महिला दिवस – नारी का स्वरूप

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”औरत तेरी यही कहानी” क्या आज 21वीं सदी में भी यह कथन एक शूल की तरह नहीं चुभता? हमें यह सोचना होगा नारी के प्रति हमारी इस सोच के लिए पुरुषप्रधान समाज का कितना योगदान हैं. औरत और पुरुष परमात्मा के दो विशिष्ट सृजन है. यह दोनों ही एक दूसरें के पूरक है. एक के अभाव में दूसरा अधूरा है. यहाँ तक की भारतीय संस्कृति में नारी को पुरुष की तुलना में अधिक सम्मानीय माना गया है. हमारे आदि-ग्रंथों में तो यह तक उल्लेख किया गया है…”जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है.” लेकिन विडंबना यह है नारी आज भी अपने आप के लिए, अपने सम्मान के लिए, अपने हक के लिए और अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रही है.

नारी को सृजन की शक्ति माना जाता है और इसीलिए पूरे विश्व में 8 मार्च को महिलाओं के सम्मान के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का मूल उद्देश्य यही है की नारी को कुरीतियों की बेड़ियों से निकालकर उसे आगे बढ़ने की स्वतंत्रता दी जायें.

क्या आप जानते है पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कब मनाया गया था? प्रथम महिला दिवस अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी की मुहिम पर 28 फरवरी 1909 को मनाया गया था. अमेरिका सहित अनेक देशों में उस समय महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्राप्त नहीं था. अपना हक हासिल करने के लिए इस दिन को महिला दिवस के रूप में मनाया जाना शुरू हुआ. इस मुहिम की महत्ता तब और अधिक हो गई जब रूस की महिलाओं ने 1997 में रोटी और कपड़े के लिए वहां की सरकार के खिलाफ़ आन्दोलन छेड़ दिया. रुसी महिलाओं ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस फरवरी माह के आखिरी दिन मनाया और पहले विश्व युद्ध का विरोध दर्ज किया. यूरोप में महिलाओं ने पीस ऐक्टिविस्ट्स के पक्ष में 8 मार्च को रैलिया की. इसी तरह के कई आंदोलन पूरे विश्व में महिलाओं ने शुरू किए, जिसे काफी समर्थन भी मिला. इसलिए 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा.

एक बहुत ही खूबसूरत सी पंक्ति यहाँ याद आ रही है……”यहाँ कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है. हर कोई अपनी तकदीर और अपनी हक़ीकत बनाने में लगा है.”

इसलिए हे नारी तुझे अपने सपने साकार करने के लिए और अपने हक को पाने के लिए खुद ही लड़ना होगा. महिलाओं ने अपने हौसलों को कभी नहीं मरने दिया. वे सदियों से अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ती आ रही है और आगे भी अपनी इस मुहिम को जिंदा रखेगी, जब तक उसके सपनों को भी पूर्ण रूप से आकर नहीं दिया जायेगा. महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना आज भी करना पड़ता है. जैसे की… अपराध, भेदभाव, कम उम्र में शादी, कम अवसर, शिक्षा का अधिकार, अंधविश्वास, राजनीति में हिस्सा आदि. ऐसे विभिन्न मुद्दे है जहाँ आज भी महिलाओं को पिछड़ा हुआ माना जाता है. क्या हम सब मिलकर इस स्थिति को बदल नहीं सकते!! क्या हम महिलाओं के विगत और वर्तमान स्थिति को सुनहरे भविष्य की ओर नहीं ले जा सकते? बस जरूरत है अपनी सोच में बदलाव लाने की. सरकार, समाज, संस्थाएं, कानून सब अपनी ओर से अपना योगदान दे रहे है क्या हम अपनी रूढ़िवादी सोच में जरा सा परिवर्तन नहीं ला सकते?

”चिड़ियाँ होती है, लड़कियाँ.. मगर पंख नहीं होते लड़कियों के
मायके भी होते है, ससुराल भी होते है, मगर घर नहीं होते लड़कियों के
मायका कहता है, ये बेटियाँ तो पराई है
ससुराल कहता है, ये पराये घर से आई है
ए खुदा अब तू ही बता…. आख़िर
ये बेटियाँ किस?? घर के लिए बनाई हैं.”

बेटियों के मन से यह भाव मिटाना हमारी परवरिश का हिस्सा होना चाहिए और वो जिस भी घर में जायें वो घर उसे अपना लगे, ऐसा हमारा अपनापन होना चाहिए. क्योंकि उस घर को घर बनाने में एक बेटी अपना अस्तित्व भी दाव पर रख देती है और उसे इस बात का इल्म भी नहीं होता की उसके कितने सपनों का उसने गला घोटा है. लेकिन विडंबना देखिए फिर भी नारी – सामर्थ पर कितने सवाल उठते हैं. नारी को अपने त्याग के लिए जो सम्मान मिलना चाहिए वो आज भी अधूरा हैं.

शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी. बेटा-बेटी की परवरिश में अंतर मिटाना होगा. बेटी को आगे बढ़ने और कुछ करने की आज़ादी दे. बेटों की तरह बेटियाँ भी देश का और आपके घर का गौरव है. बेटों को यह शिक्षा दे की वे सदैव महिलाओं का सम्मान करे. जब हम एक मंदिर में देवी की पूजा कर सकते है तो घर में बेटियों व महिलाओं का सम्मान क्यों नहीं कर सकते? यह भाव अपने बेटों में बचपन से डालें. आज देश में बेटे-बेटियों का अनुपात बहुत ही असन्तुलित है. इसलिए जरूरी है बेटियों को जन्म लेने दे. अगर इसी तरह बेटियों का अनुपात बेटों के मोह में घटता रहा तो आपका वंश और सृष्टि का विकास कैसे होगा? हमारा विचार कटु सत्य जरूर है, लेकिन विचारणीय है.

ऐसा नहीं है इतने सालों में देश नहीं बदला या हमारी सोच नही बदली! भारत में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का उत्सव महिलाओं की उपलब्धियों और उनका सम्मान करने के रूप में मनाया जाता है. हमारे देश की संस्कृति की जड़े बहुत मजबूत है. भारतीय संस्कृति में हम भारत को भी भारत माता कहते है जिस कारण यहाँ की नारी को भी माता का पद दिया गया है. नारी के गुणगान से इतिहास के पन्ने भरे पड़े है. नारी शक्ति का स्त्रोत है इसमें कोई संदेह नहीं. नारी इतनी श्रेष्ठ है की ईश्वर के नाम के आगे भी उनकी पत्नियों के नाम का उल्लेख पहले होता है जैसे…. सीता राम, राधे-श्याम, गौरी-शंकर. यहाँ तक की पति-पत्नी के सन्दर्भ में भी पत्नी को पति की अर्द्धागिनी इसी यथार्थ को ध्यान में रख कर कहा गया है. माता-पिता में भी माँ का उल्लेख पहले किया जाता है. नारी में असीम शक्ति है बस उसे तराशने की जरूरत है.

भारतीय समाज में जहाँ नारी को त्याग, दया, करुणा, ममता और धैर्य की प्रतिमूर्ति कहा जाता है. जिस कारण नारी को कई बार अबला भी कहा जाता है. जबकि यह सारे गुण नारी के शक्ति के प्रतीक है. इसलिए पुरुषप्रधान समाज को अब यह धारणा बदलनी होगी.

आज हम आपको एक ऐसी खबर से वाकिफ़ कराएँगे जिसे सुन कर आप भी गर्व से कहेंगे. नारी तू किसी से कम नहीं! 16 वीं सदी में बना मणिपुर का इमा बज़ार. देश ही का नहीं बल्कि दुनिया का एकलौता ऐसा बज़ार जिसे सिर्फ महिलाएँ चलाती है और पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर भी हैं. यह बज़ार 1533 में बना था. इसके पीछे की कहानी कुछ ऐसी है. जब सभी मर्दों को चावल की खेती के लिए खेतों में भेज दिया जाता था. तब सभी औरतें घर पर अकेली होती थी. धीरे-धीरे इन्हीं औरतों ने अपनी उत्सुकता से इस बज़ार को जन्म दिया. यहाँ करीब 3500 महिलाएँ अपनी खुद की दुकान चलाती है. यहाँ मछली से लेकर कीमती कपड़े भी खरीदें जा सकते हैं. सबसे दिलचस्प बात तो इस बज़ार की यह है यहाँ किसी भी तरह की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है. अगर कोई समान आपको किसी दुकान में नहीं मिलता है तो वह आपको दूसरे दुकान तक भेज देते है.

हम यह नहीं कहेंगे की समाज में बदलाव नहीं आया, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है. नारी और पुरुष दोनों ही एक दूसरे के पूरक है. एक के अभाव में दूसरें की कल्पना भी नहीं की जा सकती. जब ईश्वर ने दोनों को इतना समान बनाया है तो हम असमानताएँ क्यों पैदा करते है. इस बात को हमें अध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी समझना होगा. क्या इस बात को किसी भी तरह से साबित किया जा सकता है, नारी हर जन्म में नारी और पुरुष हर जन्म में पुरुष ही बनेगा! नहीं ना…..तो फिर हम ईश्वर की रचना को कमजोर कहकर उसका अपमान क्यों करते है. नारी और पुरुष को यह समझना होगा वे दोनों इस जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए है जिसमे दोनों की अनिवार्यता समान है. इसलिए कहा जाता है औरत का सम्मान ईश्वर का सम्मान करने तुल्य है.

महिला सशक्तिकरण पर आज हम कुछ महान लोगों के विचार आपके सामने रखना चाहेंगे…

– औरतें कभी उतनी सफल नहीं हो सकती जितना की एक पुरुष. क्योंकि उनके पास सलाह देने के लिए पत्नियाँ नहीं होती. – डिक वैन डाइक

– महिलाएँ पुरुषों से अधिक बुद्धिमान होती हैं क्योंकि वो जानती कम हैं और समझती ज्यादा है. – जेम्स थर्बर

– रानी की तरह सोचिए. क्योंकि एक रानी कभी भी असफलता से नहीं डरती हैं. वो जानती जो है की वह सफलता की ही सीढ़ी हैं. – ओपरा विनफ्रे

– जिस देश की अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण में महिलाओं की ज्यादा से ज्यादा सहभागिता होती है, वहाँ के समाज के सफल होने के अवसर बढ़ जाते हैं. – बराक ओबामा

आज की नारी अपनी बहुत सी जिम्मेदारियों का निर्वाह खुशी-खुशी कर रही है. अपने घर और बाहर के कामों को बड़ी सरलता से निभा रही है. आज की नारी विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है और अपना सिक्का जमा रही है. इससे अभिभावकों को प्रेरणा लेनी चाहिए और अपनी बेटियों को बराबर का अवसर देना चाहिए. उन्हें भी अपने हक के लिए लड़ना सीखाना चाहिए जिससे वे भी अपने सपनों का भविष्य बुन सके. आप उन्हें मौका तो दे आप खुद मानेंगे बेटियाँ अधिक मेहनती, एकाग्र और अनुशासित होती है. इसलिए जल्द सफलता भी पाती है. बस वे तो आपकी क्षत्र-छाया में जरा सी उड़ान भरना चाहती है. जब आपका हाथ उसके सर पर ना हो तो वो निर्भर होकर अपना जीवन जी सके. महिलाओं का नये क्षेत्रों में प्रवेश कई बार पुरुषों के लिए चुनौती भी बन जाता है. पर इस डर से उनकी राह रोकना सही नही है. अगर हम सुरक्षित दुनिया और सभ्य समाज चाहते है तो ऐसा तब ही मुमकिन होगा जब महिलाओं की भागीदारी बराबर की होगी. ऐसा होने पर पुरुषों को भी सहजता होगी और वे भी इस बात को धीरे-धीरे स्वीकार करेंगे की समाज में दोनों का स्थान बराबर हैं.

”यदि आप किसी काम के बारें में कथनी चाहते हैं तो एक आदमी से पूछिए, यदि आप काम को हुआ देखना चाहते हैं तो एक औरत से पूछिए.”- मार्गरेट थैचर

वैसे बता दें कि इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम है ‘Be Bold for Change’ यानी कि बदलाव के लिए सशक्त बनें. यह कैंपेन लोगों का आह्वान करता है कि वह बेहतर दुनिया के लिए कार्यरत हों जिसमें लिंगभेद, पक्षपात, असमानता, हिंसा सबको शामिल किया जाए. बी बोल्ड यानी बदलाव के लिए महिलाओं को सीमाएं तोड़नी होगी. क्या आप इस बदलाव के लिए तैयार है? तो आइए समाज और हमारी आने वाली पीढ़ी के हित में हम शपथ लेते है की हम नारी को उसकी कमजोरी के रूप में नहीं बल्कि शक्ति के रूप में देखेंगे, हम हर हाल में उन्हें भी आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे, हम उन्हें सिर्फ रसोई तक ही सीमित नहीं रखेंगे, हम बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ की मुहिम का हिस्सा बनेंगे, हम बेटियों को भी सवाल पूछने का हक देंगे.

”अगर एक आदमी को शिक्षित किया जाता है तो एक आदमी ही शिक्षित होता है, लेकिन जब एक औरत को शिक्षित किया जाता है तब एक पीढ़ी शिक्षित होती हैं.”

अंत में… हम यही कहेंगे कि हमें हर महिला का सम्मान करना चाहिए. अवहेलना, भ्रूण हत्या और नारी की अहमियत ना समझने के परिणाम स्वरूप महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले बहुत कम है. इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए, कि नारी ही दुनिया में वंश के अस्तित्व को बचा सकती है. उसे ठुकराना या अपमान करना सही नहीं हैं. हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है अत: उसे उचित सम्मान दिया ही जाना चाहिए. स्त्री स्वतंत्र व्यक्तित्व है, यह सबको मानना ही होगा.

जयशंकर प्रसाद जी ने महाकाव्य “कामायनी” में लिखा है –”नारी तुम केवल श्रध्दा हो, विश्वास रजत नग पद तल में
पीयूष स्रोत – सी बहा करों, जीवन के सुंदर समतल में.”

नारी, यह सिर्फ शब्द नहीं अपितु एक ऐसा सम्मान है जिसे देवत्व प्राप्त है. माताओं बहनों के सम्मान का कोई विशेष दिन नहीं होता, अपितु हमारे जीवन का हर पल, हर क्षण उनके सम्मान के लिए रहे.

इस मुहिम में तकलीफें भी बहुत है, रास्ता भी लंबा है, लेकिन हमें रुकना नहीं हैं. जब हमारे देश का कानून भेदभाव नहीं करता तो हम क्यों ऐसा करते आ रहे है या कर रहे हैं. आज की आधुनिक नारी कुरीतियों की बेड़ियों से निकलकर अपने भाग्य की निर्माता स्वयं बन रही है, बस ऐसे ही आगे बढ़ते जाना है बिना रुके, बिना डरे. हम अपने लेख को इस प्रेरणा के साथ विराम देते है की हम नारी के सहायक बनेंगे रुकावट नहीं.

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