर कर जगाया और कहा-

”मैं हज़ार बार नरक में जाने को तैयार हूँ यदि मैं अपने सोये हुये देशवासियों का जीवन-स्तर थोड़ा सा भी उठा सकु।”

अपनी ओजपूर्ण वाणी द्वारा वे सदा ही भारतीय युवाओं को प्रेरित और उत्साहित करते रहे। स्वामी जी एक महान देशभक्त भी थे। उन्होंने अशिक्षा, अज्ञान, भूख, बिमारी और ग़रीबी से लड़ने के लिए राष्ट्र में नई चेतना भरी और कहा ‘मानवता सर्वोपरि’ है। सन् 1899, कोलकात्ता में भीषण प्लेग फैला था। अस्वस्थ होते हुये भी स्वामी जी ने तन-मन और धन से बिमार लोगों की सेवा कर इंसानियत की मिशाल कायम की। एक मई, 1897 में स्वामी विवेकानंद जी ने ‘राम-कृष्ण परमहंस’ मिशन की स्थापना की। यह मिशन मानव सेवा और परोपकार को ही कर्मयोग व एकमात्र लक्ष्य मानता है। स्वामी जी के यह अनमोल शब्द आज भी याद आते है-

”हमें किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य से भटकना नही चाहिये।”

अपने इन्हीं महान विचारों के कारण स्वामी जी संपूर्ण विश्व के ‘जननायक’ बन गये। बिमारी के कारण 39 वर्ष की अल्प आयु में 4 जुलाई, 1902 की रात वे हमेशा के लिए भारत माता की गोद में चिर-निद्रा में सो गये। छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अपने जीवन को इतना प्रेरणादायक बनाया की वे आज हमारे बीच ना होते हुए भी युग युगांतर तक अमर हो गये। जब-जब मानवता हताश-निराश होगी, तब-तब स्वामी विवेकानंद जी के विचार, भाषण और उपदेश विश्व में उर्जा प्रदान करेंगे और प्रेरणा देते रहेंगे। जिससे आने वाली पिढियो का सदा मार्ग दर्शन होता रहेगा। स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिन ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उनकी शिक्षा में सबसे महान शिक्षा है – ”मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।”

जब-जब भारत माँ को अपनी विरासत की रक्षा और मानव कल्याण हेतु आवश्यकता होती है, तब-तब यह जननी युग अवतारी पुरुष को जन्म देती है और फिर यह युग अवतारी समाज को अपनी वाणी सुनने के लिए बाध्य कर देते है। जिससे इस समाज की आत्मा फिर से जागृत होकर अपने देश व धर्म की रक्षा करती है। विश्व का इतिहास इसका साक्षी है- रामकृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, ईसा मसीह, पैगंबर आदि अनेक महान आत्मायें इसका विशाल और ज्वलंत उदाहरण है।

विवेकानंद जी का जीवन काल इतना अद्भुत था कि पूरा विश्व, आने वाली कई सदियों तक यूही याद और नमन करता रहेगा ऐसे युग पुरुष को। इनके जीवन से हमें शिक्षा लेनी चाहिये, इनके आदर्शो को हम अपने जीवन में धारण करे तभी सच्चें अर्थो में ऐसे महापुरुष को हमारी तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अपने अद्भुत विचारों के कारण आज भी युवा पीढ़ी के लिए वे प्रेरणा के स्त्रोत है। उनके महान कार्यो और अखिल भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए स्वामी विवेकानंद जी को सदा याद किया जायेगा।

12 जनवरी 2016 को स्वामी विवेकानंद जी की 153 वीं जयंती पर हम सब उन्हें भावविभोर श्रद्धांजलि देते हुये शत-शत नमन करते है।

“स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी बेहद दिलचस्प जानकारियां”
“स्वामी विवेकानंद – एक प्रेरणात्मक जीवन”

अगर आप हिन्दी भाषा से प्रेम करते हैं और ये जानकारी आपको ज्ञानवर्धक लगी तो जरूर शेयर करें।
शेयर करें