इन 6 आदतों से जीवन बने आसान और खुशहाल

आज इस भागदौड़ और तनावयुक्त जीवन में भला कौन खुश रहना नही चाहता। खुशी तो हर मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है तभी तो हम कहते है काश – ‘हम एक बार फिर अपना बचपन जी पाते’ क्योकि बचपन मे हर बच्चे के पास सिर्फ़ खुशियाँ ही होती है उस समय ना तो चिंता होती है और ना ही ज़िम्मेदारियाँ। कुछ होता है तो बस मौज-मस्ती, खेल-कूद, शरारत जिसे हम सब बड़े होते-होते खो देते है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते है हमारे अंदर इतनी नेगेटिविटी आ जाती है कि हम सुख-शांति और खुशी को भूल कर दुखों के साथ समझौता कर अपने जीवन को जीते चले जाते है और यह मानने लग जाते कि यही हमारी नियती है। हमारे अंदर ऐसी नेगेटिविटी का काफ़ी हद तक कारण हमारी परवरिश, स्वयं के विचार, आस-पास का माहौल और हमारे रूढ़िवादी समाज का बहुत बड़ा हाथ है। कौन-कौन से स्वयं में बदलाव करे जिससे हमारा जीवन बने आसान और खुशहाल।

शायद किसी ने सच ही कहा है – ”अपनी जिंदगी में आप सबसे बुरी स्थिति की आशा करेंगे तो शायद ही कभी हताश, दुखी या उदास होगें.”

यह सोच हम में से कुछ ही लोगों की होती है क्योकि हम अपनी बीती बातों में ही इतने व्यस्त रहते है कि आने वाले समय में क्या होगा उसका ना तो हमारे पास वक्त है और ना ही कोई हल और इस तरह हम अपने ही हाथों अपने जीवन को कठिन और मुश्किलों भरा बना लेते है। जिसका परिणाम यह होता है हमें अपने चारों ओर सिर्फ़ नेगेटिविटी ही दिखाई देती है, लेकिन आज हमें यह निश्चय करना होगा कि हम अपनी जिंदगी के हर उस मुकाम को हासिल करेंगे जो हम पाना चाहते है वो भी खुशी और शांति के साथ। हमें हमारी मानसिक सोच और आदतों में थोड़े बहुत बदलाव की ज़रूरत है।

किसी विद्वान ने क्या खूब कहा है –

‘यूं ही नहीं मिलती राही को मंजिल, इक जुनून सा दिल में जगाना होता है। पूछा चिड़िया से – कैसे बना आशियाना तो बोली – भरनी पड़ती है उड़ान बार-बार, तिनका-तिनका उठाना होता है।’

हमारा यह मानना है हर इंसान अपनी मेहनत, लगन और अच्छे विचारों से अपनी जिंदगी को खुशहाल बना सकता है। इसलिए हम यह कदापि नही कहना चाहते की आज के इस तनावपूर्ण माहौल मे कोई खुश नही है। हम सब के बीच हज़ारों-लाखों लोग ऐसे भी है जो अपने जीवन से बहुत खुश है, दूसरों की तरह इनके जीवन में भी दुख-सुख का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन ऐसे लोग व्यर्थ की चिंता नही करते बल्कि अपने उस समय का सदुपयोग करते है और निरंतर आगे बढ़ने के बारे में सोचते है। खुश रहना हमारा पैदायशी हक है और यह हम पर ही निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को कौन सी दिशा दे।

गाँधीजी भी कहते थे –

”आपकी धारणाएँ आपके विचार बन जाते हैं,
आपके विचार आपके शब्द बन जाते हैं,
आपके शब्द आपके कर्म बन जाते हैं,
आपके कर्म आपकी आदतें बन जाती हैं,
आपकी आदतें आपके मूल्य बन जाते हैं,
और आपके मूल्य आपकी तकदीर बन जाती है।”

बापू की यह पंक्तियाँ सीधे शब्दों में हमें बहुत कुछ सीखा रही है और हमें प्रेरित करती है कि हमारी तकदीर का फैसला हमें खुद करना है। नित्य थोड़ा-थोड़ा स्वयं में बदलाव हमारे आने वाले जीवन में एक बड़ा और आश्चर्यजनक बदलाव लाएगा। जिसका अनुमान शायद हम आज न लगा पाये। बदलाव लाना बहुत ही आसान है बस एक दृढ़ निश्चय करना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है। तो आइये, इन छः पॉइंटस से हम यह समझने की कोशिश करेंगे की कौन-कौन से स्वयं में बदलाव करे जिससे हमारा जीवन दुखमय से सुखमय में परिवर्तित हो जाएं।

1. सदैव सच का साथ दे – रिसर्च के अनुसार हमारा दिमाग प्रतिदिन 60,000 विचारों का घर है। जिनमे से अधिकतर विचार नकारात्मक होते है और नकारात्मकता का नाता होता है दुखों से जिस कारण हम जानें अंजाने सच से दूरी बना लेते है। क्योकि झूठ एक बहुत बड़ा कारण है दुखी होने के लिये। झूठ कुछ पल के लिए बाहरी सुख तो दे सकता है लेकिन आंतरिक शांति कभी नही। हमारे ना चाहते हुए भी हमारे मन-मस्तिष्क में हर क्षण अच्छे-बुरे कई विचारों का आदान-प्रदान होता है। लेकिन यह हमारे ही हाथ में है कि हम अपने अंदर कैसे विचारों को स्थान दे रहे है। विचारों की शक्ति हमारे कार्य पे भी असर डालती है और हमारा कार्य अगर गलत दिशा में जाता है तो हम हर जगह स्वयं को बचाने के लिए झूठ का ही सहारा लेते है।

इस बात का विशेष ध्यान देना होगा कि हमारे सामने चाहे जैसी परिस्थिति क्यों ना हो हम कभी भी झूठ का सहारा नही लेंगे। क्योकि सच उगते सूर्य की तरह होता है जिसे बड़ा से बड़ा झूठ भी नही छुपा सकता। सच बोलने की आदत से हमारा मन भी हल्का महसूस करता है। सच बोलने वालों को भविष्य में कुछ याद रखने की भी आवश्यकता नही पड़ती।

शेक्सपीयर के विचार – ”सबसे बढ़ कर जरूरी है हम खुद से सच्चे रहे”

2. किसी पे दोषारोपण न करे – जीवन मे हमारे साथ जब भी कुछ गलत होता है तो हम ज़रा भी देरी नही करते दूसरों को दोष देने में। हमें यह आदत मुख्य तौर पर बदलने की आवश्यकता है क्योकि हम जिस भी व्यक्ति पर आरोप लगाते है उस व्यक्ति की नकारात्मक उर्जा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमारे पास ही आती है। जिस कारण हमारा जीवन भी दुखमय हो ही जाता है। बिती बातों को भूलने की कोशिस करें। हमारे कर्मों से हमारे जीवन में जो भी परिणाम आते है उस की जिम्मेदारी हमें स्वयं लेनी होगी। किसी को कुछ देना ही है तो हँसते हुए विपरीत परिस्थिति में भी सामने वाले को श्रेय दे। ऐसा करने से आपको व्यर्थ विचारों से मुक्ति तो मिलेगी ही साथ ही आपको अंदर से अनंत खुशी की अनुभूति भी होगी।

तभी तो किसी ने सत्य कहाँ है – ”खुद में वो बदलाव लाइये, जो आप दुनिया में देखना चाहते है”

छोटी-छोटी बातों पर किसी को दोष देने की आदत न बनाए बल्कि माफ़ करने की आदत डाले। जरूरत पड़ने पर माफ़ी माँगने से भी ना हिचकिचाए। इससे आपका दिल और दिमाग़ हल्का होगा और आप पूरी उर्जा के साथ कुछ नया व अच्छा कर पायेंगे खुद के लिए भी और दूसरों के लिए भी।

3. अपने जीवन और कार्य को बड़े उद्देश्य से जोड़े – हर मनुष्य के जीवन में कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है तो क्यो न हम उस उद्देश्य को अपने जीवन जीने का कारण ही बना ले। हमारी जिस कार्य में रूचि होती है हमें वही कार्य करना चाहिए। क्योकि रूचि अनुरूप कार्य करने से हम थकते भी नही है। अतः मन जिस कार्य को करने में आनंद ले वो कार्य करने से हम हमारे लक्ष्य तक भी अवश्य पहुँचते है। खुशी के साथ किया हुआ हर कार्य हमें सफलता की और निश्चित ले जाता है फिर चाहे हमारा उद्देश्य कितना भी बड़ा क्यो न हो।

आइये इस विचार को हम एक लघु कथा से समझे :-

एक बूढ़ा व्यक्ति अपने घर जाते वक्त देखता है तीन श्रमिक एक इमारत के निर्माण में लगे थे।
उस बूढ़े व्यक्ति ने पहले श्रमिक से पूछा – ”तुम क्या कर रहे हो?”
पहले श्रमिक ने जवाब दिया – ”दिखता नही, मैं ईटें ढो रहा हूँ।”
उस बूढ़े व्यक्ति ने दूसरे श्रमिक से भी वही प्रश्न किया – ”तुम क्या कर रहे हो?”
दूसरे श्रमिक ने जवाब दिया – ”मैं अपने परिवार का पेट पालने के लिए मज़दूरी कर रहा हूँ।”
फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने तीसरे श्रमिक से भी यही प्रश्न किया – ”तुम क्या कर रहे हो?”
तीसरे श्रमिक ने जवाब दिया – ”मैं इस शहर का सबसे भव्य मंदिर बना रहा हूँ।”

दोस्तो, अब आप समझ सकते है तीनो मजदूर एक ही कार्य कर रहे थे फिर भी तीसरा मजदूर अपने कार्य को एक बड़े उद्देश्य के रूप में देखते हुए खुश होकर कर रहा था। हम जिस कार्य को खुश होकर करते है असल मायने में उस कार्य में हम जीते है।

किसी शायर की कुछ पंक्तिया यहाँ सार्थक हो रही है –

जो सफ़र की शुरुआत खुश हो कर करते है,
वो मंजिलों को भी पार करते है,
चलते रहने का हो जिसमें हौंसला,
ऐसे मुसाफिरों का खुद, रास्ते भी इंतजार करते हैं।

4. व्यर्थ की चिंता से मुक्ति पाये – हम सब यह भली-भाती जानते है ”चिंता से चतुराई घटे दुख से घटे शरीर” लेकिन, फिर भी जाने-अंजाने न जाने हम कितनी चिंताओं से अपने आप को घेरे रखते है। जबकि चिंता करने या सोचते रहने से कुछ भी हासिल नही होता बल्कि हमारी खुशियाँ भी धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है। बीती बातों पे हमारी पकड़ इतनी मजबूत होती है कि हम उन बातों के बारे में सोच-सोच कर अपना वर्तमान भी खो देते है। अपने बड़ों से हमने अक्सर सुना है ”चिंता चिता समान होती है जो सब कुछ जला देती है”

हमें बस इतना करना है जो हो चुका उसे हम नही बदल सकते, जो हो रहा है वो होने दे और आगे जो भविष्य में होगा उसे खुश होकर स्वीकार करे। हमारा कार्य बस इतना होना चाहिए की हम आज से ही चिंता मुक्त जीवन जीने का पूरा प्रयास करेंगे। क्योकि जो हुआ वो बदला नही जा सकता, तो आगे बढ़िए और नये मौकों की तलाश में जीवन को व्यस्त कर दीजिए फिर देखिए परिणाम भी कितने खुशहाल मिलते है। हमें हमारे खुशहाल जीवन में चिंता की नही बल्कि चिंतन की ज़रूरत है।

5. अपेक्षाएँ कम रखे – अगर हम सच में अपने जीवन को आसान और खुशहाल बनाना चाहते है तो हमें किसी से भी ज़्यादा आशाएँ नही रखनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति से हम अगर ज़्यादा उम्मीद रखते है और वो व्यक्ति उन उम्मीदों में खरा न उतरें तो हम अपने आप को कोसते है और दुखों में डुबो देते है। हमें यह याद रखना चाहिए किसी की मदद करना या किसी का कोई कार्य कर देना हमारा स्वभाव है क्योकि ऐसा करना हमें अच्छा लगता है। लेकिन बदले में सामने वाला भी हमारे लिए ऐसा ही करे यह कदापि ज़रूरी नही। हम जैसे ही उम्मीद करना छोड़ते है हमारा जीवन खुशहाल हो जाता है।

अपने जीवन को सफल और बेहतर बनाने के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। वर्तमान में जो हमारे पास है उसे स्वीकारें और संतुष्ट रहे। हमारे पास आज जो भी है उसकी प्रशंसा करे और प्रभु के प्रति आभार व्यक्त करे क्योकि जो जीवन आज हम जी रहे है वो लाखों मनुष्य को नसीब भी नही होता। जीवन में दूसरों से जितनी अपेक्षाएँ कम होगी हम उतने ही खुश रहेंगे। प्रकृति हमें कितना कुछ देती है, लेकिन हमसे कुछ लेने की भावना से नही, क्योकि देना तो प्रकृति का स्वभाव है। ठीक वैसे ही हम मनुष्यों को भी अपना स्वभाव प्रकृति स्वरूप बना कर अपना जीवन श्रेष्ठ बनाना चाहिए।

जैसा की ”भगवत गीता” में कहा गया है :- ”कर्म करो, फल की चिंता मत करो”

दोस्तो, हमें तो बस इतना ख्याल रखना है कि हमारे कर्म ऐसे हो जिससे हर किसी को हमसे खुशी मिले। जब हमसे कोई खुश होता है तो हमें भी खुशी की अनुभूति होती है। उम्मीदों से भरा जीवन हमेशा दुख ही देता है।

विलियम शेक्सपियर के इस बारें में विचार :- ”अपेक्षा सभी ह्रदय-पीड़ा की जड़ है”

6. हमेशा सुख की चाह न रखे – जब भी हमें जीवन में दुख का सामना करना पड़ता है तो हम घबरा जाते है और अपनी चेतना खो देते है, लेकिन हम यह कैसे भूल जाते है कि दुख भी हमारे जीवन का एक हिस्सा है। अगर हम हमारे पूरे जीवन में दुख ही ना देखे तो हमारे शरीर, दिमाग और आत्मा को मजबूती कैसे मिलेगी? हमारे साथ हर समय अगर अच्छा ही होता रहे तो हमारे जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों का सामना मजबूती के साथ कैसे करेंगे?

सुख-दुख तो जीवन का एक चक्र है जिसे हम नही बदल सकते। जिस तरह दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है ठीक उसी तरह सुख-दुख भी आते-जाते रहते है, दोनों ही परिस्थिति में हमें हमारा नज़रिया समान रखना चाहिए। अति सुख की चाह ही हमें दुखों की ओर ले जाता है। हमें जो भी जीवन मिला है उसी में अपार सुख की अनुभूति करे।

दोस्तों, समय का चक्र गतिशील है – निरंतर चलायमान, इसलिए युग, राष्ट्र और समाज भी समय के साथ बदलते है तो क्यो न हम भी इन छोटे-छोटे उपायों से स्वयं को बदलने का प्रयास करे क्योकि केवल आशाएँ या सपनों को संजो कर हम मंज़िल तक नही पहुँच सकते। भविष्य में खुश रहने के स्वप्न को साकार करने के लिए आवश्यक है लक्ष्य प्राप्ति हेतु सतत् कर्मशील और प्रयत्नशील रहना। हो सकता है इनमें से कई नियमों का पालन आप अपने जीवन में करते होंगे? एक जागरूक नागरिक की तरह इन उपायों को अपने जीवन में अमल करते रहे तो आपको अपनी जिंदगी में भी एक आश्चर्यजनक बदलाव नज़र आयेंगे।

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