पेंसिल क्या शिक्षा देती है हमें

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एक छोटा सा बच्चा अपनी दादी मां को एक पत्र लिखते हुए देख रहा था. तभी अचानक उसने अपनी दादी मां से पूंछा, “दादी मां! क्या आप मेरी शैतानियों के बारे में लिख रही हैं? क्या आप सच में मेरे बारे में ही लिख रही है?”

बच्चें की बात सुन कर दादी माँ रुकीं और बोलीं, “हाँ, बेटा मैं तेरे बारे में ही लिख रही हूँ, लेकिन जिन शब्दों का प्रयोग मैं यहाँ खत लिखनें में कर रही हूँ उनसे भी कई अधिक महत्व इस पेन्सिल का है. जिसकी सहायता से मैं लिख पा रही हूँ. मैं पूर्णरूप से विश्वास करती हूँ, कि तुम बड़े होने पर ठीक इस पेन्सिल की तरह ही बनोगे.”

दादी की बातें सुनकर बालक को थोड़ा आश्चर्य हुआ और पेन्सिल की तरफ बड़ी ध्यान से देखने लगा. परंतु उसे पेन्सिल में कुछ खास नज़र नहीं आया. बच्चें ने उत्सुकता से कहा मुझे तो यह पेंसिल अन्य पेन्सिलो की तरह ही दिख रही है.

इस पर दादी माँ ने समझाते हुए उत्तर दिया – “बेटा! यह तो तुम्हारी सोच पर निर्भर करता है कि तुम चीज़ों को किस तरह से देखते हो. इस छोटी सी पेंसिल में ऐसे गुण समाएं हुए हैं, जिन्हें यदि तुम अपने जीवन में उतार लेते हो, तो तुम सदा इस संसार में सुख-शांतिपूर्वक जीवन यापन कर सकते हो.”

आओ बैठो, आज मैं तुम्हें समझाती हूँ कि पेंसिल के गुणों का जीवन में क्या महत्व है, जिससे तुम अपने आने वाले कल को संवार सको.

“पहला गुण – तुम्हारे अंदर बड़ी से बड़ी उपलब्धियां को प्राप्त करने की योग्यता है, किन्तु तुम्हें यह कदापि नही भूलना चाहिए कि तुम्हें एक ऐसे सफल हाथों कि निरंतर आवश्यकता होगी जो तुम्हारा सदैव मार्गदर्शन कर सके. हम सब के लिए वह ईश्वर का हाथ है जो सदा हम सभी का मार्गदर्शन करता रहता है.”

“दूसरा गुण – बेटा! लगातार लिखते रहने के दौरान मुझे कुछ देर रुकना पड़ता है. फिर कटर से पेन्सिल को छीलकर नोक बनानी पड़ती है. इससे पेन्सिल को थोड़ा कष्ट तो होता है, किन्तु बाद में वही पेंसिल काफ़ी तेज़ हो जाती है और अच्छे से चलती है. इसलिए बेटा! तुम्हें भी अपने दुख-दर्द, अपमान और असफलता को धैर्यता से सहन करना आना चाहिए. क्योंकि इस तरह से तुम अपने आपको बेहतर मनुष्यों की श्रेणी में खड़ा पाओगे.”

“तीसरा गुण – बेटा! पेन्सिल हमेशा अपनी भूल को सही करने के लिए रबर का प्रयोग करने की हमें इजाज़त देती है. इसका यह तात्पर्य है, यदि जीवन के किसी पड़ाव पर हमसे कोई गलती हो भी जायें तो उसे सुधारना कोई गलत बात नहीं है. गलत को सही करने में कभी झिझकना नही चाहिए. बल्कि ऐसा करके हम अपने प्रति न्याय कर रहे है, जिससे हमें अपने लक्ष्यों की ओर निर्विघ्न रूप से बढ़ने में सहायता मिलती है.”

“चौथा गुण – बेटा! एक पेन्सिल की कार्य प्रणाली में इसका अहम योगदान बाहरी लकड़ी का नहीं, अपितु इसके भीतर के ‘ग्रेफाईट’ का है. ग्रेफाईट या लेड की गुणवत्ता के आधार पर लेख उतना ही सुंदर दिखेगा. इसलिए बेटा! इस गुण को सदैव याद रखना तुम्हारे भीतर कैसे-कैसे विचारों का मंथन चल रहा है. इसके प्रति सदा सजग रहना. क्योंकि विचारों का प्रत्यक्ष रूप हमारे कर्मो में नजर आता है.”

“पाँचवा गुण – बेटा! पेन्सिल सदा अपना निशान छोड़ती है. ठीक इसी प्रकार तुम्हारें द्वारा किया हुआ कोई भी कार्य हो, वो भी अपना निशान निश्चित रूप से छोड़ते है. अतः सदैव ऐसे कर्म करो जिन पर तुम्हें शर्मसार ना होना पड़े और तुम्हारा और तुम्हारें कुटुम्ब का सिर गर्व से ऊपर उठा रहे. अतः अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सदा सजग रहो. वो हमारे कर्म ही होते है जो जीवन में घटित अच्छे-बुरे निशान के जिम्मेदार होते है.”

”अंतिम गुण – बेटा! पेंसिल यह कभी नही भूलती कि उसका जीवन क्षणिक है. इसलिए वो अपने अंतिम क्षणों तक भी उपयोगी बनी रहती है और कर्म को ही अपना सर्वस्व मानते हुए जाते-जाते भी हमें बहुत कुछ सीखा और पढ़ा जाती है, कि दूसरों के लिए कैसे जिया जाता है. ठीक इसी प्रकार मनुष्यों का जीवन भी अल्प है. इसलिए अपने जीवन को उपयोगी बनाओं और सदा कर्मशील रहो.”

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