तुलसीदास जी का पूरा नाम गोस्वामी तुलसीदास है। इनका जन्म पंद्रहवी शताब्दी में उत्तर प्रदेश के राजापुर गाँव में हिंदू परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी देवी था। तुलसीदास जी को बचपन से ही वेद, पुराण और उपनिषदों की शिक्षा मिली थी।

कहा जाता है जन्म के समय इनके मुख में पूरे दाँत थे जिस कारण इन्हें अशुभ मानकर इनके माता-पिता ने इनका त्याग कर दिया। जिस कारण संत नरहरिदास ने काशी में इनका लालन-पालन किया और इन्हीं के संरक्षण व देख-रेख में तुलसीदास जी की ज्ञान और भक्ति की शिक्षा पूर्ण हुई।

तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली से बेहद प्यार करते थे। एक बार भीषण अंधेरी रात साथ में तूफान और घनघोर बारिश में वे रत्नावली से मिलने अपने ससुराल पहुँच गये। यह देखकर रत्नावली को बड़ा आश्चर्य हुआ और उनके मुख से यह शब्द निकल पड़े-

रत्नावली के शब्द – ”अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति!
नेक जो होती राम से, तो काहे भव-भीत”

अर्थात – ”मेरा शरीर तो नश्वर है फिर भी इस शरीर से इतना मोह! अगर मेरा ध्यान हटाकर अगर आप राम नाम में लगाते तो आज इस भवसागर से पार हो जाते।” पत्नी की यह उलाहना सुनकर वे तीर्थ पर निकल पड़े और पूरे तन-मन से प्रभु राम की भक्ति में लीन हो गये। पत्नी की प्रेरणा से ही तुलसी से इनका नाम गोस्वामी तुलसीदास पड़ा।

लोग इनकी प्रशंसा करते हुए इन्हें वाल्मीकि जी का पुर्नजन्म मानते है जिसका उल्लेख कई संतो ने अपनी रचनाओं में भी किया है। तुलसीदास जी ने अपना अधिकांश समय वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट में व्यतीत किया था। गंगा के तट पर तुलसी घाट इनके नाम पर ही रखा गया।

लोगों की धारणा है तुलसीदास जी ने वही पर संकटमोचन मंदिर का निर्माण करवाया था जहाँ उन्हें साक्षात हनुमान जी के दर्शन हुए थे। तभी से तुलसीदास जी ने रामलीला नाटक की शुरुआत की थी जो आज भी उनकी याद ताजा करती हैं।

इनको भारत का ही नहीं बल्कि वैश्विक साहित्य का भी महान कवि माना जाता है। जिसकी छवि और उनके कार्य का प्रभाव हमें आज भी देखने को मिलता है। यह बहुभाषी के धनी थे। जिस कारण इन्होंने कई भाषाओं में कई रचनाएँ लिखी।

जिसमें से यह कुछ प्रमुख और प्रसिद्ध रचनाएँ है – रामचरित्रमानस, कवितावली, गीतावाली, हनुमान चालीसा, दोहावली, विनय पत्रिका, पार्वती मंगल, कृष्ण गीतावाली, तुलसी सतसाई, हनुमान अष्टक, जानकी मंगल, साहित्य रत्न आदि। ग्रंथों में इनकी संपति अतुलनीय थी।

महाकाव्य रामचरित्रमानस एक ऐसी रचना जिसे हिंदू धर्म का आधार माना जाता है जिस कारण इस रचना को घर-घर में आदर प्राप्त हुआ। तुलसीदास जी ने इतनी सरल और सहज हिन्दी भाषा का प्रयोग किया की यह ग्रंथ हर किसी के लिए समझना सुगम हो गया।

तुलसीदास जी ने अपने कार्य और जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी लिखित में छोड़ी थी। बाद में 19 वी सदी में प्राचीन भारतीय सूत्रों के आधार पर भक्तामल रचना में इनके जीवन का उल्लेख मिलता है जो नाभादास जी द्वारा रचित हैं। इस रचना में तुलसीदास जी का जीवनकाल 1583-1639 तक दर्शाया गया हैं।

तुलसीदास जी अपने अंतिम समय में काशी में ही थे और राम-राम कहते हुए काशी के अस्सी घाट पर परमपिता परमेश्वर में विलीन हो गए। इसमें कोई संदेह नहीं भारत की भूमि ने समय-समय पर सत्य, धर्म, विज्ञान और साहित्य की रक्षा और रचना के लिए महान और विद्वान रत्नों को जन्म दिया हैं। जिसमें तुलसीदास जी भी एक अनमोल रत्न है।

हिंदू साहित्य में आजतक इनकी जोड़ का कोई कवि नहीं हुआ जिन्होंने साहित्य के माध्यम से पूरे भारत पर अपना प्रभाव बनाया हो। हिंदू साहित्य में तुलसीदास जी को सूरज के समान माना जाता है। जिनकी आभा से सिर्फ हिन्दू समाज ही नहीं बल्कि पूरा विश्व लाभान्वित और प्रकाशित हुआ।

तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के महान विभूति है। इन्होंने अपनी कल्पना शक्ति से मानव जाती के उत्थान के लिए लोक मर्यादा प्रस्तुत करने की जरुरत को समझा और ‘रामचरित्रमानस’ में श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया।

साथ ही अन्य किरदारों को भी बहुत ही सुन्दर और आदर्श चरित्र के रूप में प्रस्तुत किया जिससे मानव जाती का सदा मार्गदर्शन और कल्याण होता रहे।

इनकी भक्ति और ज्ञान के कारण समाज को विरासत में बहुत कुछ प्राप्त हुआ है जिनमें रामचरित्रमानस जैसे महाग्रंथ के कारण सदियों तक जनमानस के ह्रदय में तुलसीदास जी जिवंत रहेंगे।

“पीने के पानी का टीडीएस कितना होना चाहिए?”

जागरूक यूट्यूब चैनल